राजीव गांधी मामले में सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला 258 पेज का है। संवैधानिक पीठ ने कहा है अगर फांसी को उम्र कैद में तब्दील करने के वक्त अगर कोर्ट ये शर्त कोर्ट लगा देता है कि इसकी रिहाई नहीं हो सकती तो रिहाई नहीं होगी। उस समय राज्य अपने अधिकारों का प्रयोग कर दोषी को रिहा नहीं कर सकता।
इस मामले पर कोर्ट ने कहा कि राज्यपाल और राष्ट्रपति के एक बार माफ़ी के बाद यानी दोषी को (फांसी से उम्र कैद की सज़ा में बदलते है) तो उसके बाद भी अगर राज्य सरकार या केंद्र सरकार चाहे तो अपने अधिकार का प्रयोग कर उम्र कैद की सजा पाये दोषी को रिहा कर सकती है (लेकिन तब जब कोर्ट ने कोई शर्त न लगाई हो)। मगर, संवैधानिक पीठ ने यह भी साफ़ कर दिया कि जिस मामले में केंद्रीय जांच एजेंसी ने जांच की, उस मामले में उम्र कैद की सज़ा पाये दोषी को रिहा करने से पहले केंद्र से परामर्श ही नहीं सहमति भी जरूरी है।
संवैधानिक पीठ ने कहा कि अगर दोषी को सज़ा केंद्र के कानून के तहत किया है तो रिहाई का फैसला बिना केंद्र की सहमति के नहीं होगा। कोर्ट ने कहा कि बिना किसी अर्जी के राज्य सरकार स्वतः संज्ञान लेकर उम्र कैद की सज़ा पाये दोषी को रिहा नहीं कर सकती। दोषी के तरफ से अर्जी आने के बाद ही राज्य सरकार कोई फैसला ले सकती है।
क्या था पूरा मामला...
दरअसल राजीव गांधी हत्याकांड में मौत की सजा से राहत पाने वाले सभी दोषियों को रिहा करने के तमिलनाडु सरकार के फैसले के ख़िलाफ़ दायर याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने अपना फैसला सुरक्षित रखा था।
No comments:
Post a Comment