Monday, 6 April 2015

दिल चाहता है

भर आईं आंखें
मैं पतिदेव से कई दिनों से एक अच्छी साड़ी लाने की जिद कर रही थी, क्योंकि मुझे अपने भाई की शादी में मायके जाना था, लेकिन ये हर दिन पैसे न होने का बहाना बना टाल जाते। एक दिन बोले कि अलमारी से कोई भी साड़ी निकालकर पहन लेना। गुस्से के कारण उस दिन मैंने खाना नहीं बनाया। जब इन्हें भूख लगी तो इन्होंने खाना खुद बनाया और बोले कि कोई खाए या न खाए मैं तो जरूर खाऊंगा। फिर इन्होंने मुझसे खाने को कहा तो मैं गुस्से के कारण कमरे में जाकर सो गई।

शाम को अनमने मन से उठी और अलमारी खोलने लगी कि शायद कोई अच्छी साड़ी मिल ही जाए। अलमारी खोलते ही मैं चकित रह गई। अलमारी में तीन नई साडिय़ां रखी थीं। साथ ही ढेर सारा श्रंगार का सामान भी रखा था। सामान के पास ही एक स्लिप रखी थी, जिसमें लिखा था, कहो तोहफा कैसा लगा। अचानक मेरे हाथ में साडिय़ों का बिल पड़ गया, उसमें पिछले दिन की डेट पड़ी थी। मैं दौड़कर इनके पास गई तो मुझे देखकर यह बोले कि पहनने लायक कोई साड़ी मिली या नहीं। तभी मेरी नजर टेबल पर रखे भोजन पर पड़ी। मैंने इनसे पूछा कि आपने खाना नहीं खाया। ये मेरी आंखों में देखते हुए बोले कि कभी तुम्हारे बिना खाना खाया है? इनका प्रेम देखकर मेरी आंखें भर आईं।

मोनी गुप्ता, गोरखपुर (पुरस्कृत रु. 500)

घूंघट की आड़ में हुई गलती

शादी के बाद मैं दूसरी बार ससुराल जा रही थी। रास्ते में पति से बात करने में मुझे बहुत शर्म आ रही थी। शर्म के कारण मैं उनसे बहुत कम बोल रही थी। ट्रेन की सीट पर हम दोनों ऐसे साथ बैठे थे, मानो एक-दूसरे से अपरिचित हों। रेलवे स्टेशन से बाहर निकलने के बाद हम रिक्शे से घर जाना चाह रहे थे, मगर कोई रिक्शा नहीं मिल रहा था। इस पर इन्होंने मुझसे पूछा क्या पैदल चल पाओगी? जवाब में मैंने हां कहां और हम दोनों घर का सफर पैदल ही तय करने लगे। कुछ दूर तक तो हम साथ-साथ चले। फिर इन्होंने मुझसे घूंघट डालने को कहा और आगे-आगे चलने लगे। इन्होंने काली पैंट पहन रखी थी। घूंघट के कारण मैं इन्हें देख तो नहीं पा रही थी, लेकिन पैंट के रंग से पता चल रहा था कि ये आगे चल रहे हैं। तेज कदमों से चलते हुए काली पैंट वाला आदमी एक घर में घुसा। मैं भी उसके पीछे-पीछे घर के अंदर चली आई, लेकिन अंदर जाने वह आदमी बोला कि किससे मिलना है। अंजान घर में खुद को पाकर मुझे भी बहुत शर्म महसूस हो रही थी।

भगवान का शुक्र है कि वह आदमी बहुत सज्जन था। उसे मैंने पूरी स्थिति से अवगत कराया और उसने मुझे मेरे घर पहुंचा दिया। घर में सबका हाल-बेहाल था और सब परेशान थे। साथ ही पतिदेव को डांट भी लगा रहे थे। दरअसल हुआ यह था कि कुछ दूर चलने के बाद यह थोड़ा तेज चलने लगे और मुझे पता ही नहीं चला कि कब यह मेरी आंखों से ओझल हो गए और मैं किसी दूसरे काली पैंट वाले के पीछे चलने लगी थी। आज तीन साल बाद भी इस घटना को याद करती हूं तो मुझे हंसी आ जाती है।
 
भर आईं आंखें
मैं पतिदेव से कई दिनों से एक अच्छी साड़ी लाने की जिद कर रही थी, क्योंकि मुझे अपने भाई की शादी में मायके जाना था, लेकिन ये हर दिन पैसे न होने का बहाना बना टाल जाते। एक दिन बोले कि अलमारी से कोई भी साड़ी निकालकर पहन लेना। गुस्से के कारण उस दिन मैंने खाना नहीं बनाया। जब इन्हें भूख लगी तो इन्होंने खाना खुद बनाया और बोले कि कोई खाए या न खाए मैं तो जरूर खाऊंगा। फिर इन्होंने मुझसे खाने को कहा तो मैं गुस्से के कारण कमरे में जाकर सो गई।
शाम को अनमने मन से उठी और अलमारी खोलने लगी कि शायद कोई अच्छी साड़ी मिल ही जाए। अलमारी खोलते ही मैं चकित रह गई। अलमारी में तीन नई साडिय़ां रखी थीं। साथ ही ढेर सारा श्रंगार का सामान भी रखा था। सामान के पास ही एक स्लिप रखी थी, जिसमें लिखा था, कहो तोहफा कैसा लगा। अचानक मेरे हाथ में साडिय़ों का बिल पड़ गया, उसमें पिछले दिन की डेट पड़ी थी। मैं दौड़कर इनके पास गई तो मुझे देखकर यह बोले कि पहनने लायक कोई साड़ी मिली या नहीं। तभी मेरी नजर टेबल पर रखे भोजन पर पड़ी। मैंने इनसे पूछा कि आपने खाना नहीं खाया। ये मेरी आंखों में देखते हुए बोले कि कभी तुम्हारे बिना खाना खाया है? इनका प्रेम देखकर मेरी आंखें भर आईं।
मोनी गुप्ता, गोरखपुर (पुरस्कृत रु. 500)
घूंघट की आड़ में हुई गलती
शादी के बाद मैं दूसरी बार ससुराल जा रही थी। रास्ते में पति से बात करने में मुझे बहुत शर्म आ रही थी। शर्म के कारण मैं उनसे बहुत कम बोल रही थी। ट्रेन की सीट पर हम दोनों ऐसे साथ बैठे थे, मानो एक-दूसरे से अपरिचित हों। रेलवे स्टेशन से बाहर निकलने के बाद हम रिक्शे से घर जाना चाह रहे थे, मगर कोई रिक्शा नहीं मिल रहा था। इस पर इन्होंने मुझसे पूछा क्या पैदल चल पाओगी? जवाब में मैंने हां कहां और हम दोनों घर का सफर पैदल ही तय करने लगे। कुछ दूर तक तो हम साथ-साथ चले। फिर इन्होंने मुझसे घूंघट डालने को कहा और आगे-आगे चलने लगे। इन्होंने काली पैंट पहन रखी थी। घूंघट के कारण मैं इन्हें देख तो नहीं पा रही थी, लेकिन पैंट के रंग से पता चल रहा था कि ये आगे चल रहे हैं। तेज कदमों से चलते हुए काली पैंट वाला आदमी एक घर में घुसा। मैं भी उसके पीछे-पीछे घर के अंदर चली आई, लेकिन अंदर जाने वह आदमी बोला कि किससे मिलना है। अंजान घर में खुद को पाकर मुझे भी बहुत शर्म महसूस हो रही थी।
भगवान का शुक्र है कि वह आदमी बहुत सज्जन था। उसे मैंने पूरी स्थिति से अवगत कराया और उसने मुझे मेरे घर पहुंचा दिया। घर में सबका हाल-बेहाल था और सब परेशान थे। साथ ही पतिदेव को डांट भी लगा रहे थे। दरअसल हुआ यह था कि कुछ दूर चलने के बाद यह थोड़ा तेज चलने लगे और मुझे पता ही नहीं चला कि कब यह मेरी आंखों से ओझल हो गए और मैं किसी दूसरे काली पैंट वाले के पीछे चलने लगी थी। आज तीन साल बाद भी इस घटना को याद करती हूं तो मुझे हंसी आ जाती है।
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