ठीक
है। आप पार्टी की ऐतिहासिक जीत हो गई। अब
बताइए - दिल्ली में सरकार का मतलब
क्या? दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी है। इसलिए पूर्ण राज्य न होते हुए भी सारे
राज्यों से ऊपर है। एक तरह से देश की नाक है। लेकिन इसके उल्टे अधिकारों
और फण्ड्स के मामले में दिल्ली सरकार उतनी ही लाचार है। डीबी डिजिटल के
नेशनल एडिटर नवनीत गुर्जर बता रहे हैं, दिल्ली में सरकार बनने का असल मतलब:
लाचार से मतलब?
मतलब ये है कि अगर केंद्र में भी उसी दल की सरकार हो जिसकी दिल्ली में
हो तब तो सोने पर सुहागा। लेकिन केंद्र में अलग दल की सरकार हो तो दिल्ली
सरकार की पोज़ीशन किसी भी बड़े शहर के नगर निगम जैसी रह जाती
है।मुख्यमंत्री मेयर जैसा और विधायक पार्षद जैसे। बाकी राज्य सरकारों और
दिल्ली सरकार के अधिकारों में क्या फर्क होता है? देखिए देश के बाकी राज्य
सरकारों के पास तो असीमित अधिकार होते हैं। राज्यों के मुख्यमंत्री एक तरह
से अपने राज्य के प्रधानमंत्री होते हैं लेकिन दिल्ली में ऐसा नहीं है।
सारी व्यवस्था देखने वाली पुलिस जिस पर बहुत कुछ निर्भर रहता है, वही
दिल्ली सरकार के हिस्से में नहीं है।
तो दिल्ली सरकार के पास है क्या?
सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र यानी लैंड, लॉ एण्ड ऑर्डर, ट्रैफिक और एक
बहुत बड़ा इलाका दिल्ली कैंट केंद्र सरकार के हिस्से में आते हैं। दिल्ली
सरकार के पास है - वोट, एक्साइज, स्टैंप ड्यूटी और परिवहन।
फण्ड्स कहाँ से आएंगे?
ये जो दो - तीन ड्यूटी हैं इसके अलावा दिल्ली सरकार के पास पैसा आने
का कोई बड़ा ज़रिया नहीं है। केंद्र की सहायता पर ही निर्भर रहना पड़ता है।
पिछली बार केंद्र ने सात सौ करोड़ की सहायता केंद्र ने दिल्ली को दी थी।
दिल्ली सरकार का पिछला बजट 36,766 करोड़ का था।अगर मप्र से तुलना करें तो
उसका पिछला बजट 1,17,041 करोड़ का था। यानी दिल्ली से चार गुना ज्यादा।मोटा
मोटा ऐसा समझें कि मप्र की शिक्षा और ग्रामीण विकास के संयुक्त बजट के
बराबर दिल्ली का कुल बजट है।
मान लीजिए कल को दिल्ली में दंगा हो जाए तो केजरीवाल सरकार क्या कर लेगी?
केंद्र से मदद माँगने के अलावा उनके पास कोई चारा नहीं है।
तो इसीलिए केजरीवाल पिछली बार पुलिस पर अधिकार चाहते थे?
हां। केजरीवाल ने इसीलिए एनडीएमसी और दिल्ली कैंट को छेड़ बाकी दिल्ली
की पुलिस अपने अण्डर चाह रहे थे लेकिन इसके भी कई पहलू हैं। मसलन अकेली
दिल्ली पुलिस का बजट ही साढ़े
चार हजार करोड़ है। वो कहाँ से आएगा! बजट तो केंद्र से ही लेना पड़ेगा।
पर दिल्ली में भाजपा की इतनी बुरी हार तो किसी ने नहीं सोची थी। ये क्या हो गया?
हाँ, न भाजपा ने ऐसा सोचा था, न आप ने। दिल्ली में भाजपा की स्थिति
वैसी ही हो गई है जैसी देशभर में कांग्रेस की हुई थी। जैसे लोकसभा में
भाजपा कांग्रेस को विपक्ष के नेता का पद भी नहीं दे रही है वैसे ही दिल्ली
विधानसभा में भाजपा अब नेता प्रतिपक्ष पद पाने के लायक नहीं रह गई है।
पिछली बार कांग्रेस की दिल्ली में जो पोज़ीशन थी, भाजपा उसके आधे से भी पर
जाती दिखाई दे रही है।
इसकी मूल वजह?
कारण कई हैं जो कई बार बताए जा चुके हैं। नई बात ये है कि मोदी और अमित शाह
ऐसी पार्टी, ऐसी सरकार चलाना चाहते हैं जहाँ इनकी कोई आलोचना न करे, कोई
टोके नहीं। न पार्टी नेता या कार्यकर्ता, न आम आदमी, न मीडिया। ऐसा नहीं
होता इंदिरा गांधी की भी आलोचना होती थी। पार्टी के भीतर भी, बाहर भी। फिर
आप कहाँ से आए हैं? बहरहाल भाजपा की इस हार से देश को एक उम्मीद बंधी है और
वो ये है कि अब केंद्र सरकार कुछ अच्छे काम करेगी। बजट अच्छा आएगा। और भी
कुछ सुधार होंगे। सिर्फ बातों, भाषणों से सपने जगाने के अलावा।
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