Saturday, 20 June 2015

फिल्म रिव्यू: एबीसीडी-2 डांस के दीवानों के लिए महा मेला

दो साल पहले आई 'एबीसीडी' फिल्म देख दिल में एक ख्वाहिश जगी थी कि बॉलीवुड में विशुद्ध रूप से डांस पर आधारित फिल्में बनती रहनी चाहिए। पारंपरिक या पॉप संस्कृति से जन्मे ब्रेक डांस से आगे की बात करती 'एबीसीडी' नए जमाने में नए दौर के डांस का चित्रण करती दिखी। तब मन में एक सवाल भी उठा था कि आखिर हमारे यहां डांस पर आधारित फिल्में इतनी कम क्यों बनती हैं? 'एबीसीडी 2' इस कड़ी में सार्थक प्रयास लगता है, जो एक बार फिर सिर्फ और सिर्फ डांस और डांसरों की बात करती है। डांस आधारित फिल्म की सबसे बड़ी जरूरत अगर डांस है तो वो इसमें कूट-कूट कर भरा है। मगर डांस के साथ इमोशनल टच भी जरूरी है। तो क्या इस पहलू पर भी ध्यान दिया गया है? आइए बताते हैं, लेकिन इससे पहले जरा कहानी...

रेमो डिसूजा की इस फिल्म को आप एक नई कहानी के रूप में ही लें, सीक्वल से न जोड़ें। मुंबई के एक डांस ग्रुप 'मुंबई स्टनर्स' की उस समय थू-थू होती है, जब उन्हें चोर, कॉपीकैट कह एक रियालिटी शो से बाहर कर दिया जाता है। आरोप है कि इस ग्रुप ने प्रतियोगिता में फिलीपीन्स के एक डांस ग्रुप के स्टेप्स चोरी कर परफॉर्म किया है। ग्रुप का लीड डांसर सुरेश उर्फ सुरू (वरुण धवन) की फजीहत इस वजह से भी ज्यादा होती है, क्योंकि वह एक मशहूर क्लासिकल डांसर का बेटा है।

इस चोरी से सुरू के साथी विनी (श्रद्धा कपूर), राघव (राघव जुयाल) और वेरनोम (सुशांत पुजारी) की भी खूब बदनामी होती है। अपने माथे से बदनामी का ये दाग मिटाने के लिए सुरू वर्ल्ड हिप हॉप डांसिंग चैम्पियनशिप में हिस्सा लेने के लिए लास वेगास जाने का प्लान बनाता है। एक दिन उसकी नजर विष्णु (प्रभुदेवा) पर पड़ती है। सुरू चाहता है कि नया डांस ग्रुप बनाने में विष्णु उसकी मदद करे। मान-मनौव्वल के बाद विष्णु मान जाता है। ग्रुप में धर्मेश उर्फ डी (धर्मेश येलंदे) और विनोद (पुनीत पाठक) जैसे नए डांसरों की एंट्री होती है और किसी तरह से बेंगलुरु में ऑडिशन राउंड जीतने के बाद ये सभी लास वेगास पहुंच जाते हैं, लेकिन तभी विष्णु की असलियत सबके सामने आ जाती है जो यहां डांस चैम्पियनशिप जीतने के लिए आया ही नहीं था।

फिल्म के दो पहलू हैं। एक तो वो जिसमें भव्यता है, चकाचौंध है, अंतर्राष्ट्रीय स्तर का हिप हॉप डांस है, लास वेगास की चमक है, बहुत स्तर पर बड़े पैमाने पर शूट किए गए डांस सीन्स वगैरह हैं। दूसरा पहलू है फिल्म की कहानी, कलाकारों का संघर्ष, एक विश्वस्तरीय प्रतियोगिता की असलियत आदि। फिल्म पहले पहलू को जोरदार तरीके से रखने में कामयाब रही है, पर दूसरे पहलू में उतनी सहजता नहीं है। मुंबई में नालासोपारा के एक डांस ग्रुप 'फिक्टिशियस' के अपने दम पर लास वेगास में वर्ल्ड हिप हॉप डांस चैम्पियनशिप में पहुंचने की असल कहानी का चित्रण करती है यह फिल्म, लेकिन परत दर परत उनके संघर्ष और डांस सीखने में लगने वाली जी-तोड़ मेहनत को प्रभावी ढंग से सामने नहीं ला पाती। प्रभुदेवा के किरदार को बेवजह रहस्यमयी बनाया गया है।

एक डांस ग्रुप के गुरु के रूप में उनसे और काम लिया जा सकता था। इसी तरह से आलिव का किरदार जबरदस्ती ठूंसा लगता है। गीत-संगीत पहले जैसा नहीं है, लेकिन अलग है, इसलिए बुरा नहीं है और फिल्म के साथ फबता है। क्लाईमैक्स को उन्होंने पहले से अधिक प्रभावी, भव्य और असरदार बनाया है। इसमें दो राय नहीं कि इसका 3डी इफेक्ट हिंदी फिल्मों में अब तक के सबसे अच्छा इफेक्ट्स हैं। इन प्रभावों की वजह से आप शुरुआत से ही इसकी गिरफ्त में आने लगते हैं। डांस के तमाम दृश्य ऐसे हैं, जो पहले कभी नहीं देखे व न ही महसूस किए गए हैं। भव्यता में यह 'हैप्पी न्यू ईयर' से दो-चार नहीं, दस कदम आगे है। 'सुन साथियां...' और 'बेजुबान फिर से...' गीत सुनने में सबसे ज्यादा अच्छे लगते हैं। फिल्मांकन में 'चुनर...' 'हे गणराया...' और 'टैटू...' सबसे अच्छे हैं। ग्रैंड कैनन में फिल्माया गया 'टैटू...' गीत सपनों सरीखा है।

हिप हॉप गीत-संगीत और डांस की दुनिया बेहद अलग है। युवा पीढ़ी के अलावा बहुत ज्यादा लोग इसकी रिद्म और टेस्ट से परिचित शायद नहीं होंगे। इसलिए इस फिल्म में जो कुछ हो रहा है वो शायद बहुतेरे लोगों के पल्ले न पड़े, लेकिन आज एक पूरी पीढ़ी ऐसी भी है, जो इसकी दीवानी है। ये फिल्म ऐसे ही दीवानों के लिए है, जो सिर्फ और सिर्फ डांस जानते हैं, उसकी बात करना जानते हैं।  

कलाकार: वरुण धवन, श्रद्धा कपूर, प्रभुदेवा, धर्मेश येलन्दे, लॉरेन गॉटलिब, राघव जुयाल, पुनीत पाठक, सुशांत पुजारी
निर्देशन-कहानी:  रेमो डिसूजा 
निर्माता: सिद्धार्थ रॉय कपूर
संगीत:  सचिन-जिगर
संवाद:  मयूर पुरी 
पटकथा:  रेमो डिसूजा, तुषार हीरानंदानी
गीत: मयूर पुरी, प्रिया सरैया, डी. सोलदिर्ज, रिमि नीक

No comments:

Post a Comment