सर्रे
विश्वविद्यालय के डॉक्टर प्रशांत कुमार ने कहा, ‘‘वायु प्रदूषण विश्व भर
में मानव स्वास्थ्य के लिए शीर्ष दस खतरों में शुमार है। वायु प्रदूषण के
कारण एक साल में होने वाली हजारों अतिरिक्त मौतों के चलते दिल्ली को प्राय:
विश्व का सबसे प्रदूषित शहर कहा जाता है।’’ कुमार ने कहा कि इसके लिए
वाहनों की बढ़ती संख्या, औद्योगिक उत्पादन या बढ़ती जनसंख्या को जिम्मेदार
ठहराना आसान है लेकिन सच यह है कि असंख्य तत्वों के चलते दिल्ली सबसे
प्रदूषित शहर बन गया है और इन सभी तत्वों से निपटने की आवश्यकता है। दिल्ली
विश्व के सबसे अधिक जनसंख्या वाले स्थानों में शामिल है। विश्व के पांचवें
सबसे बड़े महानगर में 2–58 करोड़ लोग रहते हैं और यह संख्या लगातार बढ़ती
जा रही है।
अनुसंधानकर्ताओं ने कहा कि विकास की
इस
गति के हिसाब से वाहनों की संख्या वर्ष 2010 के 47 लाख की तुलना में वर्ष
2030 तक बढ़कर 2.6 करोड़ हो जायेगी। वहीं दिल्ली में वर्ष 2001 से वर्ष
2011 तक ऊर्जा की खपत में 57 फीसदी की वृद्धि हुई है। दूसरी ओर दिल्ली जैसे
शहर से प्रदूषित वायु को बाहर निकालना भी संभव नहीं है क्योंकि इसके चारों
ओर मैदानी इलाके हैं। समुद्र तट पर बसे मुंबई जैसे महानगरों में कम से कम
समुद्री हवाओं से प्रदूषित हवाओं की अदला-बदली की संभावना है।
वहीं
दिल्ली के आसपास के इलाके कई बार इस महानगर से भी अधिक प्रदूषित होते हैं।
अनुसंधानकर्ताओं ने कहा कि ईंट बनाने के लिए प्रयुक्त भट्टे शहर में स्थित
नहीं हैं लेकिन आसपास के औद्योगिक इलाकों की प्रदूषित हवा इस दिशा में आती
है। इन बाह्य प्रदूषकों में कच्ची लकड़ियों जैसी निम्न गुणवत्ता वाले
ईंधन, कृषि और प्लास्टिक कचरा, उपला और डीजल जेनरेटरों के वृहत पैमाने पर
उपयोग के कारण उत्पन्न प्रदूषण शामिल हैं। पिछले साल मई में विश्व
स्वास्थ्य संगठन द्वारा जारी रिपोर्ट में दिल्ली को विश्व का सबसे प्रदूषित
शहर माना गया। इस अध्ययन का प्रकाशन एटमॉसफेरिक इन्वायरमेंट नामक जर्नल
में हुआ है।
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