कोबानी (सीरिया): पूरी दुनिया का ध्यान रिफ्यूजियों की समस्या की ओर खींचने वाले तीन साल के सीरियाई बच्चे एलन कुर्दी
को उसकी जमीन पर शुक्रवार को दफना दिया गया। आईएसआईएस के आतंक से डरा एलन
का परिवार नाव से तुर्की पहुंचने की कोशिश कर रहा था। नाव पलट गई और एलन,
उसके पांच साल के भाई गालिप कुर्दी और मां रेहाना की पानी में डूबकर मौत हो
गई। तुर्की के समुद्र तट पर एलन की डेड बॉडी की फोटो सामने आने के बाद इस
वक्त पूरी दुनिया का ध्यान शरणार्थियों की समस्या की ओर खिंचा है।
एलन के पिता अब्दुल अपने बेटे की लाश के साथ शुक्रवार को सीरियाई शहर
कोबान पहुंचे। आईएसआईएस और कुर्दिश विद्रोहियों के बीच जंग की वजह से पूरा
शहर तबाह हो चुका है। तीन महीने पहले ही अब्दुल के परिवार के 11 लोगों को
आईएसआईएस के आतंकियों ने मार डाला था। इसी शहर के कब्रिस्तान में एलन, उसकी
मां और भाई को दफनाया गया। दफनाए जाते वक्त एलन के परिवार के अलावा शहर के
काफी लोग भी वहां पहुंचे थे। अब्दुल्ला का कहना है कि वह अब सीरिया छोड़कर
कहीं नहीं जाएंगे। अब्दुल्ला के चाचा ने कहा कि वह सिर्फ अपने परिवार की
वजह से यह शहर छोड़ना चाहते थे।
क्या कर रही हैं यूरोपीय सरकारें
>यूएन रिफ्यूजी चीफ एंटोनियो ग्यूटेरेस ने शुक्रवार को
यूरोपीय देशों से अपील की कि वे करीब दो लाख रिफ्यूजियों को मैसिव रिलोकेशन
प्रोग्राम के तहत अपने यहां शरण दें।
>यूरोपियन यूनियन ने 16 सितंबर को होने वाली मीटिंग में इस संकट से निकलने के रास्ते पर विचार करने का फैसला किया है।
>ब्रिटेन के पीएम ने कहा कि वे 'हजारों' रिफ्यूजियों को
अपनाने को तैयार हैं। उन्होंने शरण दिए जाने को लेकर देश के कानून की
समीक्षा के आदेश दे दिए हैं। बच्चे की मौत के बाद ब्रिटेन के पीएम आलोचकों
के निशाने पर हैं। उनका कहना है कि कैमरन देश को शर्मिंदा कर रहे हैं।
क्या है समस्या?
फिलहाल, इस मुद्दे पर सभी देशों की एक राय नहीं बन पाई है। कोटा
सिस्टम रिजेक्ट किया जा चुका है। यूरोपीय देशों में आपस में ही मतभेद सामने
आ रहे हैं। इसकी वजह यह है कि कुछ देश इस संकट से ज्यादा प्रभावित हैं।
इनके यहां बहुत ज्यादा रिफ्यूजी पहुंच रहे हैं, इसलिए इन पर रिफ्यूजियों के
साथ सख्ती करने का दबाव बन रहा है। हंगरी ने सर्बिया के बॉर्डर पर 175
किमी लंबी बाड़ लगाई है। वहीं, ब्रिटेन ने जनवरी 2014 के बाद से महज 216
सीरियाई रिफ्यूजियों को अपनाया है। तुर्की ने 20 लाख रिफ्यूजियों को अपनाया
है। वहीं, पूरे यूरोप ने बीते चार साल में महज दो लाख लोगों को शरण दी।
तुर्की के प्रेसिडेंट ने तो यहां तक कह दिया कि 28 देश मिलकर यह डिस्कस कर
रहे हैं कि 28 हजार रिफ्यूजियों को आपस में कैसे बांटे।
जानें पूरी समस्या के बारे में...
>क्या है यूरोपियन माइग्रेशन संकट
इस साल जुलाई तक 4 लाख 38 हजार लोग यूरोपीय देशों में शरण मांग चुके
हैं। बीते साल ही 5 लाख 71 हजार लोग यूरोप में शरण ले चुके हैं।
रिफ्यूजियों की यह बढ़ती तादाद यूरोपीय देशों के लिए संकट का सबब बन गई है।
खास तौर पर शेंगेन देशों में। शेंगेन एरिया के अंतर्गत कुल 26 यूरापीय देश
आते हैं, जिन्होंने कॉमन बॉर्डर पर पासपोर्ट और दूसरे किस्म के बॉर्डर
कंट्रोल हटा लिए हैं। कॉमन वीजा पॉलिसी के तहत यह पूरा इलाका एक देश की तरह
काम करता है। यहां लोगों की आवाजाही पर पाबंदी नहीं है। यूरोपीय देशों में
शरण लेने की कोशिश करने वाले लोग अधिकतर भूमध्य सागर के जरिए वहां पहुंचने
की कोशिश करते हैं। जिन देशों में ये जाते हैं, वहां इनके लिए खाना, छत और
हेल्थ सर्विसेस मुहैया कराने में सरकार को दिक्कतें आती हैं।
>कहां से आ रहे रिफ्यूजी और क्यों
पश्चिमी एशिया और नॉर्थ अफ्रीका के जंग से प्रभावित इलाके। इसके अलावा, गरीब यूरोपीय देशों से।
पश्चिमी एशिया और नॉर्थ अफ्रीका के जंग से प्रभावित इलाके। इसके अलावा, गरीब यूरोपीय देशों से।
अधिकतर लोग सीरिया और लीबिया से पहुंच रहे हैं, जहां बीते चार साल से
गृहयुद्ध छिड़ा हुआ है। यहां आईएसआईएस ने लोगों का जीना मुहाल कर रखा है।
इसके अलावा अफगानिस्तान, इराक और नाइजीरिया से भी लोग गरीबी और जंग से
परेशान होकर यूरोप जाना चाहते हैं। यूरोप से आने वाले रिफ्यूजियों की बात
करें तो वे कोसोवो और सर्बिया जैसे देशों से हैं।
>कैसे पहुंचते हैं यूरोप?
इस साल ग्रीस के बॉर्डर पर सबसे ज्यादा रिफ्यूजी शरण लेने पहुंचे। इनमें से अधिकतर सीरिया के लोग थे, जो तुर्की तक बोट्स में सवार होकर पहुंचे। छोटी-छोटी नावों में बैठकर ये ट्यूनीशिया या लीबिया से इटली पहुंचने की कोशिश करते हैं। क्षमता से ज्यादा लोगों के इन नावों पर सवार होने की वजह से कई बार बड़े हादसे भी हुए। कुछ नाव लीबिया तट तक पहुंचने से पहले ही डूब गए। चंद लालची लोग इन लोगों की जान की परवाह न करते हुए इन्हें रबर के बने बोट्स में यूरोप भेजने की कोशिश करते हैं और बदले में लाखों कमाते हैं। ये बोट्स पानी पर तैरते ताबूत बनकर रह गए हैं। अब तक 3200 से ज्यादा लोगों की इस कोशिश में मौत हो चुकी है।
इस साल ग्रीस के बॉर्डर पर सबसे ज्यादा रिफ्यूजी शरण लेने पहुंचे। इनमें से अधिकतर सीरिया के लोग थे, जो तुर्की तक बोट्स में सवार होकर पहुंचे। छोटी-छोटी नावों में बैठकर ये ट्यूनीशिया या लीबिया से इटली पहुंचने की कोशिश करते हैं। क्षमता से ज्यादा लोगों के इन नावों पर सवार होने की वजह से कई बार बड़े हादसे भी हुए। कुछ नाव लीबिया तट तक पहुंचने से पहले ही डूब गए। चंद लालची लोग इन लोगों की जान की परवाह न करते हुए इन्हें रबर के बने बोट्स में यूरोप भेजने की कोशिश करते हैं और बदले में लाखों कमाते हैं। ये बोट्स पानी पर तैरते ताबूत बनकर रह गए हैं। अब तक 3200 से ज्यादा लोगों की इस कोशिश में मौत हो चुकी है।
No comments:
Post a Comment