नया सानवाड़ा/सिरोही/जयपुर। गांव
घाटीफली के राजकीय प्राथमिक विद्यालय जाने का उबड़-खाबड़ कच्च्चा रास्ता।
तपती दोपहर में सिर पर चमकता सूरज आौर तवे सी जलती जमीन। नंगे पैर पगडंड़ी
पर चल रहे सात-आठ बच्चे आपको इस धुंधली सी तस्वीर में दिख रहे होंगे। इसी
तरह से राजस्थान की गर्मी में नंगे पांव स्कूल आना-जाना इन बच्चों का रोज
का काम है। लेकिन ये चाहते हैं कि ये पढ़ें ताकि भविष्य में इनके बच्चे इस
तरह धूप में सिर पर किताबें रखकर स्कूल ना जाएं। आदिवासी परिवारों से आए ये
बच्चे आर्थिक रूप से इतने कमजोर हैं कि मां-बाप से भी कभी चप्पलों की मांग
नहीं करते।
गर्मी हो या बरसात, नंगे पांव करते सफर
दो से पांच किमी की दूरी तय कर रोजाना ये आदिवासी बच्चे स्कूल पहुंचते हैं। इनको कॉपी-किताब तो स्कूल से मिल जाती है। पर, गर्मी-पानी से बचने के लिए जूतों की व्यवस्था करना उनके लिए टेढ़ी खीर है। इस स्कूल में पांचवीं तक दस-ग्यारह साल तक के बच्चे पढऩे के लिए आते है। स्कूल में विद्यार्थियों का नामांकन भी 72 है। पर, सिर्फ दस विद्यार्थी ही चप्पलें या जूते पहनें आ रहे है। यह बच्चे हर रोज इसी तरह नंगे पैर स्कूल आते है।
किसे बयां करे दर्द
आदिवासी क्षेत्रों में स्थित स्कूल तो होता है, लेकिन इन स्कूलों में पढ़ाई करने वाले बच्चे फलियों से आते हैं। विद्यार्थी बताते हैं कि घर पहुंचते-पहुंचते करीब आधे घंटे तक समय लग जाता है। ऐसे में पैरों के नीचे जलन होती है। इससे स्कूल आवाजाही में परेशानी झेलनी पड़ती है।
स्कूल अच्छा लगता है
स्कूल में पढऩे वाले तेजा व अन्य बच्चों ने कहा कि चप्पल भले ही नहीं है। पर, हम स्कूल रोज आते हैं और रोज आएंगे भी। इनमें से अधिकांश के अभिभावक मजदूरी और खेती का काम करते हैं।
बजट नहीं आता...
बच्चों के जूते, चप्पल के लिए शिक्षा विभाग की ओर से कोई बजट नहीं आता है। जनसहयोग से विद्यार्थियों के लिए व्यवस्था करवा देंगे।
गर्मी हो या बरसात, नंगे पांव करते सफर
दो से पांच किमी की दूरी तय कर रोजाना ये आदिवासी बच्चे स्कूल पहुंचते हैं। इनको कॉपी-किताब तो स्कूल से मिल जाती है। पर, गर्मी-पानी से बचने के लिए जूतों की व्यवस्था करना उनके लिए टेढ़ी खीर है। इस स्कूल में पांचवीं तक दस-ग्यारह साल तक के बच्चे पढऩे के लिए आते है। स्कूल में विद्यार्थियों का नामांकन भी 72 है। पर, सिर्फ दस विद्यार्थी ही चप्पलें या जूते पहनें आ रहे है। यह बच्चे हर रोज इसी तरह नंगे पैर स्कूल आते है।
किसे बयां करे दर्द
आदिवासी क्षेत्रों में स्थित स्कूल तो होता है, लेकिन इन स्कूलों में पढ़ाई करने वाले बच्चे फलियों से आते हैं। विद्यार्थी बताते हैं कि घर पहुंचते-पहुंचते करीब आधे घंटे तक समय लग जाता है। ऐसे में पैरों के नीचे जलन होती है। इससे स्कूल आवाजाही में परेशानी झेलनी पड़ती है।
स्कूल अच्छा लगता है
स्कूल में पढऩे वाले तेजा व अन्य बच्चों ने कहा कि चप्पल भले ही नहीं है। पर, हम स्कूल रोज आते हैं और रोज आएंगे भी। इनमें से अधिकांश के अभिभावक मजदूरी और खेती का काम करते हैं।
बजट नहीं आता...
बच्चों के जूते, चप्पल के लिए शिक्षा विभाग की ओर से कोई बजट नहीं आता है। जनसहयोग से विद्यार्थियों के लिए व्यवस्था करवा देंगे।
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