तूफानी तेज गेंदबाज के लिए तरसते रहे भारत में अगर
ऐसी अनोखी प्रतिभा दिखे तो हैरान होना लाजिमी है। जयपुर के केएल सैनी
स्टेडियम में 07 नवंबर को अंडर-23 सीके नायडू ट्राफी के लिए राजस्थान और
त्रिपुरा के मुकाबला हुआ। मैच का पहला दिन और गेंद नाथू सिंह के हाथ में,
नाथू की गोली की रफ्तार से आ रही गेंदों को त्रिपुरा की टीम नहीं झेल पाई
और लंच से पहले ही पारी खत्म।
करीब 1 महीने पहले भी यही कमाल नाथू रणजी के अपने पहले मुकाबले में
कर चुके हैं। दिल्ली के खिलाफ दूसरी पारी में 7 विकेट, जिसमें कप्तान गौतम
गंभीर और ओपनर उन्मुक्त चंद का विकेट भी शामिल था। इसी मैच ने गंभीर को
नाथू की प्रतिभा का कायल बना दिया।
नाथू पहले ही रणजी मैच में चयनकर्ताओं के भरोसे पर खरा उतरा। जयपुर में
अपने पहले रणजी मैंच में दिल्ली के खिलाफ आठ विकेट लेकर सबको चौंकाया, उसी
की नतीजा रहा कि महज तीन प्रथम श्रेणी मैच खेलने के बावजूद उसे बोर्ड एकादश
में जगह मिली।
फर्स्ट क्लास क्रिकेट में कदम रखते ही सबको चौंकाने वाला 20 साल का
ये युवा तेज गेंदबाज 140 से 145 की रफ्तार से गेंदबाजी करता है। इसी स्पीड
की वजह से नाथू को दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ बोर्ड एकादश में खेलने का मौका
भी मिला।
नाथू की गेंदबाजी की खासियत है उसकी आर्म रोटेशन और स्पीड यानी तेजी
से कंधे को घुमाना और तेजी से बॉल फेंकना। भले ही क्रिकेट जानकार और
विश्लेषक उसकी इस प्रतिभा की लगातार तारीफ कर रहे हों, लेकिन खुद नाथू की
नजर तो कहीं और है। वो भारत का तेज गेंदबाज नहीं बल्कि बॉलिंग स्पीड की
दुनिया का नया शहंशाह बनना चाहता है। नाथू सिंह के मुताबिक वह दुनिया के
सबसे बड़ा तेज गेंदबाज बनाना चाहते हैं।
अगर आप ये सोच रहे हैं कि 20 साल के नाथू को रणजी के सिर्फ 3 मैचों
ने बेहद आसानी से नाम और शोहरत दे दी तो रुकिए। इस प्रतिभा के संघष की
दास्तां सैनी स्टेडियम से करीब 25 किलोमीटर दूर इस दो कमरों के घर से शुरू
होती है। गली का सबसे जर्जर मकान, टिन का छप्पर और इधर-उधर बिखरे तार इस घर
के खस्ताहाल को बयां कर रहे हैं।
मजदूर पिता भरत सिंह का सपना था कि बेटा बड़ा होकर अफसर बने। अपनी
जरुरत घटाकर बच्चे को बगल के कॉन्वेंट स्कूल में दाखिल कराया। लेकिन बेटे
को पढ़ाई से ज्यादा मजा क्रिकेट खेलने में आने लगा। बाद में पिता ने
समझाने-बुझाने की कोशिश की लेकिन क्रिकेट का ये शौक धीरे-धीरे जिद में बदल
गया।
तार फैक्ट्री में मजदूर पिता ने बेटे की जिद के आगे तो घुटने टेक
दिए, लेकिन यहां से बेटे के साथ ही पूरे परिवार की परीक्षा शुरू हो गई।
वायर बनाने की फैक्ट्री में नाथूसिंह इसी तरह कमरतोड़ मेहनत कर रहे, भरतसिंह
ने कभी 16 तो कभी 24 घंटे ड्यूटी की, जिससे बेटे की अकादमी की फीस जमा करा
सके और स्पाईक्स खरीद सके।
नाथू अपने परिवार की हालत को बखूबी जानता था। लेकिन तेज गेंदबाज
बनने का जो सपना उसने देखा था उसे किसी भी कीमत पर छोड़ना उसे गंवारा नहीं
था। पिता रोज साइकल पर बैठाकर बेटे को 10 किलोमीटर दूर एकेडमी ले जाते और
ले आते। उसके बाद फैंक्ट्री में ओवरटाइम ड्यूटी। नाथ ने छोटी उम्र में ही
मां-बाप के बोझ को कम करने की बड़ी कोशिश की।
तार फैक्ट्री से मिलने वाले 6-7 हजार रुपये से घर चले। एकेडमी की
फीस दी जाए या फिर बेटे के खेलने के लिए क्रिकेट किट का इंतजाम हो। 24 घंटे
की ड्यूटी से मिले पैसे भी कम पड़ने लगे, लेकिन जिस सपने के पीछे एक पूरा
परिवार लगा हो, वो सपना ही टूट जाए तो।
ऐसे में मां-बाप और गुरु ने पूरा साथ दिया। उन्हें यकीन था कि आज
भले ही किस्मत ने साथ नहीं दिया लेकिन सफलता नाथू से ज्यादा दिन तक दूर
नहीं रह सकती। मुफलिसी के इस दौर में कोच और दोस्तों की मदद को कोई कैसे
भूला सकता है।
सालों की मेहनत अब जाकर रंग ला रही है। घर की हालत तो अभी ज्यादा
नहीं बदली, लेकिन इस टिन के छप्पर के नीचे पली हसरत अब उड़ान भर चुकी है।
बेटे ने पिता का बोझ तो अभी हल्का नहीं किया लेकिन पिता को इस बात का संतोष
है कि अब बेटे के पास उधार के नहीं बल्कि अपने जूते और क्रिकेट किट हैं।
बेटे की जिम्मेदारियों का बोझ हल्का हुआ तो भरत सिंह अपने दबे सपनों को
पूरा करने लगे।
आज नाथू मैदान पर अक्सर चोट खा जाता है। मां-पिता को दर्द तो होता
है लेकिन जब गली-मोहल्ले वाले या फिर रिश्तेदार बेटे की उपलब्धियों का बखान
करते हैं। तो इस दर्द के साथ ही संघर्षों के दिनों के सभी जख्म छूमंतर हो
जाते हैं।
अगर आने वाले दिनों में नाथू आईपीएल में या फिर टीम इंडिया में
खेलते हुए दिखतें है तो ये बात फिर से साबित होगी प्रतिभा और लगन हर
मुश्किलों को पार करने का सबसे बड़ा हौसला होता है।
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