भारत
की आजादी की लड़ाई का चश्मदीद गवाह और आजादी के मतवालों का प्रेरणास्रोत
रहा लालकिला भव्य और ऐतिहासिक है। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान
अंग्रेजी हुक्मरानों ने आजादी के मतवालों पर ही कहर नहीं बरपाया था बल्कि
मुगल बादशाह शाहजहां के काल में बने इस भव्य किले के कई हिस्सों को भी
जमींदोज कर वहां सेना की बैरकें और कार्यालय बना दिये थे। इस किले को रौशन
करने वाली मुगलिया सल्तनत के आखिरी बादशाह बहादुरशाह जफर को भी कैद कर
रंगून भेज दिया गया था।

आजादी
की लड़ाई के दौरान लालकिले पर तिरंगा फहराने की ख्वाहिश भारत मां की
गुलामी की बेडि़यां काटने को बेकरार मतवालों के दिलों में उफनती रही।
पंद्रह अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ और इसकी प्राचीर पर प्रधानमंत्री पंडित
जवाहर लाल नेहरू ने तिरंगा फहराया। उस समय लालकिला ब्रिटिश फौजों के हाथ से
भारतीय सेना को सौंप दिया गया।
दिल्ली के इतिहास
में ही नहीं भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में भी लालकिला खास
अहमियत रखता है। इसने दिल्ली को जिसे उन दिनों शाहजहांनाबाद के नाम से जाना
जाता था, शाहजहां के आगमन की खुशी में दुल्हन की तरह सजते देखा तो विदेशी
आक्रांताओं के जुल्मों से बेनूर होते हुए भी देखा। यह किला मुगलकाल के ऐशो
आराम, रौनकों, महफिलों, रंगीनियों और प्रजा की खुशहाली का चश्मदीद गवाह रहा
तो इसने विदेशी हमलावरों के जुल्म और लूटपाट से बदहवास और बेनूर
दिल्लीवालों के दिलों में छुपे दर्द को भी देखा।
इस
किले की बुनियाद सन 1639 में रखी गयी थी। इसके निर्माण में 9 वर्ष का समय
लगा था। इसके निर्माण पर एक करोड़ रुपये का खर्च आया जिसमें से आधी रकम
इसके महलों के निर्माण पर खर्च हुई। आज की महंगाई में यह खर्च अरबों रुपये
बैठेगा। इसके निर्माण में ज्यादातर लाल पत्थर का इस्तेमाल किये जाने के
कारण ही इसे लालकिला नाम दिया गया।
इसकी बुनियाद का
पत्थर इज्जत खां की देखभाल में रखा गया। कारीगरों में सबसे बडे़ उस्ताद
अहमद वहामी चुने गये। इज्जत खां की देखरेख में यह काम पांच महीने दो दिन
रहा। इस अर्से में उसने बुनियादें भरवाईं और माल मसाला जमा किया। इज्जत खां
को सिंध जाने का हुक्म मिला और काम अलीवर्दी खां के सुपुर्द कर दिया गया।
बाद में अलीवर्दी खां बंगाल का सूबेदार बन गया और किले का काम उसकी जगह
मुकर्रमत खां के सुपुर्द हुआ जिसने किले की तामीर पूरी करायी। उस वक्त
बादशाह शाहजहां काबुल में था। मुकर्रमत खां ने बादशाह सलामत की सेवा में
निवेदन भेजा कि किला तैयार है।
1648 ई. में एक दिन
बादशाह सलामत हवादार अरबी घोडे़ पर सवार होकर बडे़ समारोह के साथ किला
मोअल्ला में दरिया के दरवाजे से दाखिल हुए। जब तक शाहजहां दरवाजे तक नहीं
पहुंच गए उनका पुत्र दाराशिकोह उनके सिर पर चांदी और सोने के सिक्के वारकर
फेंकता रहा। महलों की सजावट हो चुकी थी और फर्श पर कालीन बिछे हुए थे।
दीवान ए आम की छतों में दीवारों पर और एवानों पर चीन की मखमल और रेशम टंगी
हुई थी। बीच में एक निहायत आलीशान शामियाना लगाया गया था। जिसका नाम दलबादल
था। यह शामियाना अहमदाबाद के शाही कारखाने में तैयार कराया गया था। यह 70
गज लंबा और 45 इंच चौथा था और इसकी कीमत एक लाख रुपये थी। शामियाना चांदी
के स्तूनों पर खड़ा किया गया था और उसमें चांदी का कटहरा लगा हुआ था। दीवान
ए आम में सोने का कटहरा लगा था। तख्त की छत में मोती लगे थे और वह सोने का
खंभों पर खड़ी थी। जिसमें हीरे जड़े हुए थे।
बादशाह
ने इस मौके पर बहुत से आतिये अता फरमाये। बेगम साहिबा को एक लाख रुपये नजर
किये गये, दाराशिकोह को खास खिल्लत और जवाहरात जडे़ हथियार और बीस हजारी
का मनसब, एक हाथी और दो लाख रुपये अता किये गये। इसी प्रकार दूसरे शहजादों,
वजीरे आजम और मनसबदारों को आतिये अता किये गये। मुकर्रमत खां जिसकी
निगरानी में किला तामीर हुआ था उसे पंचहजारी का मनसब अता किया गया। दरबार
बड़ी धूमधाम से समाप्त हुआ।
यह किला अष्टभुजाकार है
और इसके पूर्वी तथा पश्चिमी दोनों किनारे लंबे हैं। उत्तर की ओर यह किला
सलीमगढ़ से एक पुल से जुड़ा है। यह 900 मीटर लंबा और 550 मीटर चौड़ा है और
इसकी प्राचीरें 2.41 किलोमीटर की परिधि में हैं जो ऊंचाई में शहर की ओर
33.5 मीटर और नदी के साथ−साथ 18 मीटर ऊंची हैं। प्राचीरों के बाहर की ओर एक
खंदक है जो प्रारंभ में नदी से जुड़ी हुई थी। महल में किले पूर्वी हिस्से
में हैं जबकि दो भव्य तीन मंजिले प्रवेश द्वार पश्चिमी और दक्षिणी दिशाओं
के मध्य में स्थित हैं।
किले में पांच दरवाजे थे।
लाहौरी और दिल्ली दरवाजा शहर की तरफ और एक दरवाजा दरिया की तरफ सलीमगढ़ में
जाने के लिये था। चौथा था खिड़की या दरियाई दरवाजा और पांचवां दरवाजा असद
बुर्ज के नीचे था। इस तरफ से किश्ती में सवार होकर आगरा जाते थे। किले की
चारदीवारी में बीच−बीच में बुर्ज बने हुए हैं। लाहौरी दरवाजा सदर दरवाजा
था। यह किले की पश्चिमी दीवार के मध्य चांदनी चौक के ठीक सामने पड़ता है।
शाहजहां के वक्त खाई पर से गुजरने के लिये काठ का पुल था। दरवाजे के सामने
एक खूबसूरत बाग लगा हुआ था और इसके आगे चौक था। इस चौक के सामने एक हौज था
जो चांदनी चौक की नहर से मिला हुआ था।

किले
के लाहौरी दरवाजे के सामने एक दीवार है जिसे घूघस या घूंघट की दीवार कहते
हैं। इसे औरंगजेब ने इसलिये बनवाया था कि किले का लाहौरी दरवाजा दुश्मनों
की आंख से बचा रहे और किले में आने वालों को तकलीफ न हो। बात यह थी कि जब
बादशाह के दरबारी चांदनी चौक से किले में जाते थे तो दीवाने आम का तख्त
उनके सामने पड़ता था और उन्हें बादशाह और उसके तख्त का अदब करने के लिये
पैदल चलना पड़ता था। इसलिये औरंगजेब ने यह घोघस बनवा दिया। इस निर्माण से
बाग खत्म हो गया। जब शाहजहां को इस निर्माण के बारे में पता चला तो वह उन
दिनों आगरे में कैद में था तब उन्होंने अपने पुत्र को पत्र लिखकर कहा कि यह
बनवाकर मानो उसने दुल्हन के चेहरे पर घूंघट डाल दिया है।
इसी
तरह दक्षिणी दरवाजा है जिसे दिल्ली दरवाजा कहते हैं। यह जामा मस्जिद की
तरफ है। बादशाह इसी दरवाजे से हर जुम्मे की नमाज पढ़ने जामा मस्जिद जाया
करते थे। औरंगजेब ने इन्हीं दोनों की यह अतिरिक्त किलाबंदी करायी थी। अन्य
किनारों पर तीन और प्रवेश द्वार हैं जिन्हें अब बंद कर दिया गया है।
लालकिले की भव्यता को इंसान और कुदरत दोनों की वहशत झेलनी पड़ी है। सन 1719
में किले और शहर को काफी नुकसान पहुंचा। सन 1756 में मराठों और अहमदशह
दुर्रानी की लड़ाई ने भी यहां की इमारतों को काफी नुकसान पहुंचाया।
गोलाबारी के कारण दीवाने खास, रंगमहल, मोती महल और शाह बुर्ज को काफी
नुकसान पहुंचा।
सन 1857 के विद्रोह के बाद किले के
अंदर की इमारतों का बहुत सा हिस्सा हटा दिया गया। रंगमहल, मुमताज महल और
खुर्दजहां के पश्चिम में स्थित जनता महलात और बागात तथा चांदीमहल खत्म कर
दिये गये। इसी तरह दीवान ए आम के उत्तर में स्थित तोशेखाने, बावर्चीखाने
तथा हयात बाग और महबात बाग का बहुत सा हिस्सा काटकर वहां फौजों के लिये
बैरकें और परेड का मैदान बना दिया गया। हयात बाग के उत्तर तथा किले की
दीवार के बीच में शहजादों के जो महल थे वह गिरा दिये गये।
सन
1859 में हिन्दुस्तानी फौज की छावनी दरियागंज में बना दी गयी और किले में
गौरी पलटन और तोपखाने के लिए बैरक बना दी गयी। इमारतें ढहाकर पांच−पांच सौ
गज का मैदान साफ कर दिया गया। इसी किले की प्राचीर पर 90 वर्ष तक यूनियन
जैक लहराता रहा और 15 अगस्त सन 1947 में पंडित नेहरू ने तिरंगा फहराकर देश
की आजादी का ऐलान किया।