Friday, 14 August 2015

आजादी की पहली सुबह इन उस्ताद ने बजाई थी शहनाई, निकला था इंद्रधनुष

नई दिल्ली। 1947 में जब भारत आज़ाद होने को हुआ तो पंडित जवाहरलाल नेहरू का मन हुआ कि इस मौके पर बिस्मिल्लाह खां शहनाई बजाएं। स्वतंत्रता दिवस समारोह का इंतज़ाम देख रहे संयुक्त सचिव बदरुद्दीन तैयबजी को ये जिम्मेदारी दी गई कि वो खां साहब को ढ़ूढें और उन्हें दिल्ली आने के लिए आमंत्रित करें। बिस्मिल्लाह खां और उनके साथियों ने राग काफी बजा कर आजादी की पहली सुबह का स्वागत किया। और उसी समय आसमान पर इंद्रधनुष निकल आया। इसके बाद पंडित नेहरू ने झंडावंदन किया। इस बात का जिक्र माउंटबेटन ने अपनी रिपोर्ट में भी किया है।
बिस्मिल्लाह खां उस समय मुंबई में थे। (कुछ लोग यह भी कहते हैं कि उस समय खां साहब बनारस में उन्हें एयरफोर्स के विमान से दिल्ली लाया गया) उन्हें हवाई जहाज से दिल्ली लाया गया और सुजान सिंह पार्क में राजकीय अतिथि के तौर पर ठहराया गया। वह इस बड़े अवसर पर शहनाई बजाने का मौका मिलने पर उत्साहित थे, लेकिन उन्होंने पंडित नेहरू से कहा कि वो लाल किले पर चलते हुए शहनाई नहीं बजा पाएंगे। नेहरूजी ने उनसे कहा, आप लाल किले पर एक साधारण कलाकार की तरह नहीं चलेंगे। आप आगे चलेंगे. आपके पीछे मैं और पूरा देश चलेगा। बिस्मिल्लाह खां और उनके साथियों ने राग काफ़ी बजा कर आजादी की उस सुबह का स्वागत किया। 1997 में जब आजादी की पचासवीं सालगिरह मनाई गई तो बिस्मिल्लाह ख़ाँ को लाल किले की प्राचीर से शहनाई बजाने के लिए फिर आमंत्रित किया गया।
शहनाई से माहौल हुआ खुशगवार
पंडित जवाहर लाल नेहरू के लालकिले पर आजादी के ध्वज को फहराए जाने से पहले उस्ताद बिस्मिल्लाह खान ने शहनाई बजाकर पूरे माहौल को खुशगवार बना दिया था। 15 अगस्त 1947 के दिन वायसरायलॉज (अब राष्ट्रपति भवन ) में जब नई सरकार को शपथ दिलाई जा रही थी, तो लॉज के सेंट्रल होम पर सुबह साढ़े दस बजे आजाद भारत का राष्ट्रीय ध्वज पहली बार फहराया गया था। इससे पूर्व 14-15 अगस्त की रात को स्वतंत्र भारत का राष्ट्रीय ध्वज कौंसिल हाउस के उपर फहराया गया, जिसे आज संसद भवन के रूप में जाना जाता है। इससे पहले 14 अगस्त 1947 की शाम को ही वायसराय हाउस के ऊपर से यूनियनजैक को उतार लिया गया था।
आया था इंद्रधनुष नजर
जिस समय प्रधानमंत्री वहां झंडा फहराने जा रहे थे उसी समय साफ खुले आसमान में जाने कैसे इंद्रधनुष नजर आया और उसे देखकर वहां जमा भीड़ हतप्रभ रह गयी। इस घटना का जिक्र माउंटबेटन ने 16 अगस्त 1947 को लिखी अपनी 17वीं रिपोर्ट में भी किया है, जिसे उन्होंने ब्रिटिश क्राउन को सौंपा था। उन्होंने रिपोर्ट में इंद्रधनुष के रहस्यमय तरीके से उजागर होने का जिक्र किया।

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