जयपुर। हमारे घर में एक चूहा आ जाता है तो हम उत्पाद मचा देते
है। बेचैन हो जाते है और उस चूहें को भगाने के लिए हर तरकीब निकालने लगते
है। लेकिन आप जानते है कि राजस्थान में माता का एक ऐसा मंदिर है। जहां पर
सैकड़ों चूहे रहते है। और इनके रहने से कोई बदबू नहीं फैलती और न ही कोई
बीमारी।मां दुर्गा का साक्षात अवतार-करणी माता....
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राजस्थान के ऐतिहासिक नगर बीकानेर से लगभग 30 किलो मीटर दूर देशनोक में
स्थित करणी माता का मंदिर जिसे चूहों वाली माता, चूहों वाला मंदिर और मूषक
मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। इस मंदिर को लेकर मान्यता है कि मां
दुर्गा का साक्षात अवतार-करणी माता है।
- वैसे तो चूहों को प्लेग जैसी कई भयानक बीमारियों का कारण माना जाता है। लेकिन यहां आने वाले भक्तों को चूहों का जूठा किया हुआ प्रसाद ही मिलता है।
-आश्चर्य की बात यह है की इतने चूहे होने के बाद भी मंदिर में बिल्कुल भी बदबू नहीं है, आज तक कोई भी बीमारी नहीं फैली है यहां तक की चूहों का जूठा प्रसाद खाने से कोई भी भक्त बीमार नहीं हुआ है।
- वैसे तो चूहों को प्लेग जैसी कई भयानक बीमारियों का कारण माना जाता है। लेकिन यहां आने वाले भक्तों को चूहों का जूठा किया हुआ प्रसाद ही मिलता है।
-आश्चर्य की बात यह है की इतने चूहे होने के बाद भी मंदिर में बिल्कुल भी बदबू नहीं है, आज तक कोई भी बीमारी नहीं फैली है यहां तक की चूहों का जूठा प्रसाद खाने से कोई भी भक्त बीमार नहीं हुआ है।
ऐसे हुआ था माता का अवतार
- करणी माता, जिन्हें भक्त माँ जगदम्बा का अवतार मानते है, का जन्म 1387 में एक चारण परिवार में हुआ था। उनका बचपन का नाम रघुबाई था।
- रघुबाई की शादी साठिका गांव के किपोजी चारण से हुई थी लेकिन शादी के कुछ समय बाद ही उनका मन सांसारिक जीवन से ऊब गया इसलिए उन्होंने किपोजी चारण की शादी अपनी छोटी बहन गुलाब से करवाकर खुद को माता की भक्ति और लोगों की सेवा में लगा दिया।
- जनकल्याण, अलौकिक कार्य और चमत्कारिक शक्तियों के कारण रघु बाई को करणी माता के नाम से स्थानीय लोग पूजने लगे। वर्तमान में जहां यह मंदिर स्थित है वहां पर एक गुफा में करणी माता अपनी इष्ट देवी की पूजा किया करती थीं।
- यह गुफा आज भी मंदिर परिसर में स्थित है। कहते हैं कि करणी माता 151 वर्ष जिन्दा रहकर 23 मार्च 1538 को ज्योतिर्लिंग हुई थी। उनके ज्योतिर्लिंग होने के पश्चात भक्तों ने उनकी मूर्ति की स्थापना करके उनकी पूजा शुरू कर दी जो की तब से अब तक निरंतर जारी है।
- करणी माता, जिन्हें भक्त माँ जगदम्बा का अवतार मानते है, का जन्म 1387 में एक चारण परिवार में हुआ था। उनका बचपन का नाम रघुबाई था।
- रघुबाई की शादी साठिका गांव के किपोजी चारण से हुई थी लेकिन शादी के कुछ समय बाद ही उनका मन सांसारिक जीवन से ऊब गया इसलिए उन्होंने किपोजी चारण की शादी अपनी छोटी बहन गुलाब से करवाकर खुद को माता की भक्ति और लोगों की सेवा में लगा दिया।
- जनकल्याण, अलौकिक कार्य और चमत्कारिक शक्तियों के कारण रघु बाई को करणी माता के नाम से स्थानीय लोग पूजने लगे। वर्तमान में जहां यह मंदिर स्थित है वहां पर एक गुफा में करणी माता अपनी इष्ट देवी की पूजा किया करती थीं।
- यह गुफा आज भी मंदिर परिसर में स्थित है। कहते हैं कि करणी माता 151 वर्ष जिन्दा रहकर 23 मार्च 1538 को ज्योतिर्लिंग हुई थी। उनके ज्योतिर्लिंग होने के पश्चात भक्तों ने उनकी मूर्ति की स्थापना करके उनकी पूजा शुरू कर दी जो की तब से अब तक निरंतर जारी है।
मंदिर में हर जगह नजर आते हैं चूहे
-यदि हम चूहों की बात करे तो मंदिर के अंदर चूहों का राज है। मंदिर के अंदर प्रवेश करते ही हर जगह चूहे ही चूहे नजर आते है। चूहों की अधिकता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है की मंदिर के अंदर मुख्य प्रतिमा तक पहुंचने के लिए आपको अपने पैर घसीटते हुए जाना पड़ता है।
- क्योंकि यदि आप पैर उठाकर रखते है तो उसके नीचे आकर चूहे घायल हो सकते है जो की अशुभ माना जाता है। इस मंदिर में करीब बीस हजार काले चूहों के साथ कुछ सफ़ेद चूहे भी रहते है। इन चूहों को ज्यादा पवित्र माना जाता हैं। मान्यता है की यदि आपको सफ़ेद चूहा दिखाई दे गया तो आपकी मनोकामना अवश्य पूर्ण होगी।
- करणी माता मंदिर में रहने वाले चूहे मां की संतान माने जाते है करणी माता की कथा के अनुसार एक बार करणी माता का सौतेला पुत्र (उसकी बहन गुलाब और उसके पति का पुत्र) लक्ष्मण, कोलायत में स्थित कपिल सरोवर में पानी पीने की कोशिश में डूब कर मर गया।
- जब करणी माता को यह पता चला तो उन्होंने, मृत्यु के देवता यम को उसे पुनः जीवित करने की प्रार्थना की। पहले तो यमराज ने मना किया पर बाद में उन्होंने विवश होकर उसे चूहे के रूप में पुनर्जीवित कर दिया।
-यदि हम चूहों की बात करे तो मंदिर के अंदर चूहों का राज है। मंदिर के अंदर प्रवेश करते ही हर जगह चूहे ही चूहे नजर आते है। चूहों की अधिकता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है की मंदिर के अंदर मुख्य प्रतिमा तक पहुंचने के लिए आपको अपने पैर घसीटते हुए जाना पड़ता है।
- क्योंकि यदि आप पैर उठाकर रखते है तो उसके नीचे आकर चूहे घायल हो सकते है जो की अशुभ माना जाता है। इस मंदिर में करीब बीस हजार काले चूहों के साथ कुछ सफ़ेद चूहे भी रहते है। इन चूहों को ज्यादा पवित्र माना जाता हैं। मान्यता है की यदि आपको सफ़ेद चूहा दिखाई दे गया तो आपकी मनोकामना अवश्य पूर्ण होगी।
- करणी माता मंदिर में रहने वाले चूहे मां की संतान माने जाते है करणी माता की कथा के अनुसार एक बार करणी माता का सौतेला पुत्र (उसकी बहन गुलाब और उसके पति का पुत्र) लक्ष्मण, कोलायत में स्थित कपिल सरोवर में पानी पीने की कोशिश में डूब कर मर गया।
- जब करणी माता को यह पता चला तो उन्होंने, मृत्यु के देवता यम को उसे पुनः जीवित करने की प्रार्थना की। पहले तो यमराज ने मना किया पर बाद में उन्होंने विवश होकर उसे चूहे के रूप में पुनर्जीवित कर दिया।
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