Tuesday, 4 August 2015

शूटिंग के बीच नवाजुद्दीन को क्रू मेंबर समझा था स्टाफ, भीड़ के साथ खाया खाना

भोपाल. सोमवार को नवाजुद्दीन सिद्दिकी अपनी अगली फिल्म 'मांझी द माउंटेन मैन' को प्रमोट करने भोपाल पहुंचे। उन्होंने बताया कि "भगवान के भरोसे मत बैठो, क्या पता भगवान आपके भरोसे बैठे हों.. फिल्म मांझी में ये एक डायलॉग है, लेकिन मेरी जिंदगी का फॉर्मुला भी यही रहा है।' "ऐसा मौका जिंदगी में बहुत कम आता है जब कोई ऐसा चरित्र आपको निभाने को मिले, जो आइडियल हो। केतन मेहता जी ने जब यह कहानी मुझे सुनाई, मैंने सिर्फ एक लाइन सुनकर हां बोल दिया। क्योंकि केतन जी हमेशा ऐसा सब्जेक्ट चुनते हैं जो जमीनी हकीकत से जुड़ा होता है। दशरथ मांझी तो ऐसे व्यक्तित्व थे, जो हर एक के प्रेरणा स्रोत बने। एक इंसान जो सिर्फ छैनी हथौड़े से पहाड़ काट सकता है। प्यार के लिए अपनी जिंदगी के 22 साल पहाड़ों की मिट्टी में लगा देने वाले दशरथ का चरित्र निभाना मेरा सौभाग्य कहा जाएगा। इस फिल्म के लिए काफी रिसर्च की। मैने वो तमाम वीडियो देखे, जिनमें उनकी चाल-ढाल बोलने का तरीका, सब अपने ज़हन में उतारा। उनके गांव गया। गांव वालों, उनके बेटे बहू से उनके बारे में जाना कि किस तरह दुबली-पतली कद काठी वाले दशरथ मांझी ने अपने काम को काफी एंजॉय किया।' शूटिंग के दौरान एक बार स्टाफ ने मुझे क्रू मेंबर समझ लिया था। और बोला की वहां भीड़ में जाकर खाना खाओ। मैं भी भीड़ के साथ खाना खाने चला गया।
पिछले कान का सूट है मेरे पास
जब पहली दफा कान फिल्म फेस्टिवल में मेरी तीन फिल्में गई थीं, तो मैं डिजाइनर्स के पास ड्रेस बनवाने गया। तब किसी ने भी मेरी बात का यकीन नहीं किया और मेरे लिए ड्रेस बनाने से मना भी कर दिया। मुझे जल्दी थी, सो मैंने काला कपड़ा खरीदा और एक टेलर से सूट और बो बनवा लिया। अगले साल भी मेरी तीन फिल्में कान फिल्म फेस्टिवल में पहुंचीं। उस वक्त सभी बड़े डिजाइनर्स ने मुझसे कहा कि वे मेरे लिए ड्रेस बनाना चाहते हैं, लेकिन मैंने उनसे कह दिया, पिछले कान का सूट रखा है मेरे पास।
दरअसल फैशन कभी मेरा फोर्टे नहीं रहा। मैं वही पहनता हूं जो मुझे ठीक लगता है। मेरी पत्नी और भाई अक्सर मेरे पीछे पड़े रहते हैं कि कुछ तो ऐसा पहन लिया करो जो फैशन में हो, लेकिन मुझे ये सही नहीं लगता। हालांकि अच्छा लगता है जब लोग वो फॉलो करने लगते हैं, जो आपका स्टाइल होता है।
पहले गमछा पहनता था, अब स्कार्फ पहनता हूं
"मैंने कभी सोचा ही नहीं फैशन या स्टाइल के बारे में। जो पहले पहनता था, आज भी वही पहनता हूं। एनएसडी के दौरान मुझे गले में स्कार्फ पहनने का शौक था, लेकिन तब मैं गमछा पहनता था। आज भी पहनता हूं, बस उस कपड़े की क्वालिटी बेहतर हो गई है। एक्टर बनने से लाइफ स्टाइल तो नहीं, हां लेकिन एक बात में बदलाव अाया कि पहले मैं किसी को कोई बात कहता था, तो कोई सुनता नहीं था, लेकिन अब सब सुनते हैं, बिलीव करते हैं। साथ ही लगता है कि इज्जत काम की होती है, इसलिए उसी को तवज्जो देता हूं।

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