भूकंप त्रासदी ने नेपाल के लोक जीवन की धारा उल्टी मोड़ दी है। काठमांडू
इकलौता महानगर है, जहां पढ़ाई करने, रोजगार पाने और बसने का सपना ज्यादातर
नेपाली नौजवानों का होता है। विराटनगर और वीरगंज जैसे तमाम शहर भी हैं,
लेकिन बिहार में पटना जैसा आकर्षण तो नेपाल में काठमांडू के लिए ही है।
शनिवार यानी 25 अप्रैल से पहले तक काठमांडू की तरफ जाने वाले वाहनों की तादाद ज्यादा रहा करती थीं। लेकिन आज इसके विपरीत काठमांडू से नीचे की तरफ का प्रवाह है। कोई कारोबारी या उद्यमी हो, या फिर नौकरी पेशा या छात्र, सबके सब जितना जल्दी हो काठमांडू छोड़ देना चाहते हैं। बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड और उत्तराखंड के लोग भी बड़ी संख्या में रोजगार- धंधे में लगे हुए हैं। बीते एक सप्ताह में लाखों की संख्या में यहां से पलायन कर चुके हैं।
बोरिया बिस्तर समेट रहे कारोबारी से छात्र तक
काठमांडू में चाहकर भी रहना अब आसान नहीं रह गया है। कारोबार भी चौपट हो गया है। शैलानियों का आना- जाना बंद है। 45 वर्षीय मोनिका अग्रवाल की पीड़ा समझी जा सकती है। मोनिका ने बताया कि उनके परदादा राजस्थान से आकर काठमांडू में बसे थे। उनका यहां इन्द्र चौक पर साड़ी का बड़ा शो रूम है। उनके पति का अन्य कई कारोबार है। कहती है- सबकुछ खत्म हो गया। अब वह सपरिवार राजस्थान लौट रही हैं। यह पूछने पर कि कबतक वापस लौटने का इरादा है, कहती हैं- भगवान जाने।
अभी तो नहीं लगता कि वापस आकर फिर से कारोबार शुरू करना संभव भी हो पाएग। शहर के कलंकी स्थित पड़ाव पर काफी देर से बस का इंतजार कर रहे नौजवान कमल काफले और मिलन सुवेदी ने बताया कि दोनों यहां रहकर पढ़ाई कर रहे थे। अब अपने शहर पोखड़ा लौट रहे हैं। बिहार के सीतामढ़ी निवासी प्रमोद शाह कलंकी में फलों की दुकान चलाते हैं। प्रमोद ने बताया कि उसकी जान- पहचान के करीब दो सौ लोग काठमांडू में सब्जी, जूस और फल बेचकर अपना गुजारा कर रहे थे। वे सब बिहार लौट चुके हैं। उसने अभी हिम्मत नहीं हारी है।
पर्यटन स्थलों को तबाह कर दिया झटकों ने
नेपाल के 22 जिले भूकंप से बुरी तरह प्रभावित हैं। इनमें तमाम पर्यटन स्थल हैं। खासकर गोरखा, ललितपुर, भक्तपुर, धादिंग, लमजुंग, मकवानपुर, रामेछाप, गोलख, नुआकोट, रसुआ आदि जिलों में भयानक क्षति हुई है। पहाड़ों पर गांव के गांव भूकंप की भेंट चढ़ गए हैं। उन स्थानों पर बचाव कार्य ठीक से शुरू भी नहीं हो सके हैं। भारतीय सेना के हेलीकाप्टर से उन स्थानों पर फंसे लोगों को निकालने की कोशिश हो रही है। हालांकि बड़ी संख्या में लोग मलबे में दब गए, उनमें कौन जिन्दा है और कौन जान गंवा बैठा इसका पता भी अभी नहीं चल पा रहा है। गोरखा, धादिंग ललितपुर आदि जिलों से हर रोज सैकड़ों की तादात में घायलों को एंबुलेंस से काठमांडू लाया जा रहा है। ऐसे में नेपाल की सैर पर आने का साहस अगले कुछ महीनों तक कोई जुटा पाएगा यह कहना कठिन है।
शनिवार यानी 25 अप्रैल से पहले तक काठमांडू की तरफ जाने वाले वाहनों की तादाद ज्यादा रहा करती थीं। लेकिन आज इसके विपरीत काठमांडू से नीचे की तरफ का प्रवाह है। कोई कारोबारी या उद्यमी हो, या फिर नौकरी पेशा या छात्र, सबके सब जितना जल्दी हो काठमांडू छोड़ देना चाहते हैं। बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड और उत्तराखंड के लोग भी बड़ी संख्या में रोजगार- धंधे में लगे हुए हैं। बीते एक सप्ताह में लाखों की संख्या में यहां से पलायन कर चुके हैं।
बोरिया बिस्तर समेट रहे कारोबारी से छात्र तक
काठमांडू में चाहकर भी रहना अब आसान नहीं रह गया है। कारोबार भी चौपट हो गया है। शैलानियों का आना- जाना बंद है। 45 वर्षीय मोनिका अग्रवाल की पीड़ा समझी जा सकती है। मोनिका ने बताया कि उनके परदादा राजस्थान से आकर काठमांडू में बसे थे। उनका यहां इन्द्र चौक पर साड़ी का बड़ा शो रूम है। उनके पति का अन्य कई कारोबार है। कहती है- सबकुछ खत्म हो गया। अब वह सपरिवार राजस्थान लौट रही हैं। यह पूछने पर कि कबतक वापस लौटने का इरादा है, कहती हैं- भगवान जाने।
अभी तो नहीं लगता कि वापस आकर फिर से कारोबार शुरू करना संभव भी हो पाएग। शहर के कलंकी स्थित पड़ाव पर काफी देर से बस का इंतजार कर रहे नौजवान कमल काफले और मिलन सुवेदी ने बताया कि दोनों यहां रहकर पढ़ाई कर रहे थे। अब अपने शहर पोखड़ा लौट रहे हैं। बिहार के सीतामढ़ी निवासी प्रमोद शाह कलंकी में फलों की दुकान चलाते हैं। प्रमोद ने बताया कि उसकी जान- पहचान के करीब दो सौ लोग काठमांडू में सब्जी, जूस और फल बेचकर अपना गुजारा कर रहे थे। वे सब बिहार लौट चुके हैं। उसने अभी हिम्मत नहीं हारी है।
पर्यटन स्थलों को तबाह कर दिया झटकों ने
नेपाल के 22 जिले भूकंप से बुरी तरह प्रभावित हैं। इनमें तमाम पर्यटन स्थल हैं। खासकर गोरखा, ललितपुर, भक्तपुर, धादिंग, लमजुंग, मकवानपुर, रामेछाप, गोलख, नुआकोट, रसुआ आदि जिलों में भयानक क्षति हुई है। पहाड़ों पर गांव के गांव भूकंप की भेंट चढ़ गए हैं। उन स्थानों पर बचाव कार्य ठीक से शुरू भी नहीं हो सके हैं। भारतीय सेना के हेलीकाप्टर से उन स्थानों पर फंसे लोगों को निकालने की कोशिश हो रही है। हालांकि बड़ी संख्या में लोग मलबे में दब गए, उनमें कौन जिन्दा है और कौन जान गंवा बैठा इसका पता भी अभी नहीं चल पा रहा है। गोरखा, धादिंग ललितपुर आदि जिलों से हर रोज सैकड़ों की तादात में घायलों को एंबुलेंस से काठमांडू लाया जा रहा है। ऐसे में नेपाल की सैर पर आने का साहस अगले कुछ महीनों तक कोई जुटा पाएगा यह कहना कठिन है।
No comments:
Post a Comment