वर्तमान में प्राय: हर व्यक्ति के मुंह से यह शब्द सुनाई देता है कि हर व्यक्ति के अंदर कोई न कोई बुराई होती है। अगर बुराई न हो तो व्यक्ति भगवान के समान हो जाता है। समाज में अत्यंत श्रद्धा भाव का पात्र बनने में उस व्यक्ति को देर नहीं लगती। कहने का मतलब यही है कि व्यक्ति को यह बात अच्छी तरह से पता होती है कि उसके अंदर भी बुराई है। जिसके कारण उसे यह भान भी रहता है कि समाज मेरी स्वयं की बुराई का अच्छी प्रकार से अध्ययन करता है। बुराई का आभास होने पर व्यक्ति के मन में एक ग्लानि का भाव जन्म लेता है। इसी ग्लानि के भाव के कारण ही वह व्यक्ति कुछ व्यक्तियों के लिए दिखावे के लिए आदर का असत्य पात्र बन जाता है, जबकि उसे यह बात अच्छी प्रकार से पता होती है कि जो व्यक्ति उसे सम्मान दे रहे हैं, वह झूठ का पुलिंदा मात्र है, इस सम्मान में सत्य का समावेश नहीं है। भारत की सांस्कृतिक भाषा में इसे आसुरी प्रवृति निरूपित किया जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।
इसमें एक बात यह भी कहना समीचीन होगा कि जब कोई व्यक्ति इस बुराई को अच्छाई के तौर पर स्वीकार करता है, तब उससे सुधार करने की कल्पना भी नहीं की जा सकती। लेकिन अच्छी बात यही कही जा सकती है कि व्यक्ति को बुराई का अहसास है। व्यक्ति का मन भी इसे बुराई ही मानता है। इसलिए यह माना जा सकता है कि व्यक्ति को अच्छाई और सच्चाई का बोध है। कहा जाता है कि जो व्यक्ति पहली बार किसी गलत काम की ओर प्रवृत होता है, तब उसकी आत्मा उसको जरूर यह संदेश देती है कि जो काम किया जा रहा है वह गलत है। हमारी मान्यता है कि व्यक्ति के अंदर जो आत्मा है उसी के कारण व्यक्ति का जीवन संचालित होता है, जब आत्मा ही जीवन को चला रही है, तब हम आत्मा की आवाज को अनसुना कैसे कर सकते हैं! यह भी अकाट्य सत्य है कि आत्मा परमात्मा का अंश है, सीधे शब्द में कहा जाए तो देव शक्ति है। देव शक्ति हमें गलत कार्य करने से रोकती है, अगर इसके बाद भी हम गलत काम करते हैं तो यही माना जाएगा कि हम पर आसुरी प्रवृतियां हावी है। यह प्रामाणिक तौर पर कहा जा सकता है कि हमारे मन में सदैव देव और दानव शक्ति का संग्राम चलता रहता है, लेकिन यह हमारे विवेक पर निर्भर करता है कि हम अपने जीवन में किस शक्ति को समाहित करें और किसका त्याग करें।
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