Thursday, 6 August 2015

तालाब से हरियाली और खुशहाली

तालाब बनाओ लाभ पाओ' का नारा महोबा में असर दिखाने लगा है। वर्षा जल संचयन और पानी के परंपरागत स्रोतों की तरफ यहां के लोगों का रुझान बढ़ा है। उनमें एक उम्मीद और विश्वास का भाव जगा है। वे यह मानने लगे हैं कि बुंदेलखंड का यह क्षेत्र उनके सार्थक पहल से पानी की कमी पूरी कर सकता है। चौपाल-गोष्ठियों में इसकी चर्चा हो रही है। नाउम्मीदी का वातावरण धीरे-धीरे खत्म हो रहा है। 'बूंदें ही रचेंगी बुंदेलखंड' विषय पर आयोजित मीडिया चौपाल में यही वातावरण था।

जिले के आला अधिकारी भी इस दिशा में कदम बढ़ाने वाले 'अपना तालाब अभियान समिति' के अब मुरीद हो गए हैं। वे भी मानते हैं कि पानी के संचयन से ही बुंदेलखंड में सूखा और पलायन पर काबू पाया जा सकता है। जल संकट को दूर कर खेतों में हरियाली और किसानों के चेहरे पर मुस्कान लाई जा सकती है। यह सालाना जलसा था, जिसमें महोबा के आला अधिकारी, समिति के कार्यकर्ता और देश के कई हिस्सों से सामाजिक कार्यकर्ता उपस्थित हुए थे।

अभी दो साल हुए हैं, अपना तालाब अभियान समिति के लोग महोबा के किसानों को निजी तालाब बनाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। अब तक इलाके में लगभग चार सौ तालाब बन चुके हैं। जिले में अपना तालाब अभियान समिति का साझा प्रयास आंदोलन का रूप ले चुका है। यह तथ्य विभिन्न कार्यों को देखने और स्थानीय लोगों से बातचीत में उभर कर आई है।

तालाब अभियान से महोबा के किसानों की स्थिति बदलती हुई दिख रही है। पहले किसानों को कम पानी से होने वाले मोटे अनाज से ही संतोष करना पड़ता था। एक फसल लेने के बाद खेती को पूरा मान लिया जाता था, लेकिन अब किसान दो-दो फसल लेने की तैयारी कर रहे हैं। काकुन, बरबई और सूपा जैसे गांवों की तो किस्मत ही बदलने लगी है। बरबई गांव के किसान बृजराज सिंह दो सौ बीघे के किसान हैं। पहले वे बरसात के भरोसे एक फसल लेकर ही अपनी खेती को पूरा समझ बैठे थे, लेकिन तालाब की बदौलत आज वह आंवला और अमरूद की खेती कर रहे हैं। उनके खेत में धान की फसल भी लहलहा रही है।

काकुन गांव के किसान प्रमोद मिश्र कहते हैं, 'इस गांव में हमारे पूर्वजों ने भी फलदार वृक्ष नहीं देखे।’ अपने बगीचे को दिखाते हुए वे कहते हैं कि तालाब बनाने के बाद मुझे खेती के लिए पर्याप्त पानी तो मिल ही रहा है, इसलिए आम, आंवला और बेर के पेड़ भी तैयार कर लिया हूं।' सूूपा गांव के किसान नरेंद्र रिछारिया ने अपने खेत में मात्र छह महीने पहले मनरेगा योजना के तहत तालाब खुदवाया था। आज वे मूंगफली की खेती कर रहे हैं।

बरबई गांव के जमींदार परिवार से संबंध रखने वाले अरुण पालीवाल का खेती से कोई खास नाता नहीं था। उनकी पूरी खेती नौकर-चाकर के भरोसे थी, लेकिन अब वे स्वयं खेती में रुचि लेने लगे हैं। अपना तालाब अभियान समिति के मनुहार पर पहले वे छोटा तालाब बनवाए। पहले साल ही उन्हें तालाब का फायदा नजर आया तो दूसरे साल वे एक हेक्टेयर क्षेत्र में तालाब बनाना शुरू कर दिया। वह तालाब अब बनकर तैयार है। उससे सौ बीघा जमीन की सिंचाई हो सकती है। उनके पास तीन सौ बीघा जमीन है।

पहली बरसात में ही उन्हें तालाब का फयादा नजर आने लगा है। वे तालाब से करीब दो सौ मीटर की दूरी पर लगे कई साल पुरानी बोरिंग और कुएं की तरफ इशारा करते हुए कहते हैं कि पहले ट्यूबवेल चलते-चलते पानी कम होता जाता था। तीन इंच पानी की निकासी डेढ़ इंच में बदल जाती थी, लेकिन छोटे तालाब की वजह से इस साल पानी की निकासी थोड़ी भी कम नहीं हुई। कम समय में अधिक सिंचाई हो गई है। इससे बिजली की भी काफी बचत हुई। पहले वर्ष की तुलना में इस साल इसी ट्यूबवेल से डेढ़ गुना अधिक फसल की सिंचाई की गई है। उनके पुत्र अनुराग पालीवाल कहते हैं, "अब हम लोग पानी के साथ कई तरह की योजनाएं बनाने लगे हैं। अगले साल तालाब में मछली पालन कर एक फसली खेती को दो फसली बनाकर किसानों के लिए नई खेती का मार्ग प्रशस्त करेंगे।”

उनका कृषि फार्म सागर-कानपुर राष्ट्रीय राजमार्ग से जुड़े बरबई गांव में स्थित है। दिसंबर में उन्होंने दूसरे खेत पर एक हेक्टेयर का तालाब बनाना शुरू कर दिया था। यह तालाब अब बनकर तैयार है। इस तालाब की गहराई बीस फुट है। उनका कहना है कि बरसात के समय तालाब में जो पानी एकत्र होगा, फव्वारा सिंचाई के माध्यम से सौ बीघे की फसल को सींचा जा सकता है। यह तालाब राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण के सहयोग से बना है।

पानी के संकट से पूरा बुंदेलखंड जूझ रहा है, किंतु महोबा में समस्या कुछ ज्यादा ही गंभीर है। खेतों की सिंचाईं करने की बात तो दूर गई, कई इलाकों में पीने के लिए भी पानी नहीं है। भूमिगत जल की स्थिति दयनीय है। पानी न मिलने से लोग खेती-किसानी नहीं कर पा रहे हैं। काम न होने की वजह से बड़ी संख्या में युवक रोजी-रोटी की तलाश में महानगरों को पलायन कर जाते हैं। ग्रामीणों का पलायन रोकने और किसानों की दुर्दशा सुधारने के लिए कुछ समाजसेवियों ने पहल की है। इन लोगों ने सिंचाई के परंपरागत साधन यानी छोटे-छोटे तालाब बनवाने की योजना बनाई। आखिर इतने बड़े तालाब की जरूरत क्या है? यह पूछने पर वे कहते हैं कि, सीधा सा हिसाब है। एक गुना निकालो, दस-बीस गुना पालो। उनका मानना है कि खेत की एक गुना मिट्टी निकालने पर दस-बीस गुना भू-भाग की फसलों के लिए वर्षा जल संचित किया जा सकता है। जिससे गुणात्मक उत्पादन मिलना तय है। अपने दोनों तालाबों से पालीवाल को भरोसा है कि बमुश्किल तीन से चार क्विंटल प्रति एकड़ होने वाला अधिकतम उत्पादन आसानी से आठ से दस क्विंटल प्रति एकड़ में पहुंच जाएगा।

उनके पुत्र अनुराग पालीवाल जो एक समय खेती को अपने जीवन में बहुत उपयोगी नहीं समझ रहे थे। खेती की जगह कोई दूसरा व्यापार करने की कोशिश कर रहे थे। अब अनुराग का भरोसा लौटा है। उनमें यह विश्वास पैदा हो रहा है कि तालाब बनने से जमीन की उपज से ही परिवार की जरूरत के साथ-साथ सम्मान सहित जीवन जीया जा सकता है।

जिले में कृषि की संभावना के बारे में सवाल करने पर महोबा के उप निदेशक (कृषि) आरपी चौधरी कहते हैं, 'जिले में कुल कृषि योग्य भूमि 2,36,329 हेक्टेयर है, जिनमें 2,13,777 हेक्टेयर पर रबी और 98 हेक्टेयर पर खरीफ फसल की खेती होती है। पानी के अभाव में ज्यादातर जमीन पर एक ही फसल हो पाती है। वह भी रवि की फसल, जिसमें पानी कम लगता है।'


तालाब बना तो बनने लगा आशियाना


चिचारा गांव में जन्मा किसान का बेटा गोकुल पढ़ाई के लिए एक बार शहर गया तो गांव कभी-कभार ही आता था। वन विभाग में फॉरेस्ट गार्ड की नौकरी मिलने के बाद तो गांव से उसका रिश्ता नाम मात्र का ही रह गया। वर्तमान में वह महोबा के चरखारी रेंज में वन दरोगा है। 9 मई, 2013 को अपना तालाब अभियान की विकास भवन महोबा में आयोजित बैठक में गोकुल भी उपस्थित था। उसने भी अन्य किसानों के साथ अपना तालाब बनाने का संकल्प लिया। गोकुल के तालाब के प्रथम निर्माण कार्य का कुल खर्चा 43 हजार रुपए आया है। यह तालाब छह एकड़ जमीन की फसल को एक पानी देने का जरिया बन गया है।

गोकुल पहले अपनी सरकारी नौकरी से जाना जाता था, लेकिन अब वह किसान बन चुका है। पहले वह सिर्फ नाम का किसान था। गोकुल अपने हाथ से न तो किसानी करता था, न खेती को तवज्जो देता था। इसी कारण गोकुल को बटाईदार से जो भी चैत-बैशाख में मिलता मन मारकर ले लेता।

गोकुल को खेती में पानी की जरूरत तो महसूस होती थी। उसे भी लगता था कि अपने खेत पर पानी का पुख्ता प्रबंध हो जाए, तो खेती का उत्पादन बढ़ जाएगा। पर क्या करता, उस गांव में कुंआ और बोरिंग सफल ही नहीं हो पा रहे थे। यही वजह थी कि वह हिम्मत भी नहीं जुटा पाता था, लेकिन अब स्थिति बदल गई है। हालांकि गांव के बाशिंदे पहले गोकुल के इस निर्णय को उसका पागलपन ही समझते थे।

गोकुल के तालाब के आकार-प्रकार को देखकर यही कहते थे कि गोकुल ने ज्यादा पैसे कमा लिए होंगे, जिसे खेत में बर्बाद कर रहा है। पर अब गांव में उन्हीं बाशिंदों के नजरिए में बदलाव दिख रहा है। इस बदलाव की वजह गोकुल के खेत में हरी-भरी फसल है, जिसकी सिंचाई तालाब में संचित वर्षा के पानी से की गई है। इस साल गोकुल ने अपने खेत में तालाब के पानी की उपलब्धता का अनुमान लगाकर बीजों को तय कर बोया था।

अपने खेत के सवा एकड़ क्षेत्र में गेहूं, चार एकड़ में मटर, आधा एकड़ में देशी धनियां तालाब के भीटों पर अरहर की फसल बोई थी। इन फसलों को देखकर चिचारा गांव के किसानों पर भी असरकारी प्रभाव हुआ है। इसके लिए स्वयं गोकुल से पूछते नजर आ रहे हैं। तालाब बनाने में आई लागत और सिंचाई के खर्चों का विवरण चिचारा के किसानों को गोकुल बताते हैं। फिलहाल वह गांव में गिर चुके अपने पुराने मकान की जगह नया मकान बना रहा है।

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