Sunday, 2 August 2015

राष्ट्रपति भवन, संसद अपनी जगह से हटेंगे? किसान ने मांगा 15000 करोड़ का मुआवजा


नई दिल्ली. सज्जन सिंह हरियाणा में सोनीपत के एक छोटे किसान हैं। सिर्फ दो बीघा ज़मीन के मालिक हैं। लेकिन डेढ़ महीने पहले उन्होंने एक और ज़मीन पर क़ब्ज़े के लिए दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया है। मालचा गाँव की इस 155 बीघा ज़मीन पर भव्य सरकारी इमारतें बनी हैं। राष्ट्रपति भवन और संसद के अलावा उत्तर प्रदेश भवन, कर्नाटक भवन, छत्तीसगढ़ भवन है। मौर्या शेरेटन और ताज महल जैसे पांच सितारा होटल भी इसी जमीन पर हैं। सज्जन सिंह को भरोसा है कि एक लाख रुपए वर्ग गज के भाव वाली इस ज़मीन का या तो मालिकाना हक़ उन्हें मिलेगा वरना सरकार इसका मुआवज़ा देगी। क्योंकि संसद में लंबित लैंड बिल अगर पास हो भी जाए तो भी रेट्रोस्पेक्टिव तरीके से लागू नहीं हो सकता। मौजूदा बाज़ार भाव पर इस ज़मीन की क़ीमत पंद्रह हज़ार करोड़ रुपए है।
सज्जन सिंह के भरोसे की वजह है भूमि अधिग्रहण क़ानून 2013 की धारा 24(2) जिसके अनुसार किसान की ज़मीन का अधिग्रहण होने के पांच साल के अंदर ही उसे उसका मुआवज़ा मिल जाना चाहिए। नहीं तो अधिग्रहण ख़ारिज कर ज़मीन उसके मालिक को वापस कर दी जाएगी। पिछले साल एक जनवरी से लागू इस क़ानून के तहत देश भर की अदालतों में किसानों के हक़ में रोज़ दर्जनों फ़ैसले हो रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट से लेकर विभिन्न राज्यों के हाईकोर्ट तक। दक्षिण दिल्ली के मांडी गाँव, सतबड़ी, रंगपुरी और बमनौली जैसे गाँवों में
कई बेशक़ीमती प्लॉट्स उनके मालिकों को वापस दे दिए गए हैं।
सज्जन सिंह का केस लड़ रहे डॉ. सूरत सिंह कहते हैं सज्जन के परदादा शादीराम की 155 बीघा ज़मीन केंद्र सरकार ने राजधानी बनाने के लिए ली थी। उसका मुआवज़ा 2217 रुपए 10 आने और 11 पैसे तय किया था। लेकिन शादीराम ने मुआवज़ा कम बताते हुए उसे स्वीकार करने से इंकार कर दिया था। पिछले साल नया क़ानून बनने के बाद सज्जन ने नए सिरे से कोशिशें शुरू कीं।
हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय और दिल्ली सरकार के शहरी विकास विभाग को जवाब दाख़िल करने के निर्देश दिए हैं। 30 जुलाई को कोर्ट को सौंपे अपने हलफ़नामे में केंद्र सरकार ने कहा है कि संबंधित दस्तावेज़ उसके पास न होने से उसे मामले की जानकारी नहीं है। दस्तावेज़ दिल्ली सरकार के पास हैं। दिल्ली सरकार की ओर से जवाब देने के लिए उपराज्यपाल ने चार हफ्ते की मोहलत मांगी है।
इस बीच, डॉ. सूरत सिंह रायसीना और मालचा गांवों की जमीनों की ऐसी चार और याचिकाएं दाख़िल कर चुके हैं। जिनमें दिल्ली कैंट की काफ़ी ज़मीन भी है। उन्होंने भास्कर को बताया - सेंट्रल दिल्ली की ऐसी कुल ज़मीन जिसका मुआवज़ा नहीं दिया गया लगभग 17 हज़ार एकड़ है जिसकी मौजूदा क़ीमत सात लाख करोड़ के आसपास होगी। अगर ये सभी किसान मुआवजा माँगने कोर्ट पहुँचे तो संभवत: यह दुनिया का सबसे बड़ा मुआवज़े का मामला होगा।
ज़मीन अधिग्रहण मामलों के लीगल एक्सपर्ट मोहम्मद खान कहते हैं - अभी तक सबसे पुराना मुक़दमे तीस साल पहले का था जिसका फ़ैसला ओडिशा हाईकोर्ट ने सुनाया। सौ साल पुराना यह पहला केस आया है। इस मामले में संभव है कि अदालत अधिग्रहण रद्द कर दे, लेकिन चूंकि ज़मीन इसके मालिकों को वापस किया जाना असंभव है इसलिए सरकार इसका नए सिरे से अधिग्रहण कर सकती है। लेकिन इसके लिए मौजूदा सर्किल रेट से ही मुआवज़ा तय होगा।
क्यों बनाया ऐसा क़ानून
भूमि अधिग्रहण क़ानून 2013 यूपीए सरकार की ग्रामीण विकास मंत्रालय ने बनाया था। तब इस विभाग के प्रभारी मंत्री थे जयराम रमेश। रमेश ने भास्कर को बताया- भट्टा परसौल और नंदीग्राम जैसी घटनाओं से राहुल गांधी दुखी थे। उन्होंने जयराम रमेश से ऐसा क़ानून बनाने को कहा जो किसानों के हितों की रक्षा करता हो। जिसमें ऐसी ज़मीन जो सरकार ने अधिग्रहीत की हो, लेकिन उस पर क़ब्ज़ा न लिया हो या जिसका मुआवजा न दिया गया हो, वह किसानों को वापस कर दी जाए। जिस ज़मीन का सरकार उपयोग नहीं कर रही तो आख़िर उसे सालोंसाल क्यों रखे रहती है।
दस साल लगे दस्तावेज जमा करने में
सज्जन सिंह 2004 से ही अपनी ज़मीन के सत्यापित दस्तावेज़ जमा कर रहे थे। उन्होंने 2011-12 का गजट नोटिफिकेशन निकलवाया जिसमें उन 150 गाँवों का ज़िक्र था जिनकी ज़मीन नई दिल्ली बसाने के लिए अधिग्रहीत की गई थी। फिर उन्होंने तहसील का वह रजिस्टर निकलवाया जिसमें किसानों के नाम, गाँव, ज़मीन का क्षेत्रफल और मुआवजे की राशि का ज़िक्र है। जिन किसानों ने मुआवजा ले लिया इस रजिस्टर में उनके दस्तखत हैं या अंगूठे का निशान है। मुआवजा न लेने वालों का यह कॉलम ख़ाली है।

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