मुंबई। मणिपुर
की रेबिता महज 23 साल की हैं। पर बॉडीबिल्डिंग में पहला इंटरनेशनल मेडल जीत
लिया है। दिसंबर में मुंबई में हुई वर्ल्ड बॉडी बिल्डिंग चैम्पियनशिप में
रेबिता ने ब्रॉन्ज जीता। मुंबई में हुई इस बॉडीबिल्डिंग चैम्पियनशिप में
मेडल जीतने वह देश की दूसरी महिला बन गई है। रेबिता घंटों जी-तोड़ मेहनत
करती हैं, लेकिन पढ़ाई नहीं छोड़ी। बायोकेमिकल इंजीनियरिंग कर रही हैं। इस
साल कोर्स पूरा होने वाला है।
रेबिता जब सात साल की थीं तब घर के पड़ोस वाले स्पोर्ट्स एकेडमी में मम्मी से छिपकर चली जाती थीं। एक दिन पापा ने देख लिया तो खूब पिटाई हुई। साथ ही अल्टीमेटम मिला कि स्पोर्ट्स में जाना है तो कम से कम मैट्रिक तक की पढ़ाई पूरी करो। उसी साल घर के सामने से एक जुलूस निकला। गोल्ड मेडलिस्ट बॉक्सर दिनको सिंह आगे-आगे, पूरी भीड़ पीछे-पीछे। रेबिता ने देखा, मन में बैठा लिया कि स्पोर्ट्सपर्सन ही हीरो होते हैं। तभी ठान भी लिया कि पढूंगी भी और खेलूंगी भी।
मणिपुर में स्पोर्ट्स को अच्छा ही माना जाता है। लेकिन रेबिता के घर में पढ़ाई को ज्यादा तरजीह दी जाती थी। यही कारण था कि उनके छह भाई-बहनों में से कोई भी स्पोर्ट्स में नहीं गया। दोनों बहनें हाउसवाइफ हैं, एक भाई सोशल वर्कर, एक कॉल सेंटर एक्जीक्यूटिव तो एक जेएनयू से म्यूजिक में मास्टर्स कर रहे हैं।
रेबिता सबसे छोटी हैं। उन्होंने परिवार की बात मानी, परिवार ने उनकी।
पिता किसान हैं। उनके लिए छह बच्चों को पालना आसान न था। इसलिए रेबिता को
जब भी इवेंट में जाने के लिए पैसों की जरूरत पड़ी तो गांववालों ने चंदा
इकट्ठा किया। उनके जिम में हिंदी की एक प्रोफेसर आती हैं। डॉ. हाउबोम आनेदी
देवी। उन्होंने भी रेबिता की मदद की।
रेबिता ने जब 2011 में बॉडीबिल्डिंग की शुरुआत की तो देश में सिर्फ
4-5 महिलाएं ही इस पेशे में थीं। अभी महज 10 हैं। इसलिए रेबिता को सीधे
इंटरनेशनल इवेंट में जाने का मौका मिल गया।
दिसंबर में मुंबई में वर्ल्ड बॉडी बिल्डिंग चैम्पियनशिप हुई थी। रेबिता ने इसमें ब्रॉन्ज जीता है। 2012 में बैंकॉक, 2013 में बुडापेस्ट, 2014 में मकाओ में वर्ल्ड चैम्पियनशिप में भाग लिया।
दिसंबर में मुंबई में वर्ल्ड बॉडी बिल्डिंग चैम्पियनशिप हुई थी। रेबिता ने इसमें ब्रॉन्ज जीता है। 2012 में बैंकॉक, 2013 में बुडापेस्ट, 2014 में मकाओ में वर्ल्ड चैम्पियनशिप में भाग लिया।
लेकिन मेडल नहीं जीत पाई। हां टॉप 5 तक हमेशा पहुंची। लेकिन खुद से
पक्का वादा था मेडल तो जीतना ही है। मुंबई में हुई बॉडीबिल्डिंग
चैम्पियनशिप में मेडल जीतने वह देश की दूसरी महिला बन गई है। इससे पहले
2012 में उनकी सीनियर ममता ने मेडल जीता था।
कमजोरी के कारण वुशू में हारी तो मसल्स बनाने में जुट गई : बॉडीबिल्डिंग में आने की उनकी कहानी भी गजब की है।
कमजोरी के कारण वुशू में हारी तो मसल्स बनाने में जुट गई : बॉडीबिल्डिंग में आने की उनकी कहानी भी गजब की है।
2011 तक रेबिता बॉक्सिंग, ताइक्वांडो और वुशू खेलती थीं। वुशू में
पार्ट लेने एक इवेंट में गई थी जहां चीनी खिलाड़ी ने उन्हें हरा दिया था।
कारण ये था कि रेबिता बहुत कमजोर, दुबली पतली थी। तभी ठान लिया अब मसल्स
बनाना है। मणिपुर में ही जिम ज्वाइन किया। वहां के इंस्ट्रक्टर ने उन्हें
प्रोफेशनल बॉडीबिल्डिंग में जाने को कहा। उनके पास वुशू और बॉडीबिल्डिंग
दोनों के ऑफर थे। पर चुना बॉडीबिल्डिंग।
रोज 6 घंटे रोज प्रैक्टिस, शनिवार-रविवार ट्यूशन
सुबह 4:30 बजे उठना। फिर एक घंटे में 6 किमी दौड़ना। उसके बाद
ब्रैकफास्ट कर जिम जाना। सुबह 3 घंटे, शाम 3 घंटे। इस बीच पढ़ाई-कॉलेज और जब
कॉलेज नहीं तो शनिवार-रविवार को ट्यूशन। रेबिता कहती हैं कि उनकी ज्यादातर
पढ़ाई ट्यूशन पर ही होती है। चैम्पियनशिप के तीन महीने पहले से रूटीन बदल
जाता है। हर रोज जिम में हर एक्सरसाइज के 50 सेट्स पांच-पांच बार लगाती
हैं। एब्स की तो अनलिमिटेड एक्सरसाइज। पैरों से 255 किलो और चेस्ट व शोल्डर
के लिए 50-80 किलो तक वजन उठाती हैं। थक जाएं या टेंशन हो या अपने से
ज्यादा वजन के खिलड़ी से मुकाबले को लेकर डिप्रेशन में जाने का खतरा तो
पेंटिंग करने लगती हैं।
फल खाने से पहले दूसरे को चखाती हैं, कहीं मीठा तो नहीं
रेबिता के मुताबिक बॉडी बिल्डिंग की सबसे बड़ी चुनौती है खानपान।
चैम्पियनशिप के महीनों पहले से वे अपना फेवरेट चावल खाना छोड़ देती हैं। तेल
तो हमेशा के लिए मना है। शुगर शरीर में न जाए इसलिए कोई भी फल खाने से
पहले दूसरे को चखाती हैं। नैचुरल शुगर भी ले नहीं सकतीं।
जब पूछा कि स्पोर्ट्स में जाना था तो टेक्निकल सब्जेक्ट क्यों चुना? तो बोलीं, ये सब्जेक्ट मुझे बॉडीबिल्डिंग में भी काम आता है।
जब पूछा कि स्पोर्ट्स में जाना था तो टेक्निकल सब्जेक्ट क्यों चुना? तो बोलीं, ये सब्जेक्ट मुझे बॉडीबिल्डिंग में भी काम आता है।
बॉडी के कैमिकल्स उनके कोर्स में पढ़ाए जाते हैं। मजा भी आता है और
अपने प्रोफेशन की कई सारी छोटी बाते भी पता चल जाती हैं। अब उनका अगला
टारगेट है यूनिवर्स बॉडीबिल्डिंग में मेडल जीतना। एशिया की किसी महिला ने
अब तक ये नहीं जीता है।
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