जीवन में रूप, रस, गंध, स्पर्श और शब्द के रूप में इंसान अनेक सुखों व आनंद को भोगता है। हालांकि इस दौरान वह दु:ख, संकट यहां तक कि ऐसे कष्टों को सामना करता या दूसरों के जीवन में देखता है जो मृत्यु के समान कहे जाते हैं। लेकिन स्वाभाविक मृत्यु के समय या यूं कहें कि जब शरीर प्राण छोड़ता है तब कैसा अनुभव होता है? यह प्राणी व शरीर विशेष ही जान सकता है। जिससे हर प्राणी गुजरता है।
यही कारण है कि शास्त्रों में सुखी जीवन के लिए अहं का त्याग और अहं से दूर होने के लिए मृत्यु को याद रखना एक बेहतर उपाय बताया गया है। खासतौर पर मृत्यु के वक्त होने वाली पीड़ा हर शरीर भोगता है। जिसे हिन्दू धर्मग्रंथ गरूड़ पुराण में बताया गया है। जानते है जब तन से प्राण निकलते हैं तो क्या-क्या होता है?
मृत्यु काल का ही रूप है। मृत्यु के वक्त शरीर और प्राण अलग हो जाते हैं और यह नियत समय पर ही आती है। मृत्यु पीड़ा से प्राणी सभी कर्म भूल जाता है। सूर्य, चन्द्र, शिव, पंच तत्व, इन्द्र देवादि, प्रकृति, रज, तम, सत्व गुण सभी काल के वश में होकर प्राणी के जीवन पर अपना प्रभाव छोड़ते हैं, किंतु मृत्यु के समय यह प्रभावहीन हो जाते हैं।
यही कारण है कि मृत्यु का समय करीब आने पर शरीर में कोई रोग पैदा होता है। इन्द्रियां कमजोर या निष्क्रिय हो जाती हैं। शरीर शक्ति व तेजहीन हो जाता है। यहीं नहीं शरीर में अनेक बिच्छुओं के डंक लगने की पीड़ा जैसा अनुभव होता है। मुंह लार से भर जाता है। इसके बाद ही शरीर जड़ और विकृत रूप ले लेता है।
काल प्राणों को अपनी ओर खींचता है। जिससे प्राण कण्ठ में आते हैं और अंत में अंगुठे के आकार का माना गया प्राण पुरुष बेचैन होकर अपने निवास को देखता हुआ यमदूतों द्वारा यमलोक ले जाया जाता है।
यही कारण है कि शास्त्रों में सुखी जीवन के लिए अहं का त्याग और अहं से दूर होने के लिए मृत्यु को याद रखना एक बेहतर उपाय बताया गया है। खासतौर पर मृत्यु के वक्त होने वाली पीड़ा हर शरीर भोगता है। जिसे हिन्दू धर्मग्रंथ गरूड़ पुराण में बताया गया है। जानते है जब तन से प्राण निकलते हैं तो क्या-क्या होता है?
मृत्यु काल का ही रूप है। मृत्यु के वक्त शरीर और प्राण अलग हो जाते हैं और यह नियत समय पर ही आती है। मृत्यु पीड़ा से प्राणी सभी कर्म भूल जाता है। सूर्य, चन्द्र, शिव, पंच तत्व, इन्द्र देवादि, प्रकृति, रज, तम, सत्व गुण सभी काल के वश में होकर प्राणी के जीवन पर अपना प्रभाव छोड़ते हैं, किंतु मृत्यु के समय यह प्रभावहीन हो जाते हैं।
यही कारण है कि मृत्यु का समय करीब आने पर शरीर में कोई रोग पैदा होता है। इन्द्रियां कमजोर या निष्क्रिय हो जाती हैं। शरीर शक्ति व तेजहीन हो जाता है। यहीं नहीं शरीर में अनेक बिच्छुओं के डंक लगने की पीड़ा जैसा अनुभव होता है। मुंह लार से भर जाता है। इसके बाद ही शरीर जड़ और विकृत रूप ले लेता है।
काल प्राणों को अपनी ओर खींचता है। जिससे प्राण कण्ठ में आते हैं और अंत में अंगुठे के आकार का माना गया प्राण पुरुष बेचैन होकर अपने निवास को देखता हुआ यमदूतों द्वारा यमलोक ले जाया जाता है।

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