दिल्ली
अगर कोई आता है तो एक बार चांदनी चौक घूमने जरूर जाता है। मुगल बादशाह
शाहजहां का बनवाया लाल किला दिल्ली के मुख्य पर्यटक स्थलों में से एक है।
इस किले के सामने ही है 'चांदनी चौक'। शाहजहां की बेटी जहां-आरा ने इसे
डिजाइन किया था। भारत का सबसे बड़ा होलसेल मार्केट चांदनी चौक में ही हैं।
प्राचीन समय में इस मार्केट के बीच से एक नहर गुजरती थी जिसमें चांद की
रौशनी से बाजार की खूबसूरती देखते बनती थी। आज चौक तो हैं पर चांदनी गायब
है। इस बाजार में दुकानें ऐसे बनाई गई थी कि यह देखने में आधा चंद्रमा लगती
थी। इस बाजार की पहचान थी इस नहर में चमकती चांद की रोशनी। मगर वह सुंदरता
अब ढूंढे नहीं मिलती। सच तो यह है कि बाजार में भीड़भाड़, टैफिक का दबाव
और बनावटीपन से चांदनी चौक की मौलिकता खत्म हो गई है।
गुरुद्वारा
शीशगंज, चौक कोतवाली (घंटाघर) जिसे प्राचीन समय में जौहरी बाजार कहते थे,
फतेहपुर बाजार, चुन्नामल हवेली, कूचा महाजनी, कटरा नील, परांठे वाली गली यह
सब चांदनी चौक की खास गलियों में शामिल हैं। यहां गुरुद्वारा शीश गंज
साहिब का निर्माण 1783 में हुआ। इसके अलावा गौरी शंकर मंदिर का निर्माण
1761 में हुआ। इसके अलावा लाल जैन मंदिर भी दर्शनीय है।
चांदनी
चौक मुख्य रूप से कपड़ों का बाजार हैं। साथ ही यह तरह-तरह के व्यंजन और
लाजवाब मिठाइयों के लिए मशहूर हैं। इसके अलावा यहां इलेक्ट्रानिक सामान,
चमड़े के उत्पाद, जूते आदि की खरीदारी की जा सकती है। यहां शुद्ध घी में
बनी जलेबी मशहूर है। स्थानीय लोगों की यह पसंद तो है ही, पर्यटक भी इसे
खाने आते हैं।
अगर खरीददाीर के मूड से चांदनी चौक जा
रहे हैं। तो जान लीजिए यह दिल्ली की सबसे बड़ा होलसेल मार्केट हैं। यहां
आपको हर चीज होलसेल दाम पर मिल जाएगी। क्लाथ मार्केट, नई सड़क, लालकुआं,
तिलक मार्केट यह सब यहां खरीदारी की जगह हैं। अगर गहनें खरीदने का मन हैं
तो दरीबा बेहतर है।
व्यंजनों के मामले में चांदनी
चौक प्राचीन समय से ही मशहूर हैं। यहां की दुकानें बेहद पुरानी हैं। जैसे
घंटे वाला हलवाई की दुकान 1790 में शुरू हुई थी। नटराज दही भल्ले (1940)।
बाद में कई दुकानें बनीं जैसे चाटवाला, गियानीजी का फलूदा, कनवारजी
भागीरथमल परांठे वाली गली के परांठे खाने देश-विदेश से लोग आते हैं। इस गली
की दुकानों की शुरूआत 1875 से 1886 में हुई थी।
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