भारत
के लगभग सभी प्रांतों में पाया जाने वाला आक आस्ले पिआदसी परिवार का सदस्य
है। इसका वानस्पतिक नाम कालोत्रोपिस प्रोचेरा (ऐटन) आर ब्राउन है। गरम और
शुष्क स्थानों पर यह विशेष रूप से पाया जाता है। अक्सर इसे नदी−नालों की
पटरियों तथा रेलवे लाइन के किनारे−किनारे उगा देखा जा सकता है। यह बहुतायत
में पाया जाता है। क्योंकि पशु इसे नुकसान नहीं पहुंचाते।
आक
एक झाड़ीनुमा पौधा है जिसकी ऊंचाई 5 से 8 फीट होती है। इसके फूल जामनी−लाल
बाहर से रूपहले होते हैं। आक के सभी अंग मोम जैसी सफेद परत से ढंके रहते
हैं। इसके सभी अंगों से सफेद दूध जैसा तरल पदार्थ निकलता है। जिसे आक का
दूध कहते हैं। आक प्रायः दो प्रकार का होता है लाल तथा सफेद। लाल आक आसानी
से सब जगह पाया जाता है। यों तो यह पौधा वर्ष भर फलता−फूलता है। परन्तु
सर्दियों के मौसम में यह विशेष रूप से बढ़ता है।
आक
के सभी अंग जड़, पत्ते, फूल एवं दूध औषधि के रूप में बहुत उपयोगी होते
हैं। आक के जड़ की छाल तिक्त, पाचक, दीमक, वामक एवं बल्य रसायन युक्त होती
है। इसके पत्तों एवं डंठलों में कैलॉट्रोपिन तथा कैलॉट्रोपेगिन रसायन पाए
जाते हैं।
चोट−मोच, जोड़ों की सूजन (शोथ) में आक के
दूध में नमक मिलाकर लगाना चाहिए। आक के दूध को हल्दी और तिल के साथ उबालकर
मालिश करने से आयवात, त्वचा रोग, दाद, छाजन आदि ठीक होता है। आक की छाल के
प्रयोग से पाचन संस्थान मजबूत होता है। अतिसार और आव होने की स्थिति में भी
आक की छाल लाभदायक सिद्ध होती है। इससे रोगी को वमन की आशंका भी कम होती
है। मरोड़ के दस्त होने पर आक के जड़ की छाल 200 ग्राम, जीरा तथा जवाखार
100−100 ग्राम और अफीम 50 ग्राम सबको महीन चूर्ण करके पानी के साथ गीला
करके छोटी−छोटी गोलियां बना लें। रोगी को एक−एक गोली दिन में तीन बार दें
इससे तुरन्त लाभ होगा।
त्वचीय रोगों के इलाज में आक
विशेष रूप से उपयोगी होता है। लगभग सभी त्वचा रोगों में आक की छाल को पानी
में घिसकर प्रभावित भाग पर लगाया जाता है। यदि त्वचा पर खुजली अधिक हो तो
छाल को नीम के तेल में घिसकर लगाया जा सकता है। श्वेत कुष्ठ में भी इसके
प्रयोग से फायदा मिलता है। आक के सूखे पत्तों का चूर्ण श्वेत कुष्ठ
प्रभावित स्थानों पर लगाने से तुरन्त लाभ मिलता है। इस चूर्ण को किसी तेल
या मलहम में मिलाकर भी लगाया जा सकता है।
बिच्छू के
काटने पर विष उतारने के लिए आक की जड़ को पानी में पीसकर लेप लगाया जाता
है। कुत्ते के काट लेने पर दंश स्थान पर या काटने से बने घाव में आक का दूध
अच्छी तरह भर देना चाहिए। इससे विष का प्रभाव खत्म हो जाता है और फिर कोई
परेशानी नहीं होती।
आक के पत्तों का चूर्ण लगाने से
पुराने से पुराना घाव भी ठीक हो जाता है। कांटा, फांस आदि चुभने पर आक के
पत्ते में तेल चुपड़कर उसे गर्म करके बांधते हैं। जीर्ण ज्वर के इलाज के
लिए आक को कुचलकर लगभग बारह घंटे गर्म पानी में भिगो दे, इसके बाद इसे खूब
रगड़−रगड़ कर कपड़े से छान कर इसका सेवन करें इससे शीघ्र फायदा पहुंचता है।
मलेरिया के बुखार में इसकी छाल पान से खिलाते हैं। किसी गुम चोट पर मोच के
इलाज के लिए आक के पत्ते को सरसों के तेल में पकाकर उससे मालिश करनी
चाहिए।
कान और कनपटी में गांठ निकलने एवं सूजन होने
पर आक के पत्ते पर चिकनाई लगाकर हल्का गर्म करके बांधते हैं। कान में दर्द
हो तो आक के सूखे पत्ते पर घी लगाकर, आग पर सेंककर उसका रस निकालकर ठंडा कर
कान में एक बूंद डालें।
खांसी होने पर आक के फूलों
को राब में उबालकर सेवन करने से आराम पहुंचता है। दमे के उपचार के लिए तो
आक एक रामबाण औषधि है। आक के पीले पड़े पत्ते लेकर चूना तथा नमक बराबर
मात्रा में लेकर, पानी में घोलकर उसके पत्तों पर लेप करें। इन पत्तों को
धूप में सुखाकर मिट्टी की हांड़ी में बंद करके उपलों की आग में रखकर भस्म
बना लें। इस भस्म की दो−दो ग्राम मात्रा का दिन में दो बार सेवन करने से
दमे में आश्चर्यजनक लाभ होता है। इस दवा के सेवन के साथ−साथ यह भी जरूरी है
कि रोगी दही तथा खटाई का सेवन नहीं करे।
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