Sunday, 4 September 2011

 महाभारत में अब तक आपने पढ़ा....तब  मछली ने मुनि से प्रार्थना की उसने कहा मुनि- आप मुझे गंगाजी में डाल दीजिए।  उसके बाद जब उसे गंगाजी भी छोटी पढऩे लगी तो उसने मुनि से कहा - मुनि में अब यहां हिल-डुल नहीं सकती आप मुझे समुद्र में डाल दें।  उस मत्स्य ने प्रसन्न होकर मुनि से कहा आप सप्तर्षि को लेकर एक नौका में बैठ जाएं क्योंकि प्रलय आने वाला है। सभी सप्तऋषि उस नाव में बैठकर चले गए। जब मनु को सृष्ठि करने की इच्छा हुई तो उन्होंने बहुत बड़ी तपस्या करके शक्ति प्राप्त की, उसके बाद शक्ति आरंभ की अब आगे....

 इस तरह मत्स्योपाख्यान सुनने के पश्चात युधिष्ठिर ने मार्कण्डेय मुनि से कहा कि आपने तो अनेक युगों के बाद प्रलय देखा है। आप हमें सारी सृष्टी के कारण से संबंध रखने वाले हैं  मैं आपसे कथा सुनना चाहता हूं।मार्कण्डेयजी ने कहा ये जो हम लोगों के पास भगवान कृष्ण बैठे हैं ये ही समस्त सृष्टि का निर्माण और संहार करने वाले हैं। ये अनंत हैं इन्हें वेद भी नहीं जानते। जब चारों युगों की समाप्त हो जाते हैं। तब ब्रम्ह्म का एक दिन समाप्त हो जाता है। यह सारा संसार ब्रह्म के दिनभर में रहता है। दिन समाप्त होते ही संसार नष्ट हो जाता है। जब सहस्त्र युग समाप्त हो जाते हैं तब सभी मनुष्य मिथ्यावादी हो जाते हैं। ब्राह्मण शुद्रों के कर्म करते हैं। शुद्र वैश्यों की भांति धन संग्रह करने लगते हैं या क्षत्रियों के कर्म से अपनी दिनचर्या चलाने लगते हैं। शुद्र गायत्री जप को अपनाते हैं। इस तरह सब लोगों का व्यवहार विपरित हो जाता है। मनुष्य नाटे कद के होने लगते हैं। आयु, बल, वीर पराक्रम सब घटने लगता है। उनकी बात में सच का अंश बहुत कम होता है।

उस समय स्त्रियां भी नाटे कद वाली और बहुत से बच्चे पैदा करने वाली होती हैं। गांव-गांव में अन्न बिकने लगता है। ब्राह्मण वेद बेचने लगते हैं। वेश्यावृति बढऩे लगती है। वृक्षों में फल-फूल बहुत कम लगते हैं। गृहस्थ अपने ऊपर भार पढऩे पर इधर-उधर टैक्स की चोरी करने लगते हैं। मदिरा पीते हैं और गुरुपत्नी के साथ व्याभिचार करते हैं। जिनसे शरीर में मांस व रक्त बढ़े उन लौकिक कार्यों को करते हैं। स्त्रियां पति को धोखा देकर नौकरों के साथ व्याभिचार करती हैं। वीर पुरुषों की स्त्रियां भी अपने स्वामी का परित्याग करके दूसरों का आश्रय लेती हैं। इस तरह सहस्त्र युग पूरे होने लगते हैं। इसके बाद सात सूर्यों का बहुत प्रचण्ड तेज बढ़ता है।

वे सातों सूर्य नदी और समुद्र आदि जो पानी होता है उसे भी सोख लेता है। पृथ्वी का भेदन वह अग्रि रसातल तक पहुंंच जाती है। इसके बाद अशुभकारी वाय और वह अग्रि, देवता, असुर, गंधर्व, यक्ष, सर्प आदि से युक्त सशक्त विश्व को ही जलाकर भस्म कर डालते हैं। फिर आकाश में मेघों की घनघोर घटा घिर आती है। बिजली कौंधने लगती है। भयंकर गर्जना होती है। उस समय इतनी वर्षा करते रहते हैं। इससे समुद्र मर्यादा छोड़ देते हैं। पर्वत फट जाते हैं और पृथ्वी जल में डुब जाती है।

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