Saturday, 24 September 2011

फिर भीग गई आंखें मेरी….

ये पंक्तियां देश के हर उस दुश्मन
के नाम हैं जो सोच रहा है हम कमज़ोर
हैं..हम
बेबस हैं ..जो नापाक कोशिशें करता
जा रहा है..!..अब समय है किसी पर
विश्वास न
करने का..अब समय है खुद इन्साफ
करने का…!
लाहौर से आए
कुछ बादलों की बूंदों ने
आज भिगोया है.
मेरे वतन के साए में आ कर
उन्होंने अंगडाई ली है.
कुछ दूर की कहानियों ने
फिर विश्वास किया है.
रफ्तार तेज़ है तो क्या?
सुकूं का हक उन्हें भी है.
बुलंदियां दूर हैं तो क्या?
ज़मीं का हक उन्हें भी है.
ईमान अब बिक गया तो क्या?
सर उठाने का हक़ उन्हें भी है.
मर मर के जी लिए तो क्या?
दर्द में छलकना उन्हें भी है.
अफ़सोस है मुझे-औ-ताज्जुब भी
आज बादल बरसे फ़िर भी-
पतझड़ की खामोशी है.
रिम झिम बूंदों में नमीं नहीं,
बस बेरुखी की सरगोशी है.
रोक सकता तो रोक लेता उनको,
बांहों से अपनी पोंछ देता उनको,
कोहरे की धुंध जब उड़ने लगती-
सूरज की लौ दिखा देता उनको.
पर मासूम है मेरा हर एक ख्याल,
जो अमन के अवशेष है,
नज़रों में नई सेहर लिए,
नई रौशनी का संदेश ढूढता है.

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