Saturday, 31 October 2015

फिर उठाया पाकिस्तान, लेकिन तुरंत बैकफुट पर

सुशील मोदी का ट्वीटबिहार चुनावों के दौरान बीजेपी किसी न किसी तरह से महागठबंधन को पाकिस्तान से जोड़ने की कोशिश करती रही है.
गठबंधन और पाकिस्तान को बार-बार पाकिस्तान जोड़ने के सवाल पर भाजपा प्रदेश अध्यक्ष मंगल पांडे ने कहा, "पाकिस्तान आतंकवाद का पोषक है और नीतीश ने बिहार में आतंकवाद को बढ़ावा दिया है. उन्होंने बिहार में आतंकवादियों संरक्षण देने और पोषण करने का काम किया है इसलिए उन्हें पाकिस्तान से जोड़ा जा रहा है."
बिहार में मोदी को प्रधानमंत्री का उम्मीदवार चुने जाने तक बीजेपी और जदयू की मिली जूली सरकार थी.
पाक अख़बार में विज्ञापन के मामले पर पांडे का कहा था कि उन्हें जानकारी मिली थी कि "पाकिस्तान में महागठबंधन के विज्ञापन दिख रहे हैं."
जदयू के बिहार अध्यक्ष वशिष्ठ नारायण सिंह ने कहा, "तीन चरणों के बाद बीजेपी को लग गया है कि वह चुनाव हार गई है इसलिए हताशा में धार्मिक उन्माद फैलाने के लिए अफ़वाहों का सहारा ले रही है."
उन्होंने कहा, "बिहार में मोदी की कृत्रिम छवि का पर्दाफ़ाश हो रहा है. अमित शाह की संगठनकर्ता और चाणक्य की छवि भी नष्ट हो रही है. ऐसे में ये बौखलाकर इस तरह की बातें कर रहे हैं."
वहीं पांडे से जब पूछा गया कि पाकिस्तान के बहाने क्या बिहार के मुसलमानों पर निशाना साधा जा रहा है तो उन्होंने कहा, "विश्लेषक अपनी तरह से समझने के लिए स्वतंत्र हैं."

एकसाथ पूरी हुई 'गुरु' शेन वार्न और 'चेले' यासिर शाह की ख्वाहिश

Image Loadingअगले महीने अमेरिका में होने वाली क्रिकेट ऑल स्टार्स प्रदर्शनी मैच के लिए तैयारियों में जुटे ऑस्ट्रेलिया के पूर्व दिग्गज लेग स्पिनर शेन वार्न ने कहा
था कि वह पाकिस्तान के स्टार स्पिनर यासिर शाह के साथ नेट पर गेंदबाजी प्रैक्टिस करना चाहते हैं। दोनों स्पिनरों ने शारजहां में साथ में गेंदबाजी की। इस प्रैक्टिस सेशन के बाद यासिर शाह ने कहा कि इस दिग्गज गेंदबाज के साथ गेंदबाजी करने का उनका बचपन का सपना पूरा हो गया। दोनों ने गुरुवार को साथ में गेंदबाजी की। इससे पहले स्पिन के जादूगर वार्न ने कहा था, 'शाह एक वर्ल्ड क्लास गेंदबाज हैं। अगर उन्हें टूर के दौरान मौका मिला तो वह इस प्रतिभाशाली गेंदबाज के साथ गेंदबाजी प्रैक्टिस जरूर करना चाहूंगा।'
टेस्ट क्रिकेट में सबसे ज्यादा विकेट लेने वाले वार्न ने कहा कि शाह में अपार प्रतिभा है और उसकी गेंदबाजी से वह काफी प्रभावित हैं। उन्होंने कहा कि शाह ने बेहतरीन गेंदबाजी करते हुए इंग्लैंड के खिलाफ दूसरे टेस्ट में आठ विकेट निकाले और अपनी टीम को एक यादगार जीत दिलाई थी।
गौरतलब है कि वार्न शाह से इसी साल वर्ल्ड कप के दौरान मिले थे और उन्होंने इस युवा गेंदबाज को स्पिन की बारीकियां सिखाई थीं। वार्न ने कहा था, 'अगले महीने होने वाले प्रदर्शनी मैचों के मद्देनजर मैं ज्यादा से ज्यादा प्रैक्टिस करना चाहता हूं और इसके लिए शाह सर्वश्रेष्ठ विकल्प हैं। मैंने शाह को दूसरे टेस्ट में गेंदबाजी करते हुए देखा था। उनका  प्रदर्शन वाकई शानदार था।'
पाकिस्तान क्रिकेट टीम के मैनेजर इंखलाब आलम ने वार्न के इस प्रस्ताव का स्वागत करते हुए कहा, 'हमें बेहद खुशी है कि ऑस्ट्रेलियाई दिग्गज ने हमारे साथ नेट प्रैक्टस करने का प्रस्ताव रखा। वार्न एक महान गेंदबाज हैं और उनके साथ अभ्यास से टीम के खिलाड़ियों को उनसे बहुत कुछ सीखने को मिलेगा।'

50 पैसा सस्ता हुआ पेट्रोल, डीजल की कीमत में कोई बदलाव नहीं

Image Loadingपेट्रोल के दाम में शनिवार को 50 पैसे प्रति लीटर की कटौती की गई जबकि डीजल की कीमत में कोई बदलाव नहीं किया गया। प्रमुख सार्वजनिक तेल कंपनी इंडियल ऑयल कारपोरेशन के अनुसार दिल्ली में पेट्रोल के दाम शनिवार को मध्यरात्रि से 60.70 रुपये प्रति लीटर होंगे जो इस समय 61.20 रुपये प्रति लीटर हैं। एक सितंबर के बाद से पेट्रोल की कीमत में यह पहला बदलाव है जब उसके दाम दो रुपये प्रति लीटर कम किये गये थे। उसके बाद के पखवाड़ों में पेट्रोल के दाम में कोई बदलाव नहीं किया गया। हालांकि, सरकारी तेल कंपनियों ने डीजल के दाम में आज कोई बदलाव नहीं किया। इससे पहले डीजल 16 अक्तूबर को 95 पैसे व एक अक्तूबर को 50 पैसे महंगा हुआ था। एक सितंबर को डीजल के दाम 50 पैसे प्रति लीटर घटे थे। इंडियन ऑयल ने एक बयान में कहा है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों व रुपया-अमेरिकी डॉलर विनियम दर को ध्यान में रखते हुए पेट्रोल के दाम में यह कटौती की गई है। उल्लेखनीय है कि सार्वजनिक क्षेत्र की खुदरा तेल कंपनियां इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन, भारत पेट्रोलियम व हिंदुस्तान पेट्रोलियम हर महीने पहली व 16वीं तारीख को पेट्रोल डीजल के दाम में संशोधन करतीं हैं।

'विकल्प' रविवार से : वेटिंग पैसेंजरों को अगली ट्रेन में मिल सकती है कन्फर्म सीट

'विकल्प' रविवार से : वेटिंग पैसेंजरों को अगली ट्रेन में मिल सकती है कन्फर्म सीटनई दिल्ली: रेलवे रविवार से एक नई योजना शुरू करने जा रहा है, जिसके तहत वेटिंग टिकट वाले यात्रियों को अगली वैकल्पिक रेलगाड़ी में कन्फर्म सीट मिल सकती है, अगर उन्होंने ऑनलाइन टिकट बुकिंग कराते समय इस ऑप्शन को चुना हो। 'विकल्प' नाम की इस नई योजना को दिल्ली-लखनऊ और दिल्ली-जम्मू मार्ग पर चलने वाली ट्रेनों में 1 नवम्बर से पायलट आधार पर शुरू किया जाएगा। रेल मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि विकल्प योजना शुरू में इंटरनेट के माध्यम से बुक टिकटों पर छह महीने के लिए उपलब्ध होगी और यह विकल्प मेल और एक्सप्रेस रेलगाड़ियों तक इन दो चुनिंदा मार्गों पर सीमित होगी। योजना के तहत किसी रेलगाड़ी के प्रतीक्षारत यात्रियों को उस मार्ग पर चलने वाली अगली रेलगाड़ी में कन्फर्म सीट का विकल्प दिया जाएगा। इसके लिए कोई अतिरिक्त शुल्क नहीं लिया जाएगा और न न ही किराये में अंतर की राशि को वापस किया जाएगा। रेलवे का उद्देश्य प्रतीक्षारत यात्रियों को कन्फर्म सीट मुहैया कराना और इस योजना के माध्यम से उपलब्ध सीटों की अधिकतम उपयोगिता सुनिश्चित करना है। कुछ मार्गों पर पूरे साल रेलगाड़ियों में काफी मांग रहती है, जबकि कुछ मार्गों पर त्योहार के मौसम में भीड़भाड़ होती है।

यूपी कैबिनेट में 12 नए चेहरे, नौ मंत्रियों का बढ़ा कद

 
Image Loadingउत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने शनिवार को छठी बार अपनी सरकार के मंत्रिमंड़ल का विस्तार किया. इस विस्तार के जरिए मुख्यमंत्री ने 11 नए चेहरे सरकार में शामिल किए और नौ मंत्रियों को प्रमोशन देकर कैबिनेट या स्वतंत्र प्रभार मंत्री का दायित्व सौंपा. सरकार में शामिल हुए 11 नए चेहरों में सिर्फ हेमराज वर्मा ही शनिवार को शपथग्रहण समारोह में शामिल नहीं हो सके, उन्हें अब बाद में पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलाई जाएगी. 
 अखिलेश सरकार के इस छठे मंत्रिमंड़ल विस्तार को जातीय समीकरणों को दुरूस्त करने की कवायद बताया जा रहा है. कहा जा रहा है कि सरकार में शामिल नए चेहरों में एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं है, जिसकी धाक बलिया से लेकर मेरठ तक की जनता के बीच हो. अखिलेश सरकार के मंत्रिमंड़ल विस्तार पर ऐसी टिप्पणी करने वाले राजनीतिक विशेषज्ञों का दावा है कि जातीय समीकरणों को दुरूस्त करने की रणनीति के तहत ही सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने पंजाब में राजनीति करने वाले बलवंत सिंह रामू वालिया को कैबिनेट में जगह दी गई, जबकि बलवंत सिंह न तो विधायक हैं और न ही एमएलसी. रामू वालिया सपा प्रमुख मुलायम के दोस्त हैं और यूपी के सिख समुदाय को सपा से जोड़ने के लिए उनकों अखिलेश सरकार में कैबिनेट मंत्री बनाया गया है. रामू वालिया अकाली दल के नेता भी रहे हैं और वह देवगौड़ा सरकार में मंत्री थे. तभी उनकी मित्रता सपा प्रमुख से हुई थी और अब मुलायम सिंह ने उन्हें यूपी के राजनीतिक  मैदान में उतार दिया है. 
 रामू वालिया की ही तरह मुलायम सिंह यादव ने मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को अरविंद सिंह गोप, कमाल अख्तर, पंडित सिंह तथा साहब सिंह सैनी को कैबिनेट में शामिल करने और रियाज अहमद, फरीद महफूज किदवई, मूलचंद चौहान, राम शक्ल गूजर, नितिन अग्रवाल , या‍सर शाह, मदन चौहान तथा शादाब फातिमा को राज्यमंत्री स्वतंत्र प्रभार बनाए जाने की छूट दी. ताकि इन मंत्रियों के जातीयगत वोट का अखिलेश सरकार को लाभ मिले. हालांकि इनमें पंडि़त सिंह जैसे विवादित लोगों भी शामिल हैं, जिन्हें मारपीट करने और गाली देने में महारत हासिल है. 
 अखिलेश सरकार में राज्यमंत्री की कुर्सी पाए आठ विधायकों में सिर्फ वंशीधर बौद्ध को छोड़कर राधेश्याम सिंह, शैलेंद्र यादव ललई, ओंकर सिंह, तेज नारायण पाण्डेय उर्फ पवन पाण्डेय, सुधार कुमार रावत, हेमराज वर्मा, लक्ष्मीकांत उर्फ पप्पू निषाद को जातीयगत समीकरणों के चलते ही सरकार में शामिल किया गया है. अपने खेत में खुद हल चलाने और अपनी खेतीबाड़ी में ही   वंशीधर बौद्ध का अपने इलाके में बेहद सम्मान है, जिसके चलते मुख्यमंत्री ने उन्हें सरकार में जगह दी है. जबकि कुछ समय पहले मंत्रिमंड़ल से हटाए गए तेज नारायण पाण्डेय उर्फ पवन पाण्डेय को मुख्यमंत्री की पैरवी के चलते मंत्रिमंड़ल में शामिल करने की अनुमति सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव से मिली . 
 शनिवार को अखिलेश सरकार में शामिल हुए 11 नए चेहरों को लेकर अब अखिलेश सरकार में मुस्लिम मंत्रियों की संख्या 11 हो गई है. इतने ही ठाकुर और यादव भी सरकार में मंत्री हैं.इन आंकड़ों के चलते ही अखिलेश सरकार के कामकाज पर नजर रखने वाले राजनीतिक विशेषज्ञ दावा कर रहे हैं कि अखिलेश सरकार यूपी के विकास का नारा देते हुए जातीय आधार पर ही आगामी विधानसभा चुनावों में भाजपा और अन्य दलों को चुनौती देगी. इसका संकेत शनिवार को हुए मंत्रिमड़ल विस्तार करने हुए सपा के प्रमुख नेताओं ने दे दिया.

ये है 'भाभी जी...' के 'हप्पू सिंह' का रियल अंदाज

ये है 'भाभी जी...' के 'हप्पू सिंह' का रियल अंदाज, एक्टर बनने से पिताजी थे नाराज़
एंड टीवी पर प्रसारित होने वाला शो 'भाभीजी घर पर हैं' कम समय ही दर्शकों के बीच काफी पॉपुलर हो गया है। अंगूरी भाभी, तिवारी जी, विभूती जी और अनीता भाभी के अलावा एक और किरदार है जिसका अंदाज सबको भा रहा है और वो है दरोगा जी यानी हप्पू सिंह का। जी। लोग रियल लाइफ में अक्सर पहचान ही नहीं पाते कि मैं ही हप्पू सिंह का रोल करता हूं। वैसे गेट-अप डिफरेंट है मगर रियल लाइफ की भाषा को मैंने हप्पू सिंह के रोल में यूज किया है। झांसी के आसपास जो भाषा बोली जाती है, उसका अंदाज आपको साफ़ मेरे केरेक्टर में दिखाई देगा।
मैं झांसी के राठ कस्बे का हूं। परिवार में सभी टीचिंग के प्रोफेशन में हैं। हमेशा पढ़ाई-लिखाई का माहौल रहा और एक्टिंग का तो परिवार में किसी ने दूर दूर तक नहीं सोचा था। मैंने भी बीएससी मैथमैटिक्स से ग्रेजुएशन किया लेकिन मन में हमेशा एक्टिंग करने की इच्छा थी।
पढ़ाई पूरी कर लखनऊ गया और थिएटर किया और यहीं से तय कर लिया कि एक्टिंग में ही आगे जाना है। 2005 में मुंबई आ गया। यहां लगभग दो साल काफी स्ट्रगल की। काफी धक्के खाए और ऑडिशन दिए। सफ़र आसान नहीं था मगर मैंने हिम्मत नहीं हारी।
मुंबई में दो साल स्ट्रगल के बाद मुझे क्लोर मिंट का एड मिला। यह काफी पॉपुलर हुआ और इसके बाद मैंने तकरीबन 40 से 50 एड किए। इसके बाद बड़ा ब्रेक मुझे शो एफ।आई।आर से मिला। शो के डायरेक्टर ने मुझपर भरोसा जताया और फनी डॉक्टर का रोल दिया।
शो में मेरी एक्टिंग पसंद की जाने लगी और फिर मेरा प्रोडक्शन हाउस से एग्रीमेंट हो गया। एफ.आई.आर ख़त्म होने के बाद इसी प्रोडक्शन हाउस के 'भाभीजी घर पर हैं' में काम मिला और ऐसे मेरी जर्नी चल रही है।
टेलीविजन करता रहूंगा, इसके अलावा फिल्मों में भी काम करने का मन है। एक फिल्म भी आ रही है दिल फिर। मैँ चाहता हूं कि मेरी एक्टिंग किसी एक किरदार तक सीमित न रहे। मैँ किसी एक किरदार को पसंद नहीं करता हूँ। तरह- तरह की किरदार को करना चाहता हूं। मैं हमेशा अपनी एक्टिंग को लेकर गंभीर रहता हूं और अभिनय पर पूरा ध्यान देता हूं।
मेरे पिताजी इस बात से पहले नाखुश थे कि मैं एक्टिंग में अपना करियर बनाना चाहता हूं, वो चाहते थे कि मैं भी घर के बाकी मेंबर्स की तरह टीचिंग में करियर बनाऊं। लेकिन अब सब ठीक है।
परिवार मेरी सफलता से काफी खुश है। घर जाओ तो राठ के लोग भी बहुत खुश होते हैं कि मैं एक्टिंग करता हूं। टीवी पर देखकर वो सब बहुत खुश होते हैं।

सिनाई प्लेन क्रैश में सभी 224 लोगों की मौत

मिस्र में दुर्घटनाग्रस्त हुआ रूसी विमान, सभी 224 लोगों की मौतएक रूसी एयरबस विमान आज मिस्र के सिनाई प्रायद्वीप के पर्वतीय क्षेत्र में दुर्घटनाग्रस्त हो गया और इस पर सवार सभी 224 लोगों की मौत हो गई। मिस्र के सुरक्षा अधिकारियों ने इस बात की पुष्टि की कि विमान में सवार 217 यात्रियों और चालक दल के सात सदस्यों में से कोई जीवित नहीं बचा। मिस्र में सक्रिय आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट ने इस रूसी विमान को मा
र गिराने का दावा किया है।
इस्लामिक स्टेट के दावे से पहले रूसी विमान के हादसे की वजह तकनीकी खामियां बताई जा रही थी, लेकिन आईएसआईएस के दावे से मामले ने बेहद गंभीर रूख अख्तियार कर लिया है। नाम न बताने की शर्त पर अधिकारियों ने बताया कि अब तक दुर्घटनास्थल से बरामद 100 से अधिक शवों में से ज्यादातर जले हुए हैं। मिस्र के असैन्य हवाई अड्डा नियामक के अध्यक्ष आदिल महगूब ने कहा कि सभी यात्री और चालक दल के सदस्य रूसी नागरिक थे।
सूत्रों ने बताया कि शर्म अल-शेख के रेड सी रिसॉर्ट से एयरबस ए321 के आज सेंट पीटर्सबर्ग के लिए उड़ान भरने के 23 मिनट बाद ही मिस्र के एटीसी के साथ उसका संपर्क टूट गया। मिस्र के प्रधानमंत्री शरीफ इस्माइल के कार्यालय से जारी बयान के अनुसार, एक रूसी असैन्य विमान मध्य सिनाई में दुर्घटनाग्रस्त हो गया है। उड़ान केजीएल9268 कोगालिमाविया एयरलाइन से जुड़ा था। यह पश्चिम साइबेरिया स्थित छोटा एयरलाइन है।
रूस के रिया न्यूज एजेंसी ने कहा, ‘उड़ान नियमों के उल्लंघन’ के लिए एयरलाइन के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज किया गया है। विमान दुर्घटना के कारणों का अभी पता नहीं चला है, लेकिन सुरक्षा और विमानन अधिकारियों की प्राथमिक जांच से पता चलता है कि रूसी विमान ‘तकनीकी कारणों’ से सिनाई प्रायद्वीप में दुर्घटनाग्रस्त हो गया। मिस्र के नागर विमानन मंत्रालय ने एक बयान में कहा कि रूसी विमान का मलबा नॉर्थ सिनाई के दक्षिणी अल-अरिश शहर में मिला है।
कैबिनेट की ओर से जारी एक बयान के अनुसार, ‘सैन्य विमानों ने विमान का मलबा खोज लिया है.. पर्वतीय क्षेत्र में, और 45 एम्बुलेंस को मृत तथा घायलों को वहां से निकालने के लिए हादसे की जगह पर भेजा गया है।’ विमान का मलबा हसाना इलाके में पाया गया और शवों को विमान के ब्लैक बॉक्स के साथ हटाया गया। एक अधिकारी ने दुर्घटनास्थल पर ‘दुखद दृश्य’ बताया। पीड़ितों के शव अब भी सीटों से बंधे हुए हैं।
मिस्र के महाभियोजक नबील सादेक ने बताया कि शवों का पोस्टमॉर्टम करने के बाद उन्हें रूसी दूतावास को भेज दिया जाएगा। उन्हें बाद में वहां से उनके मुल्क भेजा जाएगा। सादेक ने एक समिति से विमान के दो ब्लैक बॉक्सों की भी तलाश करने और रिकॉर्डिंग्स की समीक्षा करने का आदेश दिया ताकि दुर्घटना के कारणों का पता लगाया जा सके। विमान में 217 यात्री, जिनमें 17 बच्चे, और चालक दल के सात सदस्य भी थे।

तस्करों के निशाने पर हैं- देश की युवा लड़कियां


हाल में एक ऐसे गिरोह का खुलासा हुआ जो युवा लड़कियों की तस्करी करता था। कई बार गुस्से में लड़कियों को कुछ कह दिया जाता है, कभी परीक्षा में कम नंबर के कारण ता कभी अन्य कारण से। ऐसे में युवा लड़कियां अपने माता-पिता से नाराज हो जाती हैं। इसी का फायदा यह गिरोह उठाता था। इस रैकेट में ऐसी युवा लड़


कियों को निशाना बनाया जाता था। जो अपने माता-पिता से नाराज रहती थीं। वे अपने दम पर कुछ कर गुजरने की चाहत रखती थीं। गिरोह के लोग इन युवा लड़कियों को नौकरी और अच्छे लड़के से शादी कराने का झांसा देकर दिल्ली ले आते थे। फिर इन्हें हरियाणा में 80 हजार से एक लाख रुपए में बेच दिया जाता था यह कहकर कि कुछ दिन रह लो, फिर ले जाएंगे।
ये युवतियां ज्यादातर गरीब घर की होती थीं और अपने माता-पिता से किसी न किसी बात पर नाराज रहती थीं। इन युवा लड़कियों को न सिर्फ भूखा रखा जाता था बल्कि इनके साथ मारपीट भी की जाती थी। आए दिन अखबारों और दीवारों पर बेटियों की गुमशुदगी की सूचना इस बात की पुष्टि करती नजर आती है कि किशोर और युवा होती लड़कियां सुरक्षित नहीं हैं।
मानव तस्करी का मामला हमारे देश में नया नहीं है। आए दिन हमारे देश की बेटियों के साथ ऐसे मामले देखने को मिलते रहते हैं। कम पढ़ी-लिखी लड़कियों को नौकरी और अच्छी कमाई का झांसा देकर बहला-फुसला कर अगवा कर लिया जाता है। फिर शुरू होता है उनका शारीरिक व मानसिक शोषण। मानव तस्करी को पूरे विश्व में तीसरे बड़े अपराध के रूप में जाना जाता है। इस जाल में फंसी ज्यादातर लड़कियां पश्चिम बंगाल से होती हैं। जिन्हें दिल्ली लाया जाता हैं। फिर शुरू होता है उन्हें खरीदने-बचने का खेल। माता-पिता और अपनों को छोड़ कर आई इन लड़कियों को अपराधियों के चंगुल से बाहर निकलने का भी कोई रास्ता नहीं सूझता। ऐसे में इनके पास अपराधियों की बात मानने के सिवा कोई रास्ता नहीं होता।
युवा लड़कियां इस अपराध के लिए ज्यादा निशाने पर होती हैं। अगर वे गरीब परिवार से हैं, तो उनके माता-पिता के लिए भी वे एक बोझ की तरह होती हैं। दहेज की रकम न जुटा पाना उनकी मजबूरी होती है ऐसे में वे इन अपराधियों के दिए लालच में आसानी से फंस जाते हैं। वे यही सोचते हैं कि हमारी बेटियां इनके हाथों जीवन संवार सकेंगी। युवा लड़कियों की तस्करी सिर्फ उनके शारीरिक शोषण के लिए नहीं की जाती बल्कि उनकी खरीद बिक्री ऐसी जगह की जाती है जहां लड़कियों की संख्या कम हैं। वहां उनकी जबरन शादी करवाई जाती है।

आज भी मंत्रमुग्ध कर देती हैं अजंता एलोरा की गुफाएँ


अजंता को ऐतिहासिक पहचान देती अजंता एलोरा की गुफाओं को एक लंबे अरसे बाद 1819 में एक ब्रिटिश अफसर ने शिकार के दौरान देखा तो उसे पत्थरों व पहाड़ों को काट कर बनाई गई इन अद्भुत गुफाओं का अस्तित्व चकित कर गया।
प्रकृति की हरी−भरी वादियों में बसी, बाघेरा नदी के किनारे घोड़े की नाल के आकार में बनी इन गुफाओं का निर्माण तब किया गया जब बौद्ध धर्म अपनी अलग−अलग अवस्थाओं में पनप रहा था। औरंगाबाद से 99 किलोमीटर दूर स्थित अंजता की गुफाओं की संख्या 30 है।
विशाल पर्वतों को काट कर बनाई गई इन गुफाओं के भित्ति चित्र और इनके अंदर निर्मित मूर्तियों का सौंदर्य सैंकड़ों सालों बाद भी सैलानियों को मंत्रमुग्ध करने की क्षमता रखता है। इन गुफाओं का निर्माण लगभग शायद दूसरी से सातवीं शताब्दी के बीच किया गया था।
गुफा न. एक में भगवान बुद्ध की भव्य मूर्ति देखने को मिलती है। इसकी विशेषता यह है कि इसे सामने से देखने पर महात्मा बुद्ध ध्यानमग्न नजर आते हैं जबकि दाएं एवं बाएं देखने पर क्रोधित तथा प्रसन्नचित मुद्रा में नजर आते हैं। इस गुफा का एक अन्य आकर्षण एक सिर से चार हिरणों का शरीर जोड़े हुए मूर्ति है। इस गुफा की छत पर भी देखने योग्य चित्रकारी की गई है।
अजंता की गुफाओं में बने सभी चित्र प्राकृतिक रंगों से बने हैं जिनमें हजारों वर्ष बीत जाने के बाद भी चमक देखी जा सकती है। ये बेजोड़ नमूने उस काल की चित्रकला, शिल्प व संस्कृति को प्रदर्शित करते हैं। गुफा के भीतर की चित्रकारी अपनी सुंदरता, भाव अभिव्यक्ति, आकर्षक चमकीली रंग योजना एवं उत्कृष्ट रंगों से उकेरी गई संतुलित रचनाओं के कारण हतप्रभ कर देती हैं।
इन गुफाओं को देखने के लिए प्रवेश शुल्क देना पड़ता है लेकिन यदि आप मुफ्त में इन गुफाओं की सैर करना चाहते हैं तो यहां शुक्रवार को जाइए क्योंकि शुक्रवार को यहां सैर मुफ्त में करने की छूट है। आमतौर पर गुफाएं सुबह 9 बजे से शाम साढ़े 5 बजे तक खुली रहती हैं। यहां पहुंचने के लिए बेहद पक्की और साफ−सुथरी और चौड़ी सड़कें बनी हुई हैं जिनके दोनों ओर जलपान करने के लिए ढाबों की भी उचित व्यवस्था है।
एलोरा की गुफाएं अपने बेजोड़ शिल्प व स्थापत्य के लिए जहां विश्व विख्यात हैं वहीं अपने ऐतिहासिक महत्व के लिए भी जानी जाती हैं। यहां की गुफाएं मूर्तिकला के माध्यम से हिंदू धर्म, जैन धर्म व बौद्ध धर्म संस्कृति का दर्शन कराती हैं। कलाप्रेमियों की मनपसंद स्थल अजंता की तरह ही एलोरा की गुफाएं भी विशाल चट्टानों को काट कर बनाई गई हैं। इनकी संख्या 34 है। इनमें से 16 गुफाएं हिंदू, 13 बौद्ध और 5 जैन धर्म की प्रतीक हैं। अजंता गुफाएं जहां कलात्मक भित्ति चित्रों के लिए मशहूर हैं वहीं एलोरा गुफाएं मूर्तिकला के लिए विख्यात हैं।
पर्यटक बारीकी से इन गुफाओं का सौंदर्य तो निहार सकते हैं लेकिन अपनी स्मृतियों को कैमरे में संजो नहीं सकते क्योंकि फोटोग्राफी यहां वर्जित है। यह स्थान औरंगाबाद, जलगांव, मुंबई, पुणे तथा नासिक व आसपास के नगरों से सड़क मार्ग द्वारा जुड़ा हुआ है। यहां से बस या टैक्सी द्वारा अजंता एलोरा पहुंचा जा सकता है।

लाल किले को फौजी छावनी में बदल दिया था अंग्रेजों ने


भारत की आजादी की लड़ाई का चश्मदीद गवाह और आजादी के मतवालों का प्रेरणास्रोत रहा लालकिला भव्य और ऐतिहासिक है। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अंग्रेजी हुक्मरानों ने आजादी के मतवालों पर ही कहर नहीं बरपाया था बल्कि मुगल बादशाह शाहजहां के काल में बने इस भव्य किले के कई हिस्सों को भी जमींदोज कर वहां सेना की बैरकें और कार्यालय बना दिये थे। इस किले को रौशन करने वाली मुगलिया सल्तनत के आखिरी बादशाह बहादुरशाह जफर को भी कैद कर रंगून भेज दिया गया था।
आजादी की लड़ाई के दौरान लालकिले पर तिरंगा फहराने की ख्वाहिश भारत मां की गुलामी की बेडि़यां काटने को बेकरार मतवालों के दिलों में उफनती रही। पंद्रह अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ और इसकी प्राचीर पर प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने तिरंगा फहराया। उस समय लालकिला ब्रिटिश फौजों के हाथ से भारतीय सेना को सौंप दिया गया।
दिल्ली के इतिहास में ही नहीं भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में भी लालकिला खास अहमियत रखता है। इसने दिल्ली को जिसे उन दिनों शाहजहांनाबाद के नाम से जाना जाता था, शाहजहां के आगमन की खुशी में दुल्हन की तरह सजते देखा तो विदेशी आक्रांताओं के जुल्मों से बेनूर होते हुए भी देखा। यह किला मुगलकाल के ऐशो आराम, रौनकों, महफिलों, रंगीनियों और प्रजा की खुशहाली का चश्मदीद गवाह रहा तो इसने विदेशी हमलावरों के जुल्म और लूटपाट से बदहवास और बेनूर दिल्लीवालों के दिलों में छुपे दर्द को भी देखा।
इस किले की बुनियाद सन 1639 में रखी गयी थी। इसके निर्माण में 9 वर्ष का समय लगा था। इसके निर्माण पर एक करोड़ रुपये का खर्च आया जिसमें से आधी रकम इसके महलों के निर्माण पर खर्च हुई। आज की महंगाई में यह खर्च अरबों रुपये बैठेगा। इसके निर्माण में ज्यादातर लाल पत्थर का इस्तेमाल किये जाने के कारण ही इसे लालकिला नाम दिया गया।
इसकी बुनियाद का पत्थर इज्जत खां की देखभाल में रखा गया। कारीगरों में सबसे बडे़ उस्ताद अहमद वहामी चुने गये। इज्जत खां की देखरेख में यह काम पांच महीने दो दिन रहा। इस अर्से में उसने बुनियादें भरवाईं और माल मसाला जमा किया। इज्जत खां को सिंध जाने का हुक्म मिला और काम अलीवर्दी खां के सुपुर्द कर दिया गया। बाद में अलीवर्दी खां बंगाल का सूबेदार बन गया और किले का काम उसकी जगह मुकर्रमत खां के सुपुर्द हुआ जिसने किले की तामीर पूरी करायी। उस वक्त बादशाह शाहजहां काबुल में था। मुकर्रमत खां ने बादशाह सलामत की सेवा में निवेदन भेजा कि किला तैयार है।
1648 ई. में एक दिन बादशाह सलामत हवादार अरबी घोडे़ पर सवार होकर बडे़ समारोह के साथ किला मोअल्ला में दरिया के दरवाजे से दाखिल हुए। जब तक शाहजहां दरवाजे तक नहीं पहुंच गए उनका पुत्र दाराशिकोह उनके सिर पर चांदी और सोने के सिक्के वारकर फेंकता रहा। महलों की सजावट हो चुकी थी और फर्श पर कालीन बिछे हुए थे। दीवान ए आम की छतों में दीवारों पर और एवानों पर चीन की मखमल और रेशम टंगी हुई थी। बीच में एक निहायत आलीशान शामियाना लगाया गया था। जिसका नाम दलबादल था। यह शामियाना अहमदाबाद के शाही कारखाने में तैयार कराया गया था। यह 70 गज लंबा और 45 इंच चौथा था और इसकी कीमत एक लाख रुपये थी। शामियाना चांदी के स्तूनों पर खड़ा किया गया था और उसमें चांदी का कटहरा लगा हुआ था। दीवान ए आम में सोने का कटहरा लगा था। तख्त की छत में मोती लगे थे और वह सोने का खंभों पर खड़ी थी। जिसमें हीरे जड़े हुए थे।
बादशाह ने इस मौके पर बहुत से आतिये अता फरमाये। बेगम साहिबा को एक लाख रुपये नजर किये गये, दाराशिकोह को खास खिल्लत और जवाहरात जडे़ हथियार और बीस हजारी का मनसब, एक हाथी और दो लाख रुपये अता किये गये। इसी प्रकार दूसरे शहजादों, वजीरे आजम और मनसबदारों को आतिये अता किये गये। मुकर्रमत खां जिसकी निगरानी में किला तामीर हुआ था उसे पंचहजारी का मनसब अता किया गया। दरबार बड़ी धूमधाम से समाप्त हुआ।
यह किला अष्टभुजाकार है और इसके पूर्वी तथा पश्चिमी दोनों किनारे लंबे हैं। उत्तर की ओर यह किला सलीमगढ़ से एक पुल से जुड़ा है। यह 900 मीटर लंबा और 550 मीटर चौड़ा है और इसकी प्राचीरें 2.41 किलोमीटर की परिधि में हैं जो ऊंचाई में शहर की ओर 33.5 मीटर और नदी के साथ−साथ 18 मीटर ऊंची हैं। प्राचीरों के बाहर की ओर एक खंदक है जो प्रारंभ में नदी से जुड़ी हुई थी। महल में किले पूर्वी हिस्से में हैं जबकि दो भव्य तीन मंजिले प्रवेश द्वार पश्चिमी और दक्षिणी दिशाओं के मध्य में स्थित हैं।
किले में पांच दरवाजे थे। लाहौरी और दिल्ली दरवाजा शहर की तरफ और एक दरवाजा दरिया की तरफ सलीमगढ़ में जाने के लिये था। चौथा था खिड़की या दरियाई दरवाजा और पांचवां दरवाजा असद बुर्ज के नीचे था। इस तरफ से किश्ती में सवार होकर आगरा जाते थे। किले की चारदीवारी में बीच−बीच में बुर्ज बने हुए हैं। लाहौरी दरवाजा सदर दरवाजा था। यह किले की पश्चिमी दीवार के मध्य चांदनी चौक के ठीक सामने पड़ता है। शाहजहां के वक्त खाई पर से गुजरने के लिये काठ का पुल था। दरवाजे के सामने एक खूबसूरत बाग लगा हुआ था और इसके आगे चौक था। इस चौक के सामने एक हौज था जो चांदनी चौक की नहर से मिला हुआ था।
किले के लाहौरी दरवाजे के सामने एक दीवार है जिसे घूघस या घूंघट की दीवार कहते हैं। इसे औरंगजेब ने इसलिये बनवाया था कि किले का लाहौरी दरवाजा दुश्मनों की आंख से बचा रहे और किले में आने वालों को तकलीफ न हो। बात यह थी कि जब बादशाह के दरबारी चांदनी चौक से किले में जाते थे तो दीवाने आम का तख्त उनके सामने पड़ता था और उन्हें बादशाह और उसके तख्त का अदब करने के लिये पैदल चलना पड़ता था। इसलिये औरंगजेब ने यह घोघस बनवा दिया। इस निर्माण से बाग खत्म हो गया। जब शाहजहां को इस निर्माण के बारे में पता चला तो वह उन दिनों आगरे में कैद में था तब उन्होंने अपने पुत्र को पत्र लिखकर कहा कि यह बनवाकर मानो उसने दुल्हन के चेहरे पर घूंघट डाल दिया है।
इसी तरह दक्षिणी दरवाजा है जिसे दिल्ली दरवाजा कहते हैं। यह जामा मस्जिद की तरफ है। बादशाह इसी दरवाजे से हर जुम्मे की नमाज पढ़ने जामा मस्जिद जाया करते थे। औरंगजेब ने इन्हीं दोनों की यह अतिरिक्त किलाबंदी करायी थी। अन्य किनारों पर तीन और प्रवेश द्वार हैं जिन्हें अब बंद कर दिया गया है। लालकिले की भव्यता को इंसान और कुदरत दोनों की वहशत झेलनी पड़ी है। सन 1719 में किले और शहर को काफी नुकसान पहुंचा। सन 1756 में मराठों और अहमदशह दुर्रानी की लड़ाई ने भी यहां की इमारतों को काफी नुकसान पहुंचाया। गोलाबारी के कारण दीवाने खास, रंगमहल, मोती महल और शाह बुर्ज को काफी नुकसान पहुंचा।
सन 1857 के विद्रोह के बाद किले के अंदर की इमारतों का बहुत सा हिस्सा हटा दिया गया। रंगमहल, मुमताज महल और खुर्दजहां के पश्चिम में स्थित जनता महलात और बागात तथा चांदीमहल खत्म कर दिये गये। इसी तरह दीवान ए आम के उत्तर में स्थित तोशेखाने, बावर्चीखाने तथा हयात बाग और महबात बाग का बहुत सा हिस्सा काटकर वहां फौजों के लिये बैरकें और परेड का मैदान बना दिया गया। हयात बाग के उत्तर तथा किले की दीवार के बीच में शहजादों के जो महल थे वह गिरा दिये गये।
सन 1859 में हिन्दुस्तानी फौज की छावनी दरियागंज में बना दी गयी और किले में गौरी पलटन और तोपखाने के लिए बैरक बना दी गयी। इमारतें ढहाकर पांच−पांच सौ गज का मैदान साफ कर दिया गया। इसी किले की प्राचीर पर 90 वर्ष तक यूनियन जैक लहराता रहा और 15 अगस्त सन 1947 में पंडित नेहरू ने तिरंगा फहराकर देश की आजादी का ऐलान किया।

मानसून में भी लुभाते हैं महाराष्ट्र के कई स्थल


मानसून के दौरान हर तरह हरियाली होती है। घूमने के लिए यह मौसम बेहतरीन माना जाता है। कुछ पर्यटन स्थलों को इन दिनों बंद कर दिया जाता है ताकि भूस्खलन, फिसलन या दूसरी कोई परेशानी से पर्यटक बच सकें। मगर भारत में कुछ ऐसे बेहतरीन पर्यटक स्थल हैं जिसकी खूबसूरती मानसून के दिनों में मंत्र मुग्ध कर देती है। ऐसे ही कुछ पर्यटन स्थलों के बारे में आप भी जानिए।
महाराष्ट्र ऐसा राज्य है, जो मानसून के दौरान भी पर्यटकों को आकर्षित करता है। यहां ऐसे कई स्थान हैं जहां मानसून के दौरान प्रकृति अपनी असली खूबसूरती दिखाती है। कोंकण तटीय क्षेत्र और पश्चिमी घाट जिसे शायादरी क्षेत्र कहते हैं- महाराष्ट्र के मुख्य आकर्षणों में से एक है। कोंकण क्षेत्र पर्यटन के लिए बेहतरीन माना जाता है। यहां का समुद्री किनारा, किला, प्राकृतिक खूबसूरती, वाटरफॉल, हरे-भरे पहाड़, दूर-दूर से पर्यटक को अपनी ओर आकर्षित करते हैं।
अलीबाग- यह पर्यटकों में मशहूर है। पुणे और मुंबई के पास अलीबाग कोंकण क्षेत्र के राजगढ़ जिले में है। यह जगह समुद्री किनारों, द्वीपों और अलीबाग किला व कोलाबा किला के लिए जाना जाता है।
तपोला- महाबलेश्वर के निकट बेहद ही खूबसूरत गांव है तपोला। यह जगह पिकनिक स्पॉट भी है। यहां शिवाजीसागर झील में बोटिंग का मजा भी लिया जा सकता है।
माथेरान- महाराष्ट्र का सबसे प्रसिद्ध हिल स्टेशन है माथेरान। यह भारत का सबसे छोटा हिल स्टेशन है। माथेरान मुंबई वासियों के लिए बेहतरीन पिकनिक स्पॉट है। यहां की पहाडि़यां, प्राकृतिक हरियाली और टॉय ट्रेन आने वाले पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र है।
कलसुबई- महाराष्ट्र के सयादरी पहाड़ी क्षेत्र की सबसे ऊंची चोटी है कलसुबाई। इसे वैली ऑफ फ्लावर के नाम से भी जाना जाता है। पुणे में यह ट्रेकिंग की सबसे मशहूर जगह है। भंदरदरा बैक्वॉटर का खूबसूरत दृश्य, फूलों की चादर और कालसुबई मंदिर यहां के मुख्य आकर्षण हैं।
लोनावला- जुड़वां हिल स्टेशन लोनावला और खंडाला मुंबई और पुणे के लोगों के लिए खास आकर्षण है। लोनावला का खूबसूरत परिदृश्य, ऊंचे-ऊंचे वाटरफॉल और मन को प्रफुल्लित कर देने वाली यात्रा छुटि्टयों को और भी रोमांचक बना देती है।
खंडाला- लोनावाला से सिर्फ तीन किलोमीटर की दूरी पर हैं लोनावला। इस हिल स्टेशन की खूबसूरती बस देखते बनती है। खंडाला में आकर्षण के कई केंद्र हैं- जैसे 'टाइगर लिप', 'बुसी लेक', करला और भज गुफा।
थोसेघर वॉटर फाल- सतारा के पास यह वाटरफॉल मानसून में अपनी खूबसूरती में चरम पर होता है। इस क्षेत्र के सभी वाटरफॉल से यह ऊंचा है।
इसके अलावा लोहागढ़ किला, भीमशंकर, महाबलेश्वर, करनाल बर्ड सैंक्चुरी, मालसेज घाट, भंडारदरा, मारलेश्वर और पंचगनी बेहतरीन पर्यटन स्थलों में से एक हैं। वैसे तो यहां सालभर जाया जा सकता है पर मानसून के दौरान इसकी प्राकृतिक खूबसूरती पर्यटकों की अपनी ओर आकर्षित करती है। बेहतरीन समय जुलाई से अक्टूबर है।

चौक तो है पर चांदनी गुल हो गई चांदनी चौक की


दिल्ली अगर कोई आता है तो एक बार चांदनी चौक घूमने जरूर जाता है। मुगल बादशाह शाहजहां का बनवाया लाल किला दिल्ली के मुख्य पर्यटक स्थलों में से एक है। इस किले के सामने ही है 'चांदनी चौक'। शाहजहां की बेटी जहां-आरा ने इसे डिजाइन किया था। भारत का सबसे बड़ा होलसेल मार्केट चांदनी चौक में ही हैं। प्राचीन समय में इस मार्केट के बीच से एक नहर गुजरती थी जिसमें चांद की रौशनी से बाजार की खूबसूरती देखते बनती थी। आज चौक तो हैं पर चांदनी गायब है। इस बाजार में दुकानें ऐसे बनाई गई थी कि यह देखने में आधा चंद्रमा लगती थी। इस बाजार की पहचान थी इस नहर में चमकती चांद की रोशनी। मगर वह सुंदरता अब ढूंढे नहीं मिलती। सच तो यह है कि बाजार में भीड़भाड़, टैफिक का दबाव और बनावटीपन से चांदनी चौक की मौलिकता खत्म हो गई है।
चौक में बने तरणताल की जगह घंटाघर ने ले ली है। चांदनी चौक भारत का सबसे पुराना बाजार है। मुगल बादशाह का जुलूस चांदनी चौक से निकलता था। यह परम्परा दिल्ली दरबार लगने तक कायम रही। लाल किले के लाहौरी गेट से लेकर फतेहपुर मस्जिद तक चांदनी चौक फैला हुआ है।
गुरुद्वारा शीशगंज, चौक कोतवाली (घंटाघर) जिसे प्राचीन समय में जौहरी बाजार कहते थे, फतेहपुर बाजार, चुन्नामल हवेली, कूचा महाजनी, कटरा नील, परांठे वाली गली यह सब चांदनी चौक की खास गलियों में शामिल हैं। यहां गुरुद्वारा शीश गंज साहिब का निर्माण 1783 में हुआ। इसके अलावा गौरी शंकर मंदिर का निर्माण 1761 में हुआ। इसके अलावा लाल जैन मंदिर भी दर्शनीय है।
चांदनी चौक मुख्य रूप से कपड़ों का बाजार हैं। साथ ही यह तरह-तरह के व्यंजन और लाजवाब मिठाइयों के लिए मशहूर हैं। इसके अलावा यहां इलेक्ट्रानिक सामान, चमड़े के उत्पाद, जूते आदि की खरीदारी की जा सकती है। यहां शुद्ध घी में बनी जलेबी मशहूर है। स्थानीय लोगों की यह पसंद तो है ही, पर्यटक भी इसे खाने आते हैं।
अगर खरीददाीर के मूड से चांदनी चौक जा रहे हैं। तो जान लीजिए यह दिल्ली की सबसे बड़ा होलसेल मार्केट हैं। यहां आपको हर चीज होलसेल दाम पर मिल जाएगी। क्लाथ मार्केट, नई सड़क, लालकुआं, तिलक मार्केट यह सब यहां खरीदारी की जगह हैं। अगर गहनें खरीदने का मन हैं तो दरीबा बेहतर है।
व्यंजनों के मामले में चांदनी चौक प्राचीन समय से ही मशहूर हैं। यहां की दुकानें बेहद पुरानी हैं। जैसे घंटे वाला हलवाई की दुकान 1790 में शुरू हुई थी। नटराज दही भल्ले (1940)। बाद में कई दुकानें बनीं जैसे चाटवाला, गियानीजी का फलूदा, कनवारजी भागीरथमल परांठे वाली गली के परांठे खाने देश-विदेश से लोग आते हैं। इस गली की दुकानों की शुरूआत 1875 से 1886 में हुई थी।

सात प्रसिद्ध पुरियों में से एक है श्रीकृष्ण की द्वारका


गुजरात के पश्चिमी सागर के तट पर स्थित द्वारका को वैसे तो एक तीर्थ माना जाता है लेकिन अपनी ऐतिहासिकता, कलात्मकता, भवनों और प्रकृति की रमणीयता के कारण यह देश का एक प्रसिद्ध पर्यटन स्थल भी है। पौराणिक युग में इसे कुशस्थली और द्वारवती नामों से भी जाना जाता था। द्वारका प्राचीन भारत की सात प्रसिद्ध पुरियों में से एक है।
यहां उत्कृष्ट वास्तुकला को उजागर करती हुई अनेक इमारतें हैं। आदि शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, नरसी मेहता, मीरा, कबीर, नानक आदि यहां आने वाले प्रसिद्ध सैलानी हैं। द्वारका अपने द्वारकाधीश मंदिर के लिए विश्व भर में प्रसिद्ध है। इसे जगत मंदिर भी कहते हैं। पारम्परिक शैली में निर्मित यह मंदिर पांच मंजिला है। भूतल से लेकर शिखर तक मंदिर के हर भाग को बखूबी तराशा गया है। यहां भगवान श्रीकृष्ण का जन्मदिवस बड़े ही धूमधाम और उत्साह के साथ मनाया जाता है।
देशभर में चार स्थानों पर आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित किए गए मठों में से एक शारदा पीठ भी यहां है। शारदा पीठ शैक्षिक सोसाइटी, आर्ट्स कालेज और संस्कृत अकादमी का संचालन करती है यहां संस्कृत और इंडोलाजी में शोध की सुविधाएं भी उपलब्ध हैं।
विश्व प्रसिद्ध 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक ज्योतिर्लिंग द्वारका में है, जिसे नागेश्वर महादेव के नाम से जाना जाता है। भक्तजनों के लिए यह ज्योतिर्लिंग कितना महत्व रखता है इसका आभास यहां होने वाली भीड़ को देखकर लगाया जा सकता है।
द्वारका नगर से करीब 35 किलोमीटर दूर स्थित बेट द्वारका को बेट शंखोद्धार भी कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण यहीं अपने परिवार के साथ रहते थे। बेट द्वारका के लिए द्वारका से ओखा तक लगभग 30 किलोमीटर की दूरी रेल या बस से तय की जा सकती है। उसके बाद करीब 5 किलोमीटर की समुद्री यात्रा बोट द्वारा तय की जा सकती है। पर्यटकों के लिए यह एक रोमांचक अनुभव रहता है। बेट द्वारका में बना भगवान श्रीकृष्ण का मंदिर एक पुराना घर मात्र है लेकिन इसकी मान्यता बहुत है।
द्वारका के अन्य दर्शनीय स्थलों में रूक्मिणी मंदिर, लक्ष्मी मंदिर, मीरा बाई मंदिर, नरसी मेहता मंदिर आदि प्रमुख हैं। द्वारका वीरमगाम से ओखा जाने वाली मीटरगेज रेलवे लाइन पर स्थित है। राजकोट, जामनगर और अहमदाबाद से यहां के लिए रेल सुविधाएं आसानी से उपलब्ध हो जाती हैं। स्टेट हाइवे द्वारा द्वारका गुजरात व देश के अन्य भागों से जुड़ा हुआ है। गुजरात राज्य परिवहन निगम की बसें राज्य के विभिन्न भागों से द्वारका जाती हैं।
सामान्यतः द्वारका पर्यटन के लिए मध्य सितंबर से मध्य मई तक का मौसम अनुकूल रहता है। यदि आप चाहें तो अहमदाबाद पर्यटन के दौरान द्वारका पर्यटन का कार्यक्रम भी बना सकते हैं।

प्रकृति के करीब जाना है तो निकलिए ट्रैकिंग पर


पर्यटन स्थलों की सैर भला किसे पसंद नहीं मगर इसमें थोड़ा रोमांच जुड़ जाएं तो सोने पर सुहागा। अगर आप भी सैर में थोड़ा रोमांच चाहते हैं, तो यह बेहतरीन समय हैं ट्रैकिंग का। हिमालय की पहाडि़यां, नीला आकाश, प्राकृतिक परिदृश्य और बिना बाधा के पहाड़ों की बुलंद चोटियां। ये सब ट्रैकिंग, शौकीनों को लुभाती है। ऐसी कई जगह हैं, जहां आप ट्रैकिंग का मजा ले सकते हैं। प्रकृति के करीब जाना है तो ट्रैकिंग पर निकल जाइए। आइए हम भी चलते हैं आपके साथ।
सोलंग वैली- मनाली के नजदीक यह वैली 2,560 मीटर की ऊंचाई पर है। सोलंग वैली में बर्फ से ढ़की हिमालय की पहाडि़यों का खूबसूरत दृश्य देखते बनता है। मनाली से सोलंग तक 16 किलोमीटर तक ट्रैकिंग कर पहुंचना बेहद रोमांचकारी होता है। ट्रैकिंग के दौरान रास्ते के खूबसूरत नजारे और देवदार के जंगलों की खूबसूरती को निहार सकते हैं। इसके अलावा आप सेब के बाग, आर्किड के फूलों की खूबसूरती, गांवों का जीवन ओर हर तरफ बिखरी हरियाली आपके ट्रैकिंग के अनुभव को सुखद बना देगी। सोलंग पहुंच कर दूसरी कई गतिविधियों का हिस्सा बन सकते हैं- जैसे पैराग्लाइडिंग, जोर्बिंग और घोड़े की सवारी वगैरह।
नागर- नागर की ट्रैकिंग कुल्लू जिले में अनोखा अनुभव देती हैं। यह सफर मलाना गांव तक जाकर खत्म होता हैं। इसमें तीन दिन लगते हैं। इस ट्रैकिंग में न सिर्फ प्राकृतिक सुंदरता का मजा हैं, बल्कि रास्ते में पड़ने वाले गांवों के लोगों का स्वार्थरहित सेवाभाव मन को छू लेता हैं। रास्ते में पड़ने वाले ये गांव कैंपिंग के लिए बेहतरीन होते हैं। मगर आप ट्रैकिंग के दौरान सावधान रहे।
सैंडकफू- यह पश्चिम बंगाल की सबसे ऊंची चोटी हैं। लगभग 3,636 मीटर ऊंची यह चोटी बेहतरीन ट्रैकिंग के लिए जानी जाती है। यह उन जगहों में से एक हैं जहां ट्रैकर्स को जादुई दृश्य देखने को मिलते हैं। दुनिया के सबसे ऊंचे पहाड़ माउंट एवरेस्ट, कंचनजंघा, लोटस और मकालु भारत, नेपाल और भूटान तक हैं। यह ट्रैकिंग सबसे लंबी है इसलिए आप अपने साथ सभी जरूरी सामान रखें। मानेभंजन से शुरू होने वाली यह ट्रैकिंग एक घंटे के सफर के बाद दार्जलिंग जाकर रूकती हैं। चित्रे पहुंचने में लगभग चार घंटे का समय लगता है। कालीपोखरी की तरह ट्रैकिंग बेहद ही खूबसूरत है। इस रास्ते में आप कई रंग-बिरंगे व दुर्लभ पक्षी देख सकते हैं। दिन के अंत में कालीपोखरी की छोटी से काली झील में पास पहुंचते हैं। यह बौद्धों का बेहद ही पवित्र झील है। माना जाता हैं यहां का पानी कभी जमता नहीं।
रूपकुंड- 4,463 मीटर की ऊंचाई पर यह बेहद ही चुनौतीपूर्ण ट्रैक है। रूपकुंड और स्केलेटल झील ऐसी जगह हैं, जो पर्यटकों को आकर्षित करती है। 1942 में स्केलेटन झील में कई मानव कंकाल मिले थे। इसलिए इसका नाम स्केलेटन (कंकाल) झील पड़ा। बर्फ से ढके पहाड़ यहां आने वाले ट्रैकर्स को चुनौती देते प्रतीत होते हैं।

महाबलेश्वर में सैलानियों के लिए आकर्षणों की कमी नहीं


बंबई प्रेसिडेंसी की ग्रीष्मकालीन राजधानी रहे महाबलेश्वर को महाराष्ट्र के सर्वाधिक लोकप्रिय पर्वतीय स्थलों में शुमार किया जाता है। 1372 मीटर की ऊंचाई पर स्थित महाबलेश्वर महाराष्ट्र राज्य का सर्वाधिक ऊंचाई पर स्थित पर्वतीय स्थल भी है जोकि पांच किलोमीटर के घेरे में बसा हुआ है।
13वीं सदी में यादव वंश के राजा सिंघन ने पांच नदियों− कृष्णा, कोयना, सावित्री, गायत्री तथा वेन्ना के उद्गम स्थल पर महादेव मंदिर का निर्माण करवाया था। इसी स्थान का नाम कालांतर में महाबलेश्वर हो गया। महाबलेश्वर अनेक पर्वत मालाओं से घिरा हुआ है। सैलानियों को रिझाने के लिए यहां तीस से अधिक प्वाइंट हैं। सनसेट प्वाइंट, सनराइज प्वाइंट, विल्सन प्वाइंट, लोडविक प्वाइंट इनमें प्रमुख हैं।
वेण्णा झील में नौकायन, रंगबिरंगी मछलियों को पकड़ना, झील में तैरना आदि सैलानियों को आनंददायक लगता है। इसके साथ ही महाबलेश्वर में घुड़सवारी तथा राह में मधुमक्खियों से शहद निकालने की प्रक्रिया को देखना भी खासा रोमांचक होता है। टेढे़−मेढ़े संकरे रास्तों से मकरंदगढ़ की ओर प्रयाण अथवा राबर्स केव का भ्रमण भी किया जा सकता है। वर्षा ऋतु एवं शीत ऋतु में अनेक स्थानों पर प्राकृतिक झरनों का अवलोकन करना भी सुखद अनुभव कराता है।
महाबलेश्वर से बीस किलोमीटर दूर स्थित प्रतापगढ़ किला भी देखने योग्य है। पानघाट पर स्थित यह किला छत्रपति शिवाजी के आठ प्रमुख किलों में से एक है। पश्चिम घाट में स्थित अन्य किलों की अपेक्षा प्रतापगढ़ का किला सर्वाधिक ऊंचाई पर स्थित एक भव्य दुर्ग है। महाबलेश्वर से प्रतापगढ़ के लिए बसों एवं कारों की व्यवस्था है।
महाबलेश्वर में 9 प्वाइंट का गोल्फ क्लब भी है जहां पर्यटक गोल्फ का आनंद उठा सकते हैं। आप पंचगनी भी जा सकते हैं। यह एक पर्वतीय विश्राम स्थल है जोकि पांच पहाडि़यों से घिरा हुआ है। महाबलेश्वर से 18 किलोमीटर की दूरी पर स्थित पंचगनी मुंबई से महाबलेश्वर की ओर जाते समय पहले आता है।
पंचगनी का प्रमुख आकर्षण टेबल लैंड है जोकि एक समतल पहाड़ी पर स्थित है। यहां से एक ओर मैदानों की हरियाली तथा दूसरी ओर बादलों का दृश्य देखने में अत्यंत आकर्षक लगते हैं। अनेक हिन्दी फिल्मों के प्रेम दृश्य एवं गीतों का फिल्मांकन इसी स्थान पर किया जाता है। फिल्म निर्माता−निर्देशकों में तो यह स्थल खासा लोकप्रिय है।
पंचगनी में एक ओर कृष्णा नदी का प्रवाह, दूसरी ओर घने छायादार वृक्षों की तालिका तथा नैसर्गिक सौंदर्य अपने आप में अभूतपूर्व हैं। पंचगनी की विशेषता यह है कि यहां पर विश्व के अनेक देशों के घने छायादार वृक्षों की भरमार है। यहां पर फ्रांस के पाइन, स्काटलैंड के प्लम के अतिरिक्त बोस्टन के अंगूर और रत्नागिरि के आम के वृक्ष हैं। मुंबई से यह स्थान 295 किलोमीटर दूर है। महाबलेश्वर से यहां आने के लिए बसों की ठीकठाक व्यवस्था है।
महाबलेश्वर घूमने आने के लिए अक्टूबर से जून महीने का समय सबसे ज्यादा उपयुक्त रहता है। मुंबई से महाबलेश्वर के लिए राज्य सरकार द्वारा बसों की विशेष व्यवस्था की गई है। इसके अतिरिक्त मुंबई से सात दिन के लिए पैकेज टुअर की भी व्यवस्था है। महाराष्ट्र पर्यटन विभाग द्वारा महाबलेश्वर एवं पंचगनी में आवास की भी अच्छी व्यवस्था की गई है।

राजस्थान के शाही सफर पर ले जाती है पैलेस ऑन व्हील्स


जैसे ही आप यहां आएंगे, अटेंडेंट आपको झुक कर नमस्कार करेगा और सबसे पहले छोटे से लाउंज और फिर गैलरी से होते हुए केबिन में ले जाएगा। लाउंज और गैलरी से होते हुए केबिन तक पहुंचने का पहला एहसास ही आपके अंदर महाराजा होने की गलतफहमी पैदा कर देगा। यहां भीनीभीनी खुशबू से महकता माहौल, उसमें बिखरा मधुर संगीत और आसपास की खूबसूरत सजावट मन को मोहने के लिए काफी है।
शाही यात्रा वैसे तो दिल्ली से शुरू होती है। लेकिन परम्पराओं से रूबरू होने का मौका पर्यटकों को राजस्थान में आने पर ही मिलता है। यहां की सरजमीं पर कदम रखते ही शहनाई गूंज उठती है। राजस्थानी बाला से फूलमालाएं पहन कर कोई भी सैलानी इतरा उठता है। शाही रेलगाड़ी जयपुर के अलावा जैसलमेर, जोधपुर, सवाई माधोपुर, चित्तौड़गढ़, उदयपुर, भरतपुर, आगरा और फतेहपुर सीकरी की सैर कराती है।
सैलानी पर्यटन स्थलों पर जो कुछ देखता है उसकी एक झलक शाही रेलगाड़ी के अंदर भी मिलती है। गाड़ी के सैलूनों के नाम राजस्थानी रियासतों के नाम पर रखे गये हैं। दीवारों पर वहां की ऐतिहासिक इमारतों के चित्र और पेंटिंग लगी हैं। फर्श की गुदगुदी कालीन, रेशमी चादर, खूबसूरत परदे, कांच के जगमगाते झूमर, कलात्मक लैंप शेड, छत की रंगीन चित्रकारी, बेलबूटे, कांच की जड़ाई यानी यहां की हर चीज नायाब है।
गाड़ी में संगीत के अलग−अलग चैनल हैं, जो मर्जी आए उसे सुनिए। आराम के पल आप सैलून के लाउंज में गुजार सकते हैं। यहां बैठ कर पुस्तकालय से पत्र−पत्रिकाएं और अखबार मंगवा कर भी पढ़ सकते हैं।
आप चाहें तो बड़े लाउंज में भी आराम फरमा सकते हैं। यहां छोटे−मोटे सांस्कृतिक आयोजनों का आनंद भी उठाया जा सकता है। अलग−अलग देश, भाषा व संस्कृति के लोग यहां हर शाम एकत्रित होते हैं। सात दिन तक पारम्परिक माहौल में रहते−रहते ये विदेशी सैलानी भारतीय रंग में रंगे नजर आते हैं। कुछ सैलानियों को तो राजस्थानी साफे और अटेंडेंट की शेरवानी इतनी पसंद आती है कि वे उनसे इन्हें पहनने की पेशकश भी करते हैं।
अटेंडेंट जगह के हिसाब से अपनी पोशाकें भी बदलते रहते हैं। जैसे गुलाबी नगरी जयपुर में गुलाबी, जोधपुर व जैसलमेर में पीली, रणथंभौर में हरी तथा उदयपुर में नीली शेरवानी पहनी जाती है, जिससे पर्यटक अचंभित रह जाते हैं।
सैलानी यहां कभी−कभी खास मौके का चुनाव भी करते हैं। ऐसे में अचानक सारी लाइटें बंद हो जाती हैं फिर 'हैप्पी बर्ड डे टू यू' की आवाज के साथ मोमबत्ती जलती है। केक काटा जाता है और सब मिल कर खाते हैं। इस तरह के अप्रत्याशित मौके सफर को और ज्यादा यादगार बनाते हैं।

त्वचा रोगों में कमाल का फायदा पहुँचाने वाला आक


भारत के लगभग सभी प्रांतों में पाया जाने वाला आक आस्ले पिआदसी परिवार का सदस्य है। इसका वानस्पतिक नाम कालोत्रोपिस प्रोचेरा (ऐटन) आर ब्राउन है। गरम और शुष्क स्थानों पर यह विशेष रूप से पाया जाता है। अक्सर इसे नदी−नालों की पटरियों तथा रेलवे लाइन के किनारे−किनारे उगा देखा जा सकता है। यह बहुतायत में पाया जाता है। क्योंकि पशु इसे नुकसान नहीं पहुंचाते।
आक एक झाड़ीनुमा पौधा है जिसकी ऊंचाई 5 से 8 फीट होती है। इसके फूल जामनी−लाल बाहर से रूपहले होते हैं। आक के सभी अंग मोम जैसी सफेद परत से ढंके रहते हैं। इसके सभी अंगों से सफेद दूध जैसा तरल पदार्थ निकलता है। जिसे आक का दूध कहते हैं। आक प्रायः दो प्रकार का होता है लाल तथा सफेद। लाल आक आसानी से सब जगह पाया जाता है। यों तो यह पौधा वर्ष भर फलता−फूलता है। परन्तु सर्दियों के मौसम में यह विशेष रूप से बढ़ता है।
आक के सभी अंग जड़, पत्ते, फूल एवं दूध औषधि के रूप में बहुत उपयोगी होते हैं। आक के जड़ की छाल तिक्त, पाचक, दीमक, वामक एवं बल्य रसायन युक्त होती है। इसके पत्तों एवं डंठलों में कैलॉट्रोपिन तथा कैलॉट्रोपेगिन रसायन पाए जाते हैं।
चोट−मोच, जोड़ों की सूजन (शोथ) में आक के दूध में नमक मिलाकर लगाना चाहिए। आक के दूध को हल्दी और तिल के साथ उबालकर मालिश करने से आयवात, त्वचा रोग, दाद, छाजन आदि ठीक होता है। आक की छाल के प्रयोग से पाचन संस्थान मजबूत होता है। अतिसार और आव होने की स्थिति में भी आक की छाल लाभदायक सिद्ध होती है। इससे रोगी को वमन की आशंका भी कम होती है। मरोड़ के दस्त होने पर आक के जड़ की छाल 200 ग्राम, जीरा तथा जवाखार 100−100 ग्राम और अफीम 50 ग्राम सबको महीन चूर्ण करके पानी के साथ गीला करके छोटी−छोटी गोलियां बना लें। रोगी को एक−एक गोली दिन में तीन बार दें इससे तुरन्त लाभ होगा।
त्वचीय रोगों के इलाज में आक विशेष रूप से उपयोगी होता है। लगभग सभी त्वचा रोगों में आक की छाल को पानी में घिसकर प्रभावित भाग पर लगाया जाता है। यदि त्वचा पर खुजली अधिक हो तो छाल को नीम के तेल में घिसकर लगाया जा सकता है। श्वेत कुष्ठ में भी इसके प्रयोग से फायदा मिलता है। आक के सूखे पत्तों का चूर्ण श्वेत कुष्ठ प्रभावित स्थानों पर लगाने से तुरन्त लाभ मिलता है। इस चूर्ण को किसी तेल या मलहम में मिलाकर भी लगाया जा सकता है।
बिच्छू के काटने पर विष उतारने के लिए आक की जड़ को पानी में पीसकर लेप लगाया जाता है। कुत्ते के काट लेने पर दंश स्थान पर या काटने से बने घाव में आक का दूध अच्छी तरह भर देना चाहिए। इससे विष का प्रभाव खत्म हो जाता है और फिर कोई परेशानी नहीं होती।
आक के पत्तों का चूर्ण लगाने से पुराने से पुराना घाव भी ठीक हो जाता है। कांटा, फांस आदि चुभने पर आक के पत्ते में तेल चुपड़कर उसे गर्म करके बांधते हैं। जीर्ण ज्वर के इलाज के लिए आक को कुचलकर लगभग बारह घंटे गर्म पानी में भिगो दे, इसके बाद इसे खूब रगड़−रगड़ कर कपड़े से छान कर इसका सेवन करें इससे शीघ्र फायदा पहुंचता है। मलेरिया के बुखार में इसकी छाल पान से खिलाते हैं। किसी गुम चोट पर मोच के इलाज के लिए आक के पत्ते को सरसों के तेल में पकाकर उससे मालिश करनी चाहिए।
कान और कनपटी में गांठ निकलने एवं सूजन होने पर आक के पत्ते पर चिकनाई लगाकर हल्का गर्म करके बांधते हैं। कान में दर्द हो तो आक के सूखे पत्ते पर घी लगाकर, आग पर सेंककर उसका रस निकालकर ठंडा कर कान में एक बूंद डालें।
खांसी होने पर आक के फूलों को राब में उबालकर सेवन करने से आराम पहुंचता है। दमे के उपचार के लिए तो आक एक रामबाण औषधि है। आक के पीले पड़े पत्ते लेकर चूना तथा नमक बराबर मात्रा में लेकर, पानी में घोलकर उसके पत्तों पर लेप करें। इन पत्तों को धूप में सुखाकर मिट्टी की हांड़ी में बंद करके उपलों की आग में रखकर भस्म बना लें। इस भस्म की दो−दो ग्राम मात्रा का दिन में दो बार सेवन करने से दमे में आश्चर्यजनक लाभ होता है। इस दवा के सेवन के साथ−साथ यह भी जरूरी है कि रोगी दही तथा खटाई का सेवन नहीं करे।

कुछ ऐसी आदतें होती हैं, जो डालती हैं सेहत पर असर


रोजमर्रा की जीवनशैली में अक्सर हमारी कुछ ऐसी आदतें होती हैं, जो सेहत पर असर डालती हैं। इससे हम समय से पहले उम्रदराज दिखने लगते हैं। जरूरत से ज्यादा काम का तनाव, एक साथ एक ही समय में कई काम निपटाने की जल्दी, हर रोज घंटों काम करना हमारे स्वास्थ्य पर बुरा असर डालता हैं। एक अध्ययन में यह बात साबित हुई हैं कि इससे इंसान जल्दी ही उम्रदराज दिखने लगता है। रोज का यह तनाव भी इसका एक कारण हैं।
धूम्रपान, शराब, बीड़ी और गुटखे की लत हमारे स्वास्थ्य के लिए बेहद नुकसानदायक हैं। स्मोकिंग हमारे त्वचा को रूखा बनाती है जिससे झुर्रियां जल्द ही नजर आने लगती हैं। धूम्रपान हमारे शरीर में विटामिन सी की कमी कर देता है जिससे त्वचा में रूखापन दिखने लगता है। सिगरेट, गुटखा, बीड़ी वगैरह में मौजूद निकोटिन झुर्रियों का कारण बनता है।
काम का तनाव, मोबाइल, टीवी, कम्प्यूटर ने लोगों की नींद पर बुरा असर डाला है। हर दिन हमें लगभग 7-8 घंटे की नींद जरूरी है, पर आजकल के मशीनी जीवन में अब यह संभव नहीं लगता। कम सोने से कोई भी काम समय से नहीं हो पाता और दिमाग थका-थका सा महसूस करता हैं। कम सोना मोटापे का कारण भी बनता है। आंखों पर भी बुरा असर पड़ता हैं और आंखों के नीचे कालापन भी दिखने लगता है।
बहुत देर तक बैठना भी आज हमारे काम का हिस्सा बन गया हैं। देर तक लगातार बैठने से गुर्दे और हृदय पर असर पड़ता है। कैंसर जैसी बड़ी बीमारी का भी खतरा बना रहता हैं। मोटापे का भी खतरा होता है। बहुत देर तक बैठना हो तो थोड़ी-थोड़ी देर में उठकर टहल लें। नियमित व्यायाम से आप अपने उम्र में इजाफा कर सकते हैं। व्यायाम हमारे स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव डालता हैं।
मोबाइल क्रांति के इस दौर में आज हर कोई ऊंची आवाज में संगीत सुनता हैं। इस वजह से समय से पहले कानों पर असर पड़ना शुरू हो जाता हैं। ऊंची आवाज में गाने सुनने से व्यक्ति के सुनने की क्षमता कम होती जाती है। गाने सुनना हैं तो धीमी आवाज में सुनें और हेडफोन से दूर रहें।
बहुत ज्यादा मीठा खाना, ज्यादा वसायुक्त खाना, यह सब उम्र बढ़ाता हैं। ज्यादा चीनी से त्वचा रूखी और बेजान दिखाई देती हैं। आंखों के नीचे झुरियां समय से पहले दिखने लगती है। ज्यादा मीठे से दूर रहें। यह डायबिटिज का भी कारण बनता हैं। सही वसा आपकी त्वचा को न मी देती हैं जैसे मछली और मेवा। इसमें ओमेगा-3 फैटी एसिड होता हैं। आहार विशेषज्ञों के मुताबिक हफ्ते में दो बार मछली खाएं। सही दिनचर्या और सही खानपान आपको स्वस्थ रखेगा।

केले में है कई पोष्टिक गुण


मूसासी परिवार का सदस्य केला बहुत प्राचीन फल है। 326 ईसा पूर्व में सिंधु घाटी में केले का उल्लेख मिलता है। इसका वनस्पति नाम मूसा पारादिसिआका लिनिअस है। हमारे देश में यह सर्वत्र तराई वाले स्थानों, मंदिरों, धार्मिक स्थानों में खूब मिलता है। मांगलिक कार्यों में इसकी बड़ी उपयोगिता है। यह धार्मिक कृत्यों तोरण, वेदिका मंडप आदि की सजावट में काम आता है।
अन्य फलों की अपेक्षा केला बहुत पौष्टिक होता है परन्तु आमतौर पर लोग इसके गुणों से अनभिज्ञ होते हैं क्योंकि यह बहुतायत में मिलता है। केले में ग्लूकोज (घुलने वाली शक्कर) होती है। इसलिए इसकी उपयोगिता बहुत अधिक है। यह खाते समय मुंह में ही घुल जाता है। इससे शरीर को तुरन्त बल मिलता है।
केले में लगभग 75 प्रतिशत जल होता है। इसमें कैल्शियम, मैग्नीशियम, फास्फोरस, लोहा तथा तांबा पर्याप्त मात्रा में होते हैं। मानव शरीर में रक्त निर्माण में लोहा, मैग्नीशियम तथा तांबा सक्रिय भूमिका निभाते हैं। इसलिए रक्त निर्माण तथा रक्त परिशोधन में केला बहुत सहायक है। केले में कैल्शियम प्रचुर मात्रा में होता है इसलिए यह आतों की सफाई के लिए बहुत लाभकारी है। केला अम्लीय भोजन पर क्षारीय क्रिया करता है। विटामिन 'डी' के अलावा अन्य सभी प्रकार के विटामिन इसमें पाए जाते हैं। केले में लगभग 22 प्रतिशत कार्बोहाइट्रेट, दो प्रतिशत प्रोटीन तथा एक प्रतिशत वसा भी होता है।
आयुर्वेद के अनुसार पका केला शीतल, वीर्यवर्धक, पुष्टिकर, मांसवर्धक, क्षुधा, प्यास, नेत्र रोगों तथा प्रमेह को नष्ट करता है। कच्चा केला कब्ज, ठंडा, कसैला, पचने में भारी, वायु तथा कफ पैदा करने वाला होता है।
केले के शर्बत को खांसी के लिए रामबाण समझा जाता है। इसके लिए पके हुए केले को काटकर उसमें चीनी मिला लें और उसे बंद मुंह वाले बर्तन में रख दें। अब एक चौडे मुंह वाले बर्तन में पानी डालकर उसमें बंद मुंह वाला बर्तन रखकर आग पर गर्म करें। जब पानी खौल जाए तो बर्तन नीचे उतार लें और केल को ठंडा करें। ठंडा होने पर इसे चम्मच मे मथ कर एकसार कर लें। केले के इस शर्बत से खांसी तो मिटती ही है। साथ ही यह वीर्यवर्धक, प्यास, नेत्र रोग तथा प्रमेह को नष्ट करने वाला होता है।
आंतों के विकारों में तथा दस्त, पेचिश एवं संग्रहणी रोगों में दो केले लगभग 100 ग्राम दही के साथ सेवन करने से लाभ होता है। जीभ पर छाले हो गए हों तो एक पके केले का सेवन गाय के दूध से बने दही के साथ करें। इससे छाले ठीक हो जाएंगे।
दमे के इलाज के लिए भी केला लाभकारी है। इसके लिए एक कम पका केला लेकर बिना छिलका उतारे उसे बीच में चीर लें इस चीर में जरा सा नमक तथा काली मिर्च का चूर्ण भर दें। इस केले को पूरी रात चांदनी में पड़ा रहने दें सुबह इस केले को आग पर भूनकर रोगी को खाने के लिए दें।
श्वेत प्रदर के निदान के लिए प्रतिदिन नियमित रूप से दो पके केलों का सेवन करना चाहिए। प्रतिदिन सुबह−शाम एक केला लगभग 5 ग्राम शुद्ध देसी घी के साथ खाने से भी प्रदर रोग दूर होता है। गर्मी में नकसीर फूटने पर एक पका केला शक्कर मिले दूध के साथ नियमित रूप से आठ दिन तक सेवन करें। इससे नकसीर आना बंद हो जाता है।
चोट या खरोंच लगने पर केले का छिलका उस स्थान पर बांधने से सूजन नहीं बढ़ती। केला सभी प्रकार की सूजन में लाभकारी है। इसके नियमित सेवन से आतों की सूजन भी मिटती है। आग से जलने पर प्रभावित स्थान पर केले का गूदा फेंटकर मरहम की तरह लगाने से तुरंत ठंड पड़ जाती है।
केले में लौह तत्व होता है इसलिए यह पाण्डु रोग में बहुत लाभकारी होता है। बिना छीले केले पर भीगा चूना लगाकर रात ओस में रखकर सुबह छीलकर खाने से पीलिया दूर हो जाता है यह प्रयोग एक से तीन सप्ताह तक नियमित रूप से करना चाहिए।
मोटापा बढ़ाने के लिए दो पके केले लगभग 250 मिली लीटर दूध के साथ एक महीने तक नियमित रूप से सेवन करना चाहिए। केला दूध के समान खाद्य पदार्थ है अतः छः मास के शिशु को अच्छा पका केला मथकर खिलाया जा सकता है। दिमागी कसरत करने वालों के लिए भी केला उत्तम आहार है।

सर्दियों में भी आंखों के लिए जरूरी हैं धूप के चश्मे


दुनिया के लगभग कुछ ही देश ऐसे हैं, जहां मौसम के चार रूप होते हैं। भारत में चार मौसम का हम आनंद लेते हैं। ये मौसम का ही असर है जो हमारे फैशन व स्टाइल को बदल देते हैं। हर मौसम का अपना फैशन ट्रेंड होता है। सर्दियां बस आने ही वाली हैं ऐसे में हम बात करते हैं सूरज के किरणों की। गर्मियों में, तो हम अपने आंखों को चश्मे से इन नुकसानदायक किरणों से बचा लेते हैं। मगर सर्दियों में हम इन किरणों को नजरअंदाज कर देते हैं।
सच मानें तो सर्दियों में भी सूरज की किरणें हमारी आंखों के लिए नुकसानदायक होती है। सर्दियों में भी हमें अपनी आंखों को उतना ही बचा कर रखना पड़ता है, जितना गर्मियों में। इसलिए सनग्लासेस यानी धूप के चश्मे बेहतर विकल्प हैं न सिर्फ गर्मियों में बल्कि ये चश्मे सर्दियों में भी आंखों की रक्षा करते हैं। यों भी अब चश्मा साधारण नहीं रह गया। इसमें कितने ही बदलाव देखने को मिलते हैं। अब तो ट्रेंडी व फैशनेबल फ्रेम के चश्मे आने लगे हैं, जो हमारे लुक के साथ बेहतर लगते हैं।
पेस्टल फ्रेम- यह किसी भी लुक के साथ मैच बनाता है। आपकी त्वचा का रंग चाहे जैसा भी हो, यह फ्रेम हर रंग पर जंचता है। इस मौसम में यह ट्रेंडी है। अगर आपको नियॉन रंग पहनना पसंद है, तो उनके साथ ये पेस्टल फ्रेम खूब जंचेंगे। पेस्टल रंग सर्दियों के हिसाब से सबका पसंदीदा होता है। इसलिए जब भी घर से बाहर निकलें, अपनी लुक को इस फ्रेम से निखारें।
आर-पार दिखने वाले चश्मे- लाल और नीले रंग के शीशे वाले चश्मे अगर पहनते-पहनते बोर हो गए हैं, तो इस मौसम कुछ अलग ट्राई करें। सुनहला, कॉपर कलर, ब्रांज कलर यह सब इस मौसम के खास रंगों में शामिल है। यह साफ नजर आने वाले चश्मे आपके लुक को बेहतर करने के साथ-साथ आपकी आंखों की भी बेहतर सुरक्षा करते हैं।
वुड प्रिंट वेफेअॅर- इस रंग में आपका लुक बेहतर लगेगा। वुड प्रिंट के फ्रेम चेहरे पर अलग ही दिखते हैं। हालांकि यह फ्रेम मैटे लुक देता है इसलिए इसके साथ गहरे रंग का मेकअप लगाएं। साथ में चंकी नेकलेस इस फ्रेम में एक अलग ही लुक देता है। ये चश्मे देखने में साधारण हैं, पर प्रकृति से प्रेरित हैं।

लगातार बनी है अच्छे सॉफ्टवेयर आर्किटेक्टों की मांग


सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में हर रोज नए अवसर खुल रहे हैं। इस क्षेत्र में युवा पीढ़ी की दिलचस्पी शुरू से ही रही है। इसकी वजह इस क्षेत्र में योग्य और प्रशिक्षित व्यक्तियों की भारी मांग है। लेकिन बदलते समय के साथ कंपनियां और ग्राहकों की प्राथमिकताएं भी बदली हैं। अब कंपनियां ऐसे लोगों की प्राथमिकता देने लगी हैं जो न सिर्फ कंपनी बल्कि ग्राहकों की सुविधा के अनुसार सॉफ्टवेयर साल्यूशंस डिजाइन करते हैं। लिहाजा सॉफ्टवेयर आर्किटेक्ट का कॅरियर सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में तेजी से उभर रहा है।
सॉफ्टवेयर आर्किटेक्ट का काम काफी जिम्मेदारी भरा होता है। एक कुशल सॉफ्टवेयर आर्किटेक्ट बनने के लिए व्यवसाय और तकनीक की अच्छी समझ होनी चाहिए। क्योंकि उसे न सिर्फ सॉफ्टवेयर आर्किटेक्ट का खाका खींचना होता है बल्कि मॉडल में कंपनी और ग्राहक की जरूरतों के मुताबिक बदलाव भी करना पड़ता है। इसके अलावा वह प्री−डिजाइन फेज में सही डिजाइन बिन्दुओं का निर्धारण भी करता है। इसके बाद डोमेन एनालिसिस फेज आता है। जिसके तहत जरूरी क्षेत्रों को डाक्यूमेंटेशन किया जाता है। इसके बाद प्रोटोटाइप तैयार किया जाता है और साथ में रिस्क फैक्टर का अनुमान लगाया जाता है। इसके अलावा कस्टम ऑपरेटरों को प्रशिक्षित करना भी नई प्रणाली की सफलता के लिए आवश्यक होता है। इसलिए सॉफ्टवेयर आर्किटेक्ट को उनके प्रशिक्षण और नई प्रणाली के रखरखाव की व्यवस्था भी करनी पड़ती है।
सॉफ्टवेयर आर्किटेक्ट बनने के लिए अभ्यर्थी में डिजाइनिंग में अनुभव और बड़े इंटरप्राइज साल्यूशंस संभालने की क्षमता होनी चाहिए। इसके लिए नए डिजाइनों का विकास करने की भी योग्यता होनी चाहिए। अगर अभ्यर्थी सॉफ्टवेयर विकास की प्रक्रिया की जानकारी रखता है तो उसे इसका अतिरिक्त फायदा मिलता है। सॉफ्टवेयर आर्किटेक्ट को कई सारे विभागों और व्यक्तियों के साथ तालमेल बिठाकर काम


करना पड़ता है क्योंकि टीम में सॉफ्टवेयर आर्किटेक्ट काफी वरिष्ठ होता है। इसलिए उसके अंदर−संवाद और संप्रेषण की अच्छी क्षमता भी होनी चाहिए।
इस क्षेत्र में कॅरियर बनाने के इच्छुक अभ्यर्थी को शुरुआत जूनियर आर्किटेक्ट के तौर पर करनी पड़ती है। जो मूल रूप से तकनीकी विशेषज्ञ होते हैं। वरिष्ठ आर्किटेक्ट तकनीकी रणनीति के साथ ही व्यवसायिक रणनीति का भी ख्याल रखता है।
सॉफ्टवेयर आर्किटेक्ट बनाने के लिए न्यूनतम योग्यता आईटी में विशेषज्ञता के साथ बीई, बीटेक, एमई, एमटेक होना जरूरी है। इसके अलावा सिस्टम आईटी में विशेष योग्यता के साथ एमबीए करने वाले अभ्यर्थी भी इस क्षेत्र में अपना भाग्य आजमा सकते हैं। एक सॉफ्टवेयर आर्किटेक्ट के लिए संभावनाओं का अनंत द्वार खुला हुआ है। अगर आपके अंदर अपने काम को कुशलतापूर्वक करने की क्षमता है तो आप जल्द ही सफलता की सीढि़यां चढ़ जाएंगे। साथ ही आप अकाउटिंग एचआर, बैंकिंग और वित्तीय सेवाओं के क्षेत्र में भी साल्यूशन आर्किटेक्ट के रूप में जगह बना सकते हैं।

भारत में भी कई संस्थाएँ सिखाती हैं ऑडियो इंजीनियरिंग


कम्प्यूटर और सूचना क्रांति ने जीवन के हर क्षेत्र में बदलाव ला दिया है। आज कोई भी व्यवसाय इससे अछूता नहीं है। और इस तकनीकी में हर रोज बदलाव भी हो रहे हैं। इन्हीं तकनीकी बदलावों की वजह से ऑडियो इंजीनियरिंग की शुरूआत हुई है। व्यावसायिक संगीत के क्षेत्र में ऑडियो इंजीनियरिंग अपना एक अलग मुकाम कायम किया है। संगीत से जुड़े क्षेत्रों में ऑडियो इंजीनियरों के लिए कारोबारी अपने पलकें बिछाए रहते हैं।
ध्वनि और उच्च तकनीकी के संगम का नाम है ऑडियो इंजीरियरिंग। आज टीवी, रेडियो, फिल्मों में ध्वनि के कारनामों से अपने ग्राहकों को आकर्षित करने की होड़ लगी है। आवाज और सुर से जुड़ी दुनिया में नई से नई तकनीकी का इस्तेमाल किया जाता है। ऑडियो इंजीनियर सुरों में तालमेल इलेक्ट्रोनिक तरीके से करते हैं। ऑडियो इंजीनियर के कमाल की वजह से ही नए−नए डिजिटल रिकॉर्डिंग से फिल्म और टीवी की दुनिया में हलचल पैदा हो रही है।
हालांकि ऑडियो इंजीनियरिंग का क्षेत्र भारत में नया है। दूसरे देशों के मुकाबले भारत में इसकी पढ़ाई बहुत ही सीमित संस्थानों में होती है। ध्वनि तकनीकी, माइक्रोफोन और रिकॉर्डिंग तकनीकी, संगीत के सिद्धान्त, डिजिटल ऑडियो स्टूडियो रिकॉर्डिंग तकनीकी, संगीत के सिद्धान्त, डिजिटल ऑडियो रिकॉर्डिंग, कंपनियों के कार्य प्रणाली, लाइव प्रसारण और संगीत में कानून की शिक्षा ऑडियो इंजीनियरिंग पाठ्यक्र


म कोर्स के तहत दी जाती है।
इस पाठ्यक्रम को सफलतापूर्वक पूरा करने वाले अभ्यर्थी को सहायक ऑडियो इंजीनियर, स्टूडियो मैनेजर, साउंड इफेक्ट एडीटर साउंड मिक्सर के रूप में मनोरंजन और समाचार टीवी चैनलों, रेडियो और फिल्मों में नौकरी मिल जाती है। भारत में आमतौर पर इस व्यवसाय से जुड़े लोग अपने कॅरियर की शुरूआत स्टूडियो डायरेक्टर के सहायक के तौर पर शुरू करते हैं। जैसे−जैसे वे काम सीखते जाते हैं उनका प्रमोशन होता जाता है। क्योंकि भारत में इस पाठ्यक्रम की पढ़ाई सीमित जगहों पर ही होती है। सफल ऑडियो इंजीनियर बनने की चाह रखने वाले अभ्यर्थी इस पाठ्यक्रम की पढ़ाई के लिए आस्ट्रेलिया, यूके, अमेरिका और स्पेन जैसे देशों में जाते हैं।
भारत में भी अब कई संस्थाएं इस पाठ्यक्रम की शुरूआत कर चुकी हैं। मीडिया एजुकेशन कालेज और एसआई टेक्नोलॉजी कालेज से इस पाठ्यक्रम की ज्यादा जानकारी ले सकते हैं। ये दोनों संस्थाएं इस पाठ्यक्रम को संचालित भी करते हैं।

समय के साथ बदल रहे हैं दोस्ती के मायने भी


दोस्ती अच्छी होती हैं। दिल की हर वो बात जो हम माता-पिता या भाई-बहन से नहीं कर पाते दोस्तों के साथ बांटते हैं। इनके साथ हमारा ज्यादा वक्त बीतता हैं। कई बार उनकी आदतें हमारे जीवन का हिस्सा बन जाती हैं। किशोर और युवा अवस्था में सबसे ज्यादा दोस्त बनते हैं। ऐसे में जाने-अनजाने हम वेवजह दबाब में आ ही जाते हैं। किशोर अवस्था बेहद ही नाजुक दौर मानी जाती हैं। यह ऐसी अवस्था हैं जहां मानसिक ही नाजुक दौर मानी जाती हैं। यह ऐसी अवस्था हैं जहां मानसिक और शारीरिक बदलाव हो रहे होते हैं। इस समय भावनात्मक और बौद्धिक बदलाव से भी किशोर गुजरते हैं। यही उम्र होती है जब दोस्तों का दबाव भी बनने लगता है।
मगर बात जब दोस्ती की हो, तो इसके दोनों पहलू सामने आते हैं, सकारात्मक और नकारात्मक। अच्छे दोस्त जीने की सही दिशा तय करते हैं। उनकी संगति में हर कोई पढ़ने-लिखने के प्रति गंभीर होता हैं। रचनात्मक चीजें करता हैं। अपनी जिम्मेदारियां निभाता हैं। माता-पिता का सम्मान करता हैं। इस लिहाज से देखें, तो हम उम्र दोस्ती सही है।
लेकिन समय के बदलाव के साथ-साथ दोस्ती के मायने बदल गए हैं। अब दोस्ती के नकारात्मक पहलू सामने आने लगे हैं। दोस्तों के दबाव में किशोर ही नहीं युवा भी जिद करने लगे हैं। घर के हर सदस्य से बेतुकी बातें करने लगें हैं। बड़ों का सम्मान तो कहीं गुम हो गया है। दोस्तों के गलत प्रभाव में आकर गलत रास्ते पर चलने लगे हैं। कई बार तो दोस्ती के दबाव में अवसाद और हीन भावना घर कर लेती हैं। बच्चों पर यह प्रभाव आसानी से देखा जा सकता है।
जिंदगी में दोस्त का होना जरूरी हैं। क्योंकि व्यक्तित्व के विकास और पढ़ाई में, हर जगह इनकी भूमिका होती हैं। भाई-बहन से ज्यादा वक्त बच्चे दोस्तों के साथ बिताना पसंद करते हैं। इसलिए यह जरूरी हैं कि आप दोस्ती का सही मतलब समझें। कौन से दोस्त आपके लिए अच्छे हैं। कई बार गलत दोस्ती में पड़कर किशोर और युवा गलत रास्ता अपना लेते हैं। उन्हं ऐसे दोस्तों से सतर्क रहना चाहिए। अगर वह कोई ऐसे काम के लिए कह रहे हैं जो आपको पसंद नहीं, तो उन्हेंसाफ तौर पर मना कर सकते हैं। दोस्तों के कपड़े, एक्सेसरीज, गैजेट्स देखकर किशोर-किशोरियां देखा-देखी करते हैं। उन्हं देखकर वैसा ही करने की जिद करते हैं। इन सब बातों पर ध्यान रखना जरूरी हैं कि आपके लिए क्या सही हैं क्या गलत।
हमेशा दोस्तों से ऐसी बातें सीखें तो आपके लिए अच्छी हो। दोस्तों का दिखावटीपन खुद पर अमल न करें। श्रुति अपने परिवार में सबकी चहेती थी। मगर दोस्तों के चक्कर में पड़कर वह हर दिन एक नई मांग करने लगी। जिस कारण घर में सब उससे नाराज रहने लगे। दोस्तों के फेर में पड़ी श्रुति में सब उससे नाराज रहने


लगे। दोस्तों के फेर में पड़ी श्रुति कर रवैया बदलने लगा। कहीं आप भी दोस्तों के चक्कर में पड़कर अच्छे-बुरे का फर्क तो नहीं भूल रहे? हमेशा दोस्तों के दबाव से बचना चाहिए।
दोस्तों के दबाव में अक्सर हीन भावना घर कर लेती हैं। बाहर दोस्तों को अच्छे कपड़े पहनता देख या उनके महंगे गैजेट, महंगी बाइक देखकर हीन भावना आने लगती हैं। ऐसे दोस्तों में बचें। अगर आपके दोस्त इन्हें लेकर ताने मारते हैं, तो इनमें दूर रहें। ऐसे दोस्त आपका भला नहीं चाहते। इनसे दोस्ती तोड़ लेने में भलाई है। सच्चे दोस्त आपका कभी मजाक नहीं बना सकते। वे हमेशा आपकी भलाई चाहेंगे। जो चीज आपको पसंद नहीं आ रही, उसे ना कहना सीखें। आपका सच्चा दोस्त उस ना की भी कद्र करेगा।
अक्सर कोचिंग क्लासेज में पहनावे को लेकर आपस में दोस्त टिप्पणी करते हैं, पर ऐसे में इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि आप यहां पढ़ने के लिए आए हैं, फैशन शो में नहीं। अच्छे और सच्चे दोस्त बेहद मुश्किल से मिलते हैं। वे आपको अच्छे बुरे में फर्क पहचानना बताते हैं कभी आपका मजाक नहीं बना सकते।

त्वचा पर जादू का काम करता है अंडे का मास्क


अंडा न सिर्फ हमारी सेहत को दुरूस्त रखता है बल्कि यह हमारी त्वचा की खूबसूरती के लिए भी फायदेमंद है। यह त्वचा पर जादू का काम करता हैं और इसे चिकना और चमकदार बनाता हैं। जैसे-जैसे हमारी उम्र बढ़ती हैं वैसे-वैसे त्वचा में बदलाव आना शुरू होता हैं। यह प्राकृतिक प्रक्रिया है। ज्यादातर युवतियां इस समस्या से निपटने के लिए और रसोईघर में मौजूद चीजों का इस्तेमाल करती हैं। सारी प्राकृतिक चीजों में संडे को भी महत्वपूर्ण माना गया है।
एक अध्ययन में यह बात सामने आई हैं कि अंडे़ में मौजूद प्रोटीन त्वचा को लचीला और जवां दिखने में मदद करता है। अंडे में मौजूद 60 विभिन्न प्रोटीन के अलावा इसमें कोलाजोन और विटामिन 'ए' भी होता हैं जो त्वचा पर मौजूद निशान, एक्ने, खुले रोम छिद्र और चकत्ते को भी दूर करता हैं। जब भी आप अंडे का मास्क बना रहे हों, तो ध्यान रहें उसे अच्छी तरह मिला ले। अंडे को मिलाने के बाद जब सफेद झाग बनने लगे तब इसे इस्तेमाल करें। यह झाग त्वचा पर जादू का काम करता है।
अंडे का मास्क त्वचा को चमकदार बनाता हैं। यह बेहद आसान तरीका है त्वचा को साफ व चमकदार रखने का। अंडे का पीला हिस्सा निकालकर अलग रख दें। सिफ सफेद हिस्से को पूरी तरह मिलाकर इस्तेमाल करें। दस से 15 मिनट इसे चेहरे पर लगा रहने दें, फिर साफ पानी से धो लें।
अगर आप एक्ने और मुंहासे से परेशान हैं, तो अंडे का मास्क बेहद कारगर हैं। अंडे के सफेद भाग को शहद और नींबू के रस में मिला लें। यह एक्ने से लड़ने में मदद करता है और चेहरा आकर्षक बनाता है।
अगर आपका चेहरे का रंग अलग है तो इसे साफ करने के लिए अंडे में एक चम्मच संतरे का जूस और आधा चम्मच हल्दी मिलाकर लगाने से चेहरे का रंग निखरता हैं और चेहरे के दाग-धब्बे दूर होते हैं। यह चेहरे को बेरंग होने से बचाता है। अगर आपकी त्वचा सूखी और बेजान हैं, तो अंडे में दही और एवोकाडो मिलाकर लगाएं।
अचानक कमी चेहरे पर जलन या खुजली होने लगती है। यह परेशानी कई लोगों को होती हैं। ऐसे में अंडे में शहद, दही और खीरे का जूस मिलाकर लगाने से आराम मिलता हैं। शहद में ऐटीसेप्टिक और एंटीबैक्टिरियल चीजों मौजूद होती हैं जो त्वचा को इस समस्या से छुटकारा दिलाती हैं। खीरे का रस त्वचा को नमी देता हैं और साफ करता हैं यह मिश्रण सनबर्न चेहरे पर दरारें, एक्ने और आखों के नीचे बने काले घेरे से छुटकारा पाने में मददगार है।
अंडे की सफेदी को अगर आटे के साथ मिलाकर लगाया जाए तो यह हर प्रकार की त्वचा के लिए कारगर है। अंडे में ओटमील के साथ शहद मिलाकर चेहरे पर लगाएं। यह चेहरे को जवां दिखने में मदद करता है और चेहरे पर चमक लाता हैं। यह मिश्रण त्वचा को नमी देने के साथ-साथ त्वचा की मृत कोशिकाओं को हटाने में मदद करता है।

जावेद अख्तर लिखेंगे बेटे के लिए एक और फिल्म स्क्रिप्ट


जावेद अख्तर लिखेंगे बेटे के लिए एक और फिल्म स्क्रिप्टगीतकार और पटकथा लेखक जावेद अख्तर अपने बे
टे फरहान अख्तर के लिए एक और फिल्म स्क्रिप्ट लिखने जा रहे हैं।
इसके पहले वे बेटे के लिए ‘लक्ष्य’ और ‘डॉन’ जैसी फिल्में लिख चुके हैं। फिल्म में ऋतिक रोशन मुख्य भूमिका के लिए साइन किए जा सकते हैं। वे पहले भी फरहान के साथ काम कर चुके हैं। नई फिल्म को फरहान ही डायरेक्ट करेंगे।
'डॉन-2' के बाद यह उनके निर्देशन में पांचवीं फिल्म होगी। जावेद अभी इस स्क्रिप्ट के बारे में विचार कर रहे हैं। अभी इसके फाइनल ड्रॉफ्ट में समय लगेगा।
इस बारे में कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी। फिलहाल, फरहान रॉकऑन की सीक्वल में बिजी हैं।

विषाक्त कॉकटेल बनाता है दिल्ली को दुनिया का सबसे प्रदूषित शहर


दुनिया का सबसे प्रदूषित शहर दिल्ली भूगोल, विकास, ऊर्जा के खराब स्रोतों और प्रतिकूल मौसम का जहरीला मिश्रण है। ये मिश्रण यहां के वायु प्रदूषण के खतरनाक स्तर को और बढ़ाता है। ब्रिटेन के सर्रे विश्वविद्यालय के अनुसंधानकर्ताओं के नेतृत्व वाले एक दल ने पाया है कि किस प्रकार मौसम, ऊर्जा उपभोग की संस्कृति और बढ़ती शहरी जनसंख्या एकसाथ मिलकर वायु प्रदूषण को बढ़ाते हैं और दिल्ली को मानव स्वास्थ्य के लिहाज से सबसे हानिकारक बनाते हैं। अनुसंधानकर्ताओं में भारतीय मूल का एक वैज्ञानिक भी शामिल है।
सर्रे विश्वविद्यालय के डॉक्टर प्रशांत कुमार ने कहा, ‘‘वायु प्रदूषण विश्व भर में मानव स्वास्थ्य के लिए शीर्ष दस खतरों में शुमार है। वायु प्रदूषण के कारण एक साल में होने वाली हजारों अतिरिक्त मौतों के चलते दिल्ली को प्राय: विश्व का सबसे प्रदूषित शहर कहा जाता है।’’ कुमार ने कहा कि इसके लिए वाहनों की बढ़ती संख्या, औद्योगिक उत्पादन या बढ़ती जनसंख्या को जिम्मेदार ठहराना आसान है लेकिन सच यह है कि असंख्य तत्वों के चलते दिल्ली सबसे प्रदूषित शहर बन गया है और इन सभी तत्वों से निपटने की आवश्यकता है। दिल्ली विश्व के सबसे अधिक जनसंख्या वाले स्थानों में शामिल है। विश्व के पांचवें सबसे बड़े महानगर में 2–58 करोड़ लोग रहते हैं और यह संख्या लगातार बढ़ती जा रही है।
अनुसंधानकर्ताओं ने कहा कि विकास की


इस गति के हिसाब से वाहनों की संख्या वर्ष 2010 के 47 लाख की तुलना में वर्ष 2030 तक बढ़कर 2.6 करोड़ हो जायेगी। वहीं दिल्ली में वर्ष 2001 से वर्ष 2011 तक ऊर्जा की खपत में 57 फीसदी की वृद्धि हुई है। दूसरी ओर दिल्ली जैसे शहर से प्रदूषित वायु को बाहर निकालना भी संभव नहीं है क्योंकि इसके चारों ओर मैदानी इलाके हैं। समुद्र तट पर बसे मुंबई जैसे महानगरों में कम से कम समुद्री हवाओं से प्रदूषित हवाओं की अदला-बदली की संभावना है।
वहीं दिल्ली के आसपास के इलाके कई बार इस महानगर से भी अधिक प्रदूषित होते हैं। अनुसंधानकर्ताओं ने कहा कि ईंट बनाने के लिए प्रयुक्त भट्टे शहर में स्थित नहीं हैं लेकिन आसपास के औद्योगिक इलाकों की प्रदूषित हवा इस दिशा में आती है। इन बाह्य प्रदूषकों में कच्ची लकड़ियों जैसी निम्न गुणवत्ता वाले ईंधन, कृषि और प्लास्टिक कचरा, उपला और डीजल जेनरेटरों के वृहत पैमाने पर उपयोग के कारण उत्पन्न प्रदूषण शामिल हैं। पिछले साल मई में विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा जारी रिपोर्ट में दिल्ली को विश्व का सबसे प्रदूषित शहर माना गया। इस अध्ययन का प्रकाशन एटमॉसफेरिक इन्वायरमेंट नामक जर्नल में हुआ है।

बीफ पर बनी डॉक्यूमेंट्री पर महोत्सव में लगा प्रतिबंध

एक डॉक्यूमेंट्री महोत्सव के आयोजकों ने आज बताया कि बीफ पर बनी एक फिल्म को लेकर सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय से मंजूरी लेने में विफल रहने के कारण वे इसे नहीं दिखा पाएंगे। ‘‘कास्ट ऑन द मेन्यू कार्ड’’ शीर्षक वाली लघु फिल्म 35 अन्य फिल्मों में एकमात्र ऐसी फिल्म थी जिसे यहां ‘12वीं जीविका एशिया लाइवलीहुड डॉक्यूमेंट्री फेस्टीवल’ में दिखाए जाने की अनुमति नहीं मिली। महोत्सव का आयोजन सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी (सीसीएस) की ओर से किया जा रहा है।
महोत्सव के निदेशक मनोज मैथ्यू ने बताया, ‘‘हमने चार अगस्त को ही मंत्रालय को सारी फिल्में उपलब्ध करा दी थीं और हमें यह मालूम चला कि केवल इस फिल्म को कल नहीं दिखाया जाएगा। हमारी तरफ से कोई देरी नहीं हुई। हमने इसके बाद भी अनुरोध किया लेकिन मुझे नहीं लगता कि वे इसकी इजाजत देंगे। हमें प्रक्रिया का पालन करना ही होगा।’’ 21 मिनट की इस फिल्म को टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (टीआईएसएस) के स्कूल ऑफ मीडिया एंड कल्चरल स्टडीज के छात्रों ने बनाया है जो मुंबई में बीफ सेवन के चलन पर केंद्रित है। तीन दिवसीय एशिया-वाइड वार्षिक महोत्सव के तहत ग्रामीण और शहरी गरीबों की जीवनशैली से जुड़ी चुनौतियों को रेखांकित करने का प्रयास किया जाता है। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी से पूछे जाने पर उन्होंने बताया कि फिल्म के बारे में पर्याप्त सूचना नहीं दी गई है।

कभी नहीं करना चाहती थीं एक्टर से शादी : काजोल

इस रविवार 'द अनुपम खेर शो : कुछ भी हो सकता है' का फाइनल एपिसोड प्रसारित होगा। फाइनल एपिसोड की मेहमान होंगी बॉलीवुड एक्ट्रेस काजोल देवगन। वे इस शो की शूटिंग पहले ही कर चुकी हैं। शूटिंग के दौरान काजोल ने अपनी लाइफ के कई सीक्रेट्स अनुपम खेर से शेयर किए। उन्होंने इस दौरान यह भी बताया कि वे कभी नहीं चाहती थीं कि उनकी शादी किसी एक्टर से हो।
काजोल ने बताया, "मैं मॉम
से हमेशा कहती थी कि मेरी शादी ऐसे शख्स से कराना, जो एक्टर न हो।"
बता दें कि काजोल इन दिनों अपनी अपकमिंग फिल्म 'दिलवाले' की रिलीज का वेट कर रही हैं, जिसमें उनके को-स्टार शाहरुख खान होंगे। रोहित शेट्टी के निर्देशन में बनी यह फिल्म 18 दिसंबर को रिलीज होगी। काजोल-शाहरुख के अलावा वरुण धवन और कृति सेनन भी फिल्म में अहम रोल में दिखेंगे।

कुंबले से पहले इन्होंने लिए थे एक इनिंग में 10 विकेट

कुंबले से पहले इन्होंने लिए थे एक इनिंग में 10 विकेट, टॉप-10 में भी हैं शामिलजब भी एक पारी में सभी विकेट लेने के रिकॉर्ड की चर्चा होती है, अनिल कुंबले का नाम चर्चा में आ जाता है। लेकिन उनके अलावा भी दो अन्य बॉलर्स हुए, जिन्होंने एक इनिंग में विरोधी टीम के सभी विकेट झटके। पहले इंग्लैंड के जिम लेकर और दूसरे वेस्ट इंडीज के महान बॉलर कार्टनी वाल्स (जिम ने इंटरनेशनल, जबकि वाल्स ने डोमेस्टिक क्रिकेट में लिए)। 30 अक्टूबर (1962) को 53वां बर्थडे सेलिब्रेट करने वाले कार्टनी वाल्स ने तो ये कारनामा सिर्फ 17 साल की उम्र में स्कूल के दौरान ही कर दिया था। उन्होंने 1979 में एक्ससेल्सर हाईस्कूल की टीम सनलाइट कप क्रिकेट टीम की ओर से खेलते हुए कैंपरडाउन हाईस्कूल के खिलाफ एक मैच की पहली इनिंग में सभी बल्लेबाजों को आउट किया था। ये जमैका का रिकॉर्ड है। इसी परफॉर्मेंस पर उन्हें पहले फर्स्ट क्लास फिर इंटरनेशनल टीम में जगह मिली।
टॉप-10 बॉलर्स में हैं शामिल
कार्टनी वाल्स ने करियर में 132 टेस्ट खेले। इस दौरान उन्होंने 519 विकेट अपने नाम किए। वे 500 विकेट लेने वाले पहले बॉलर रहे। मुरलीधरन, शेन वार्न से पहले सर्वाधिक विकेटों का वर्ल्ड रिकॉर्ड उनके नाम ही था। फिलहाल वे 5वें नंबर पर हैं। dainikbhaskar.com आपको बता रहा है, टॉप-10 में शामिल किस बॉलर ने कितने मैच खेलकर कितने विकेट झटके हैं और क्या है उनकी बेस्ट परफॉर्मेंस?

फेसबुक ने की स्लाइड शो फीचर की शुरुआत

फेसबुक पर ऐड से परेशान यूजर्स के लिए फेसबुक की तरफ से एक बुरी खबर है. सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक ने एक नए स्लाइड शो फीचर की शुरुआत की है जिससे फेसबुक पर विज्ञापन देने वाली कंपनियों को काफी फायदा होगा. हालांकि इससे आम यूजर्स की परेशानी बढ़ेगी.

इस नए फीचर में वीडियो एडवर्टाइजमेंट स्लाइड शो की तरह दिखेंगे जिनमें कुछ स्टिल इमेज शामिल होंगी. इस फीचर से स्लो इंटरनेट कनेक्शन होने पर भी आपके फेसबुक पर कंपनियों के प्रचार का वीडियो दिखेगा.

पहले स्लो इंटरनेट होने पर विज्ञापन का वीडियो लोड नहीं हो पाता था. कंपनी ने अपने ब्लॉग पोस्ट में कहा कि इस नए फीचर से विज्ञापन देने वाले को काफी फायदा होगा क्योंकि यूजर्स स्लो इंटरनेट में भी ऐड का वीडियो देख सकेंगे. इसका मतलब यह हुआ कि यूजर को ना चाहते हुए भी वि‍ज्ञापन का वीडियाे देखना पड़ेगा और पहले जो इंटरनेट कनेक्शन में आप एेड देखने से बच जाते थे, उससे अब निजात नहीं मिलेगी.

पहली बार ट्रांसजेंडर को मिला कर्नाटक राज्योत्सव अवॉर्ड

ये कहानी है 12 साल के उस बच्चे की जिसने खुदकुशी करने का इरादा छोड़ हर मुसीबत का डटकर सामना करने की ठानी. ये कहानी है उस बच्चे की जिसने अपनी हकीकत दुनिया के सामने रखने का साहस किया. ये कहानी है उस युवा की जिसने अपने जैसे लोगों की जिंदगी बदलने की जिद की, बदली और ये बदलाव जारी है.  

ये कहानी है उस शख्सियत की जिसके काम को आज कर्नाटक सरकार ने पहचाना और कर्नाटक राज्योत्सव अवॉर्ड से नवाजा. अकाई पद्मशाली पहली ट्रांसजेंडर हैं, जिन्हें इस पुरस्कार के लिए चुना गया है.

12 साल की उम्र तक वो जगदीश हुआ करता था. बेंगलुरु के मध्यवर्गीय परिवार में जन्मा. लेकिन जैसे-जैसे बड़ा होने लगा अपने ही शरीर में घुटने लगा. उसने खुदकुशी करने की सोची, लेकिन नहीं की. साहस जुटाया. अपनी पहचान जाहिर कर जीने का. जैसे ही पहचान सामने आई, पहला झटका लगा. पढ़ाई छूट गई. ज्यादतियां होने लगी तो वह सेक्स वर्कर बन गई.
आज वही अकाई पद्मशाली उस समुदाय की बड़ी एक्टिविस्ट हैं, जिसे दुनिया थर्ड जेंडर के नाम से जानती है. पद्मशाली सेक्शुअलिटी पर जागरुकता फैला रहे संगठन ऑनडीड के संस्थापक हैं. कन्नड़ में इसका मतलब होता है कन्वर्जेंस.
पब्लिक टॉयलेट तक इस्तेमाल नहीं करने देते थे लोग
अवॉर्ड मिलने पर पद्मशाली ने हैरानी जताई. उन्होंने कहा- मुझे किसी ने फोन कर इसकी सूचना दी. मैं हैरान रह गया. लेकिन यह अवॉर्ड सिर्फ अकाई के लिए नहीं, बल्कि पूरे समुदाय के लिए है. पद्मशाली ने अपने जीवन संघर्ष के बारे में बात करते हुए बताया कि लोग उन्हें पब्लिक टॉयलेट तक इस्तेमाल नहीं करने देते थे. बसों में सफर करने में दिक्कत होती थी. लेकिन यह अवॉर्ड साबित करता है कि लोगों का नजरिया बदल रहा है.

फौजी के पास मिली PAK अधिकृत कश्मीर की पिस्टल

मध्य प्रदेश के ग्वालियर शहर में एक फौजी के पास से पीओके की अवैध पिस्टल समेत हैंडग्रेनेड मिलने से पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों की नींड उड़ गई. दरअसल, इस मामले का खुलासा तब हुआ जब छुट्टी पर घर आए फौजी ने अपने पिता पर ही गोली चला दी.
मामला ग्वालियर की गोवर्धन कॉलोनी का है. बीती रात इस कॉलोनी के लोग अचानक गोली चलने की आवाज़ से जाग उठे. गोली चलने की आवाज़ रामप्रताप भदौरिया के घर से आई थी. जब पुलिस यहां तो लोगों को पूरा मामला पता चला.
दरअसल, रामप्रताप भदौरिया का बेटा राजीव सेना में लांस नायक के पद जम्मू में तैनात है. देर रात पिता पुत्र में किसी बात पर बहस हुई जिसके बाद नशे में धुत राजीव भदौरिया ने अपने पिता रामप्रताप पर पिस्टल से गोली चला दी. हमले में रामप्रताप बाल बाल बच गए. और घर के एक कमरे में जाकर छिप गए. हमले के बाद राजीव ने अपने पिता को हेंडग्रेनेड से उड़ाने की धमकी भी दी.
जब नशे में डूबा राजीव सो गया तब वे बाहर निकले और पुलिस को घटना की जानकारी दी. शनिवार की सुबह पुलिस ने मौके पर पहुंचकर राजीव को हिरासत में ले लिया. जब पुलिस ने पिता के कहने पर राजीव के कमरे की तलाशी ली तो वहां से लाइसेंसी रिवाल्वर के अलावा पाक अधिकृत कश्मीर का एक अवैध पिस्टल भी बरामद हुआ. साथ ही कई अवैध कारतूस और एक हैंडग्रेनेड भी मिला.
अवैध पिस्टल और कारतूस देखकर पुलिस हैरान रह गई. पुलिस ने लांस नायक के खिलाफ हत्या का प्रयास और आर्म्स एक्ट का मामला दर्ज कर लिया है. पुलिस ने अब सेना की यूनिट को भी हेंडग्रेनेड और पीओके मेड पिस्टल की जानकारी दी है.
 गिरफ्तार किया गया फौजी राजीव भारतीय सेना की 19AD यूनिट में लांस नायक है. वह 15 साल से सेना में नौकरी कर रहा है. उसके दो बच्चे हैं लेकिन राजीव पत्नी से झगड़ता रहता है. पुलिस अब उससे पूछताछ कर रही है.

झोपड़ी में रहने वाले विधायक बंशीधर बौद्ध को बनाया मंत्री

सीएम अखिलेश यादव के साथ विधायक बंशीधर की फाइल फोटो।नेता बनने के बाद लोगों का रहन-सहन बदल जाता है। कोई महंगी गाड़ियों में घूमता दिखाई देता है तो कई आलीशान बंगले का मालिक बन जाता है। लेकिन यूपी के बहराइच जिले के विधायक बंशीधर बौद्ध ऐसे मंत्रियों और नेताओं के लिए मिसाल बन गए हैं। विधायक और अब मंत्री बनने के बावजूद वह झोपड़ी में रहते हैं और समय मिलने पर खेतों में काम भी करते हैं। एक वक्त था, जब घर के गुजारे के लिए बहराइच के बिछिया चौराहे पर वह साइकिल का पंचर बनाते थे। बता दें कि उत्तर प्रदेश के सीएम अखिलेश यादव ने शनिवार को कैबिनेट का विस्तार किया। 21 मंत्रियों को कैबिनेट में जगह दी गई। इसमें एमएलए बंशीधर बौद्ध को राज्‍यमंत्री (स्‍वतंत्र प्रभार) बनाया गया है। इसकी एक वजह उनकी सादगी और ईमानदारी बताई जा रही है। वहीं, पंजाब में अकाली नेता रहे मुलायम के दोस्त रामूवालिया को भी मंत्री बनाया गया है। 
चौकीदार बनकर चोर-डाकुओं से बचाते थे डाक
बहराइच जिला मुख्यालय से करीब 120 किलोमीटर दूर कतर्निया वन्य जीव विहार में स्थित वनग्राम टेड़िया आज एक अलग पहचान बना चुका है और इसे पहचान दी है एक ऐसे शख्स ने जिसके परिवार वाले 40 साल पहले बलिया जिले को छोड़ रोजी-रोटी की तलाश में जंगलों के बीच यहां आकर बस गए। जंगल की ही जमीन पर खेती करने लगे। घने जंगलों में चोर-डाकुओं और जंगली जानवरों से डाक बचाने के लिए सेंट्रल स्टेट फॉर्म ने बंशीधर बौद्ध को चौकीदार की नौकरी दी। हालांकि, कुछ दिनों बाद उन्हें निकाल दिया गया। इसके बाद उन्होंने सत्ता की तरफ रुख किया।
राजनीति में की दमदार एंट्री
13 सितंबर 2014 के दिन समय ने ऐसी करवट ली कि सबकुछ बदल गया, वो दिन था बलहा विधानसभा का उपचुनाव। यह चुनाव बहराइच की मौजूदा बीजेपी सांसद सावित्री बाई फुले के बलहा विधानसभा से पद छोड़ने के कारण हो रहा था। बतौर सपा उम्मीदवार बंशीधर ने बलहा विधानसभा के उपचुनाव में प्रतिद्वंदी बसपा की किरण भारती को बड़े अंतर से हराकर राजनीति की दुनिया में कदम रखा। यूं तो बंशीधर की राजनीति की शुरुआत इससे काफी पहले हो चुकी थी और उन्होंने अपने इलाके का जिला पंचायत सदस्य के तौर पर दो बार प्रतिनिधित्व किया था, लेकिन राजनीति में मजबूत एंट्री विधायक बनने के बाद हुई।
कभी बनाते थे पंचर
कभी घर के गुजारे के लिए बिछिया चैराहे पर साइकिल की पंचर बनाने वाले बंशीधर एक साल पहले आम से खास बन गए। लेकिन हैरानी की बात है कि सबकुछ बदलने के बाद भी बंशीधर नहीं बदले। सत्ताधारी पार्टी के विधायक होने के बाद भी आज बंशीधर झोपड़ी में ही रहते हैं और खेत में काम काम करते हैं।

दिल्ली एयरपोर्ट पर पांच बार मंडराती दिखीं अंजान चीज

नई दिल्ली. इस हफ्ते दिल्ली के इंदिरा गांधी इंटरनेशनल (आईजीआई) के ऊपर और आसपास पांच बार संदिग्ध चीजें मंडराती देखी गईं। इस बारे में खबर मिलने के बाद अब एयरफोर्स को हाई अलर्ट पर रखा गया है। शुक्रवार सुबह एयर ट्रैफिक कंट्रोलर (एटीसी) ने तीन बार इन संदिग्ध चीजों को देखा। सूत्रों का कहना है कि एयर फोर्स के एक हेलिकॉप्टर ने इस उड़ने वाली चीज का पता लगाने के लिए उड़ान भी भरी, लेकिन वह कुछ पता नहीं लगा पाया। एक अंग्रेजी अखबार ने यह जानकारी दी है।
एयर फोर्स के अफसर ने टावर से किया नोटिस
सूत्रों के मुताबिक, शुक्रवार को एयर फोर्स के एक अफसर ने सबसे पहले इस उड़ने वाली चीज को नोटिस किया। एयरपोर्ट के एक अफसर ने बताया, “शुक्रवार सुबह 10.44 बजे इंडियन एयर फोर्स (आईएएफ) का एक मेंबर दिल्ली एयरपोर्ट के आईटीसी टावर पर मौजूद था। उसने सबसे पहले उड़ने वाली चीज रनवे नंबर पर 9-27 पर नोटिस किया। यह दिल्ली एयरपोर्ट का सबसे छोटा रनवे है। इसके बाद सुबह 10.50 और 10.55 पर भी यह संदिग्ध चीज नजर आई, लेकिन इस बार इसकी लोकेशन एयरपोर्ट बाउंड्री के बाहर की तरफ थी।”
मंगलवार और बुधवार को भी थे यही हाल
अफसर के मुताबिक, मंगलवार को भी एटीसी के एक स्टाफ ने ड्रोन जैसा कुछ उड़ते हुए देखा था। लेकिन इन दावों को साबित करने के लिए कोई सबूत नहीं है। अफसर इसे खतरा मानकर चल रहे हैं। बुधवार को भी ऐसा ही कुछ हुआ था।
‘रडार में नहीं आ सका कुछ’
अधिकारी का कहना है, “एटीसी रडार मंगलवार को कुछ कैप्चर नहीं कर पाया। शुक्रवार को स्टाफ के लोगों ने कहा कि रडार ने कुछ कैप्चर किया है, लेकिन बाद में हमने कोई सबूत नहीं पाया। किसी को नहीं पता कि क्या हो रहा है। लेकिन हमने सभी को अलर्ट किया हुआ है, क्योंकि हम कोई रिस्क लेना नहीं चाहते।”
पायलट ने भी की थी लेजर बीम दिखने की शिकायत
- बुधवार को भुवनेश्वर से आने वाली एक फ्लाइट के पायलट ने भी शिकायत की थी कि आईजीआई के रनवे नंबर 29 पर लैंडिंग के वक्त एक लेजर बीम की वजह से वह डिस्टर्ब हो गया था और सैकड़ों यात्रियों की जिंदगी खतरे में पड़ गई थी। दिल्ली पुलिस ने एयरपोर्ट के आसपास के इलाके में लेजर बीम के इस्तेमाल पर रोक लगाई हुई है।
- सूत्रों का कहना है कि इंटेलिजेंस ब्यूरो, सेंट्रल इंडस्ट्रियल सिक्युरिटी फोर्स (सीआईएसएफ), ब्यूरो ऑफ सिविल एविएशन सिक्युरिटी और दिल्ली पुलिस ने एक मीटिंग की। इसके बाद इंडियन एयरफोर्स को हाई अलर्ट पर रहने के लिए कहा गया।
- सूत्रों का यह भी कहना है कि एयरफोर्स को किसी भी संदिग्ध वस्तु को देखने पर शूट करने की इजाजत दी गई है। वहीं, सीआईएसएफ पर एयरपोर्ट की सिक्युरिटी की जिम्मेदारी है। उसे भी कड़ी निगरानी रखने के लिए कहा गया है।
कब-कब देखी गईं ये संदिग्ध चीजें...
  •  मंगलवार को सुबह 7.30 बजे। रनवे नंबर 29 पर।
  •  बुधवार को रात 10.15 बजे। रनवे नंबर 29 पर।
  •  शुक्रवार को सुबह 10.44 पर। रनवे नंबर 27 पर।
  • शुक्रवार को ही सुबह 10.50 पर। संदिग्ध ऑब्जेक्ट एयरपोर्ट से 8 मील की दूरी पर था।
  • शुक्रवार को फिर 10.55 बजे सुबह ही। इस बार यूएफओ जैसा कोई ऑब्जेक्ट था। यह रडार की पकड़ में नहीं आया।

क्रैश हुए रूसी विमान के मलबे से सुनाई दी चीख


स्र से उड़ान भरने के बाद लापता हुआ रूस का विमान क्रैश हो गया है. मिस्र के प्रधानमंत्री कार्यालय ने इसकी पुष्टि कर दी है. रूस का यह यात्री विमान मिस्र के सिनाई प्रायद्वीप के ऊपर से गुजरते हुए लापता हो गया था. इस विमान में 217 यात्री और 7 क्रू मेंबर सवार थे. मिस्र के प्रधानमंत्री कार्यालय ने सिनाई के पास विमान का मलबा मिलने की पुष्टि की है.

रेस्क्यू टीम मौके पर पहुंची तो विमान के एक हिस्से से चीख-पुकार सुनाई दी. सूत्रों के मुताबिक रेस्क्यू टीम 4 लोगों को जिंदा निकालने में कामयाब रही. 
शर्म-अल-शेख से भरी थी उड़ान
यह विमान मिस्र से रूस जा रहा था. यह विमान मिस्र के मशहूर टूरिस्ट स्पॉट शर्म-अल-शेख से रूस जा रहा था. उड़ान भरने के बाद एयर ट्रैफिक कंट्रोल का सिनाई प्रायद्वीप के पास विमान से संपर्क टूट गया था. मिस्र के एविएशन अधिकारियों का कहना है कि इस पैसेंजर प्लेन ने मिस्र के एयरस्पेस से सुरक्षित उड़ान भरी थी. इस विमान में अधिकतर रूस के सैलानी मौजूद थे.
ISIS के प्रभाव वाले इलाके में हादसा
रूसी विमान का क्रैश होना दुनिया के लिए बड़ी चिंता इसलिए है क्योंकि ये विमान उसी इलाके के ऊपर उड़कर रूस जा रहा था जहां इराक, सीरिया और जॉर्डन से होकर गुजरती है. इस इलाके में आतंकी संगठन ISIS का गढ़ है. रूस पिछले दो महीने से ISIS पर हमले कर रहा है. 200 से ज्यादा हवाई हमलों में ISIS की कमर टूट चुकी है.