सेना में शामिल कुत्ते, घोड़े और खच्चर भी रिटायरमेंट के बाद अपनी पूरी जिंदगी जी सकेंगे। रिटायरमेंट के बाद सैन्य जानवरों को मारा नहीं, बल्कि इनका पुनर्वास किया जाएगा। इनको गोद लेने के लिए सैन्य प्रशासन गैर सरकारी संगठनों (एनजीओ) से बातचीत कर रहा है। हालांकि देश में कुछ ही एनजीओ हैं, जिनके पास प्रत्येक वर्ष करीब एक हजार घोड़ों और खच्चरों के रखरखाव की सुविधा है।
रक्षा सूत्रों का कहना है, "प्रत्येक वर्ष करीब 50 कुत्ते और एक हजार घोड़े और खच्चर सेवानिवृत्त होते हैं। सेना अब रिटायर होने के बाद देश में विभिन्न स्थानों में इनके लिए घर की व्यवस्था करने में जुटी है।" बताते चलें कि अभी सेना से रिटायर कुत्तों, घोड़ों और खच्चरों को जहर देकर मार दिए जाने का प्रावधान है। हालांकि सेना ने उम्रदराज हो रहे निरोग सैन्य जानवरों को मारना फिलहाल बंद कर दिया है। उसने यह कदम दिल्ली हाई कोर्ट की उस टिप्पणी के बाद उठाया है, जिसमें अदालत ने कहा था, "सैन्य जानवरों को मौत की नींद सुलाने का चलन पशु क्रूरता रोकथाम कानून 1960 के प्रावधानों का खुला उल्लंघन है।"
केंद्र सरकार ने सितंबर माह में दिल्ली हाई कोर्ट को बताया था कि वह अगले छह महीने के भीतर इनके पुनर्वास के लिए एक नीति लाएगी। इसके तहत जहर देकर मारने की प्रक्रिया को बंद किया जाएगा। अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) संजय जैन ने कहा था कि याचिका में जिन मुद्दों को उठाया गया है, उन पर पहले से ही विचार चल रहा है। इस बारे में छह माह के भीतर नीति बना ली जाएगी।
नई नीति के तहत ऐसे कुत्तों, घोड़ों और खच्चरों की देखभाल के लिए व्यवस्था करने के अलावा अलग से स्टाफ की भी नियुक्ति की जाएगी। सेना लेब्राडॉर, जर्मन शेफर्ड, बेल्जियन शेफर्ड नस्ल के कुत्तों का इस्तेमाल अपने विस्फोटक खोजी दस्ते में करती है। सेना का घुड़सवार दस्ता माउंटेन रेजिमेंट वैसे ही चर्चित है। ऊंचाई के क्षेत्रों में माल वगैरह ढोने में भी घोड़े, खच्चरों का इस्तेमाल होता है।
रक्षा सूत्रों का कहना है, "प्रत्येक वर्ष करीब 50 कुत्ते और एक हजार घोड़े और खच्चर सेवानिवृत्त होते हैं। सेना अब रिटायर होने के बाद देश में विभिन्न स्थानों में इनके लिए घर की व्यवस्था करने में जुटी है।" बताते चलें कि अभी सेना से रिटायर कुत्तों, घोड़ों और खच्चरों को जहर देकर मार दिए जाने का प्रावधान है। हालांकि सेना ने उम्रदराज हो रहे निरोग सैन्य जानवरों को मारना फिलहाल बंद कर दिया है। उसने यह कदम दिल्ली हाई कोर्ट की उस टिप्पणी के बाद उठाया है, जिसमें अदालत ने कहा था, "सैन्य जानवरों को मौत की नींद सुलाने का चलन पशु क्रूरता रोकथाम कानून 1960 के प्रावधानों का खुला उल्लंघन है।"
केंद्र सरकार ने सितंबर माह में दिल्ली हाई कोर्ट को बताया था कि वह अगले छह महीने के भीतर इनके पुनर्वास के लिए एक नीति लाएगी। इसके तहत जहर देकर मारने की प्रक्रिया को बंद किया जाएगा। अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) संजय जैन ने कहा था कि याचिका में जिन मुद्दों को उठाया गया है, उन पर पहले से ही विचार चल रहा है। इस बारे में छह माह के भीतर नीति बना ली जाएगी।
नई नीति के तहत ऐसे कुत्तों, घोड़ों और खच्चरों की देखभाल के लिए व्यवस्था करने के अलावा अलग से स्टाफ की भी नियुक्ति की जाएगी। सेना लेब्राडॉर, जर्मन शेफर्ड, बेल्जियन शेफर्ड नस्ल के कुत्तों का इस्तेमाल अपने विस्फोटक खोजी दस्ते में करती है। सेना का घुड़सवार दस्ता माउंटेन रेजिमेंट वैसे ही चर्चित है। ऊंचाई के क्षेत्रों में माल वगैरह ढोने में भी घोड़े, खच्चरों का इस्तेमाल होता है।
सेना
में शामिल कुत्ते, घोड़े और खच्चर भी रिटायरमेंट के बाद अपनी पूरी जिंदगी
जी सकेंगे। रिटायरमेंट के बाद सैन्य जानवरों को मारा नहीं, बल्कि इनका
पुनर्वास किया जाएगा। इनको गोद लेने के लिए सैन्य प्रशासन गैर सरकारी
संगठनों (एनजीओ) से बातचीत कर रहा है। हालांकि देश में कुछ ही एनजीओ हैं,
जिनके पास प्रत्येक वर्ष करीब एक हजार घोड़ों और खच्चरों के रखरखाव की
सुविधा है।
रक्षा सूत्रों का कहना है, "प्रत्येक वर्ष करीब 50 कुत्ते और एक हजार घोड़े और खच्चर सेवानिवृत्त होते हैं। सेना अब रिटायर होने के बाद देश में विभिन्न स्थानों में इनके लिए घर की व्यवस्था करने में जुटी है।" बताते चलें कि अभी सेना से रिटायर कुत्तों, घोड़ों और खच्चरों को जहर देकर मार दिए जाने का प्रावधान है। हालांकि सेना ने उम्रदराज हो रहे निरोग सैन्य जानवरों को मारना फिलहाल बंद कर दिया है। उसने यह कदम दिल्ली हाई कोर्ट की उस टिप्पणी के बाद उठाया है, जिसमें अदालत ने कहा था, "सैन्य जानवरों को मौत की नींद सुलाने का चलन पशु क्रूरता रोकथाम कानून 1960 के प्रावधानों का खुला उल्लंघन है।"
सूत्र ने बताया कि हालांकि कुत्तों को रखने के लिए कई लोग रुचि दिखाते हैं, लेकिन घोड़ों और खच्चरों की देखभाल करना बड़ी समस्या है। सूत्र के अनुसार, "घोड़े की देखभाल में आने वाला खर्च बहुत ज्यादा है। इसके अलावा उनके रहने के लिए जगह और मूलभूत सुविधाओं की उपलब्धता को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।"
केंद्र सरकार ने सितंबर माह में दिल्ली हाई कोर्ट को बताया था कि वह अगले छह महीने के भीतर इनके पुनर्वास के लिए एक नीति लाएगी। इसके तहत जहर देकर मारने की प्रक्रिया को बंद किया जाएगा। अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) संजय जैन ने कहा था कि याचिका में जिन मुद्दों को उठाया गया है, उन पर पहले से ही विचार चल रहा है। इस बारे में छह माह के भीतर नीति बना ली जाएगी।
नई नीति के तहत ऐसे कुत्तों, घोड़ों और खच्चरों की देखभाल के लिए व्यवस्था करने के अलावा अलग से स्टाफ की भी नियुक्ति की जाएगी। सेना लेब्राडॉर, जर्मन शेफर्ड, बेल्जियन शेफर्ड नस्ल के कुत्तों का इस्तेमाल अपने विस्फोटक खोजी दस्ते में करती है। सेना का घुड़सवार दस्ता माउंटेन रेजिमेंट वैसे ही चर्चित है। ऊंचाई के क्षेत्रों में माल वगैरह ढोने में भी घोड़े, खच्चरों का इस्तेमाल होता है।
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रक्षा सूत्रों का कहना है, "प्रत्येक वर्ष करीब 50 कुत्ते और एक हजार घोड़े और खच्चर सेवानिवृत्त होते हैं। सेना अब रिटायर होने के बाद देश में विभिन्न स्थानों में इनके लिए घर की व्यवस्था करने में जुटी है।" बताते चलें कि अभी सेना से रिटायर कुत्तों, घोड़ों और खच्चरों को जहर देकर मार दिए जाने का प्रावधान है। हालांकि सेना ने उम्रदराज हो रहे निरोग सैन्य जानवरों को मारना फिलहाल बंद कर दिया है। उसने यह कदम दिल्ली हाई कोर्ट की उस टिप्पणी के बाद उठाया है, जिसमें अदालत ने कहा था, "सैन्य जानवरों को मौत की नींद सुलाने का चलन पशु क्रूरता रोकथाम कानून 1960 के प्रावधानों का खुला उल्लंघन है।"
सूत्र ने बताया कि हालांकि कुत्तों को रखने के लिए कई लोग रुचि दिखाते हैं, लेकिन घोड़ों और खच्चरों की देखभाल करना बड़ी समस्या है। सूत्र के अनुसार, "घोड़े की देखभाल में आने वाला खर्च बहुत ज्यादा है। इसके अलावा उनके रहने के लिए जगह और मूलभूत सुविधाओं की उपलब्धता को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।"
केंद्र सरकार ने सितंबर माह में दिल्ली हाई कोर्ट को बताया था कि वह अगले छह महीने के भीतर इनके पुनर्वास के लिए एक नीति लाएगी। इसके तहत जहर देकर मारने की प्रक्रिया को बंद किया जाएगा। अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) संजय जैन ने कहा था कि याचिका में जिन मुद्दों को उठाया गया है, उन पर पहले से ही विचार चल रहा है। इस बारे में छह माह के भीतर नीति बना ली जाएगी।
नई नीति के तहत ऐसे कुत्तों, घोड़ों और खच्चरों की देखभाल के लिए व्यवस्था करने के अलावा अलग से स्टाफ की भी नियुक्ति की जाएगी। सेना लेब्राडॉर, जर्मन शेफर्ड, बेल्जियन शेफर्ड नस्ल के कुत्तों का इस्तेमाल अपने विस्फोटक खोजी दस्ते में करती है। सेना का घुड़सवार दस्ता माउंटेन रेजिमेंट वैसे ही चर्चित है। ऊंचाई के क्षेत्रों में माल वगैरह ढोने में भी घोड़े, खच्चरों का इस्तेमाल होता है।
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