Saturday, 24 September 2011

समस्त पितरों को नमन

सर्वपितृ अमावस्या पितरों को विदा करने की अंतिम तिथि होती है। 15 दिन पितृ घर में विराजते हैं और हम उनकी सेवा करते हैं। सर्वपितृ अमावस्या के दिन सभी भूले-बिसरे पितरों का श्राद्ध कर उनसे आशीर्वाद की कामना की जाती है। सर्वपितृ अमावस्या के साथ ही 15 दिन का श्राद्ध पक्ष खत्म हो जाता है। आश्विन कृष्ण पक्ष की समाप्ति के बाद अगले दिन से नवरात्र प्रारंभ होते हैं। सर्वपितृ अमावस्या पर हम अपने उन सभी प्रियजनों का श्राद्घ कर सकते हैं, जिनकी मृत्यु की तिथि का ज्ञान हमें नहीं है।

भारतीय पंचांग के अनुसार तिथि महत्त्वपूर्ण होती है। यही वजह है कि श्राद्ध दिनांक के बजाय तिथि पर किया जाता है। जैसे किसी व्यक्ति की मृत्यु जिस दिनांक को हुई है उस दिन क्या तिथि थी, यह ध्यान रखा जाता है। 15 दिन में यह सभी तिथियां आती हैं, तब पंचमी, षष्ठी, सप्तमी आदि जो भी तिथि प्रियजन की होती है उस दिन, उस व्यक्ति का श्राद्ध कर्म किया जाता है। किसी कारणवश अगर प्रियजन का श्राद्ध उस तिथि पर नहीं कर सके, तो सर्वपितृ अमावस्या के दिन उनका श्राद्घ कार्य किया जा सकता है।

27 सितंबर को सर्वपितृ अमावस्या है। भारतीय ज्योतिष के अनुसार कन्या राशि में विराजमान सूर्य, शुक्र, बुध, शनि और चंद्रमा के साथ मौजूद है। इन ग्रहों के एक साथ बैठने से यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि अमावस्या को हमारे देवता और पितृ एक साथ बैठते हैं और पृथ्वी पर किए गए श्राद्घ में जो कुछ भी दान-पुण्य होता है, उसे तुरन्त स्वीकार करते हैं। वैसे भी हर महीने आने वाली अमावस्या हमारे ऋषियों ने पितृ के लिए दान-पुण्य करने के लिए ही तय कर रखी है।

किस प्रकार के ब्राह्मण श्राद्घ स्वीकार करने के योग्य हैं-
वेदों के ज्ञाता, श्रोत्रिय, मंत्र आदि का विशिष्ट ज्ञान रखने वाले ब्राह्मण श्राद्घ ग्रहण करने के योग्य माने जाते हैं। इन्हें ही भोजन कराने या दान देने से अक्षय फल की प्राप्ति होती है। भान्जे को भी भोजन कराया या दान दिया जा सकता है। मान्यता है कि एक भान्जा सौ बामन के बराबर होता है। रोगी, विकलांग, मांसाहारी, शराबी, चरित्रहीन, कुत्सित कर्म में जुटे तथा अवैष्णव को श्रद्घ में बुलाना अनुचित है। पितृ इनको श्राद्घ फल ग्रहण करते देख कष्ट पाते हैं।

पितृकार्य में तिलों का प्रयोग ही उचित माना गया है। श्राद्घ कार्य में निमंत्रित ब्राह्मणों को मौन होकर भोजन करना चाहिए। भोजन लोहे के बर्तनों में नहीं खिलाना चाहिए। श्राद्घ करने वाले को सफेद वस्त्र ही पहनना चाहिए। साथ ही बैंगन की सब्जी भोजन में नहीं होनी चाहिए। सर्वपितृ श्राद्घ अपराह्न् में ही किया जाता है। साथ ही श्राद्घ करने वाले परिवार को प्रसन्नता एवं विनम्रता के साथ भोजन परोसना चाहिए। संभव हो तो जब तक ब्राह्मण भोजन ग्रहण करें, तब तक पुरुष सूक्त तथा पवमान सूक्त आदि का जप होते रहना चाहिए। भोजन कर चुके ब्राह्मणों के उठने के पश्चात श्राद्घ करने वाले को अपने पितृ से इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिए-

दातारो नोअभिवर्धन्तां वेदा: संततिरेव च॥
श्रद्घा च नो मा व्यगमद् बहु देयं च नोअस्तिवति।

अर्थात पितृगण! हमारे परिवार में दाताओं, वेदों और संतानों की वृद्घि हो, हमारी आप में कभी भी श्रद्घा न घटे, दान देने के लिए हमारे पास बहुत संपत्ति हो।
इसी के साथ उपस्थित ब्राह्मणों की प्रदक्षिणा के साथ उन्हें दक्षिणा आदि प्रदान कर विदा करें। श्राद्घ करने वाले व्यक्ति को बचे हुए अन्न को ही भोजन के रूप में ग्रहण कर उस रात्रि ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करना चाहिए। श्राद्घ प्राप्त होने पर पितृ, श्राद्घ कार्य करने वाले परिवार में धन, संतान, भूमि, शिक्षा, आरोग्य आदि में वृद्घि प्रदान करते हैं।

मनुस्मृति, याज्ञवलक्य स्मृति जैसे धर्म ग्रंथों में ही नहीं, वरन् पुराणों आदि में भी श्राद्घ को महत्त्वपूर्ण कर्म बताते हुए उसे करने के लिए प्रेरित किया गया है। गरुड़ पुराण के अनुसार कृतिका नक्षत्र में किया गया श्राद्घ समस्त कामनाओं को पूर्ण करता है। रोहिणी में श्राद्घ होने पर संतानसुख, मृगशिरा में गुणों में वृद्घि, आद्र्रा में ऐश्वर्य, पुनर्वसु में सुंदरता, पुष्य में अतुलनीय वैभव, अश्लेषा में दीर्घायु, मघा में अच्छी सेहत, पूर्वाफाल्गुनी में अच्छा सौभाग्य, हस्त में विद्या की प्राप्ति, चित्र में प्रसिद्घ संतान, स्वाति में व्यापार में लाभ, विशाखा में वंश वृद्घि, अनुराधा में उच्च पद प्रतिष्ठा, ज्येष्ठा में उच्च अधिकार भरा दायित्व व मूल में मनुष्य आरोग्य प्राप्त करता है।

श्राद्घ कर्म आखिर पुत्र द्वारा ही क्यों?
मनुस्मृति में कहा गया है-पुं नामक नरक से त्र (त्रप) करने वाला ही पुत्र कहा जाता है। मनुष्य इसी कारण नरक से मुक्ति दिलाने वाले पुत्र की कामना करता है और पिंडदान, श्राद्घ करने का अधिकार पुत्र को ही दिया जाता है।

यही बात वशिष्ठ स्मृति में भी है-पुत्र होने पर पिता लोकों को जीत लेता है, पौत्र होने पर आनंत्य को प्राप्त करता है और प्रपौत्र होने पर सूर्य लोक में निवास करने का उसे स्वयं सूर्य देव आशीर्वाद देते हैं। लेकिन जिनके पुत्र नहीं है, उन्हें धर्मराज के अनुसार उनकी पत्नी के द्वारा श्राद्घ कर्म होने पर श्राद्ध फल मिलेगा। पत्नी न होने पर सहोदर भाई, सहोदर भाई के ना होने पर जामाता व नाती श्राद्घ करने के अधिकारी होते हैं।

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