Saturday, 5 September 2015

इंद्राणी ने खुलवा रखे थे कई सीक्रेट बैंक अकाउंट्स, पीटर ने कहा- रिश्ता खत्म

मुंबई. शीना मर्डर केस में अब रिश्ते भी टूटने लगे हैं। सूत्रों के मुताबिक स्टार इंडिया के पूर्व सीईओ पीटर मुखर्जी ने शुक्रवार को पूछताछ के दौरान पुलिस से कहा कि उनका अब इंद्राणी मुखर्जी से रिश्ता खत्म हो चुका है। पीटर के साथ उनका सीए भी पुलिस स्टेशन आया था।
कत्ल करने वाली पत्नी से नहीं रखना रिश्ता
सूत्रों के मुताबिक पीटर ने पुलिस से पूछताछ के दौरान कहा, “जहां तक मेरा सवाल है, मेरा अब इंद्राणी से कोई रिश्ता नहीं रहा। मैं ऐसी पत्नी से कोई रिश्ता नहीं रखना चाहता जिसने मर्डर की बात कबूल कर ली हो।”
लगातार तीसरे दिन 12 घंटे तक चली पूछताछ के दौरान पुलिस ने जब पीटर को यह बताया कि इंद्राणी के कुछ सीक्रेट बैंक अकाउंट्स थे तो पीटर हैरान रह गए। पीटर ने कहा कि उन्हें इन अकाउंट्स के बारे में जानकारी नहीं है। पूछताछ से जुड़े एक पुलिस अफसर ने कहा कि जैसे ही पुलिस ने इंद्राणी के सीक्रेट अकाउंट की बात पीटर को बताई तो उन्होंने कहा कि वह ये सब जानकर हैरान हैं और यह इंद्राणी से मेरे रिश्तों के ताबूत में आखिरी कील की तरह है।
दिल्ली, मुंबई और विदेशों में हैं अकाउंट
पुलिस के मुताबिक इंद्राणी के सीक्रेट अकाउंट्स दिल्ली, मुंबई के अलावा ब्रिटेन, सिंगापुर, स्पेन और लग्जमबर्ग में भी हैं। दिल्ली और मुंबई के जिन बैंकों में इंद्राणी के सीक्रेट अकाउंट्स मिले हैं, उन्हीं बैंकों में दोनों के ज्वॉइंट अकाउंट भी हैं। एक पुलिस अफसर ने ये भी कहा कि जांच अभी जारी है और हमने पीटर को कोई क्लीन चिट नहीं दी है। हालांकि अपने लाइफ पाटर्नर को बताए बिना बैंक अकाउंट रखना कोई गैरकानूनी नहीं है और न ही विदेशी बैंकों में खाता खोलना गैर कानूनी है। लेकिन विदेशी बैंकों में अकाउंट खोलने से पहले कुछ कानूनी फॉमर्लेटीज पूरी करना जरूरी हैं। (ये भी पढ़ें- शीना की लाश का मेकअप कर रायगढ़ ले गई थी इंद्राणी, ड्राइवर को दिए एक लाख रुपए)
विधि से मांगा लैपटॉप
शुक्रवार दोपहर को इंद्राणी-संजीव की बेटी विधि और पीटर मुखर्जी के भाई गौतम को खार पुलिस बुलाकर पूछताछ की गई। सूत्रों के मुताबिक, विधि ने पुलिस को बताया कि उसके पास शीना द्वारा अमेरिका से भेजे गए ई-मेल्स हैं। पुलिस ने विधि का लैपटॉप जांच के लिए साइबर ब्रांच को भेज दिया है। शुक्रवार को पुलिस ने एक बार फिर इंद्राणी से तीन लोगों-पीटर मुखर्जी, संजीव खन्ना और सिद्धार्थ दास के सामने पूछताछ की।

OROP के कॉन्सेप्ट को सरकार की मंजूरी, रक्षा मंत्री थोड़ी देर में कर सकते हैं बड़ा एलान

नई दिल्ली. मोदी सरकार अब से कुछ देर बाद वन रैंक वन पेंशन योजना लागू करने का एलान कर सकती है। इसके लिए सरकार लगभग सारी तैयारियां कर चुकी हैं। रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने थोेड़ी देर बाद एक प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई है। इससे पहले रक्षामंत्री मनोहर पर्रिकर बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह से मिलने उनके घर पहुंचे। इस दौरान बीजेपी के प्रवक्ता भी शामिल हुए। शनिवार को ही रक्षा मंत्री पूर्व सैनिकों के डेलिगेशन से मिले। उनसे कहा कि सरकार ने ओआरओपी के कॉन्सेप्ट को मंजूरी दे दी है। मेजर जनरल (रियायर्ड) सतबीर सिंह ने जंतर मंतर पर वन रैंक वन पेंशन की मांग को लेकर धरना दे रहे पूर्व सैनिकों को संबोधित करते हुए कहा, 'सरकार ने कॉन्सेप्ट के रूप में मोटे तौर पर हमारी मांग मान ली है।'
पीएम ने नहीं दिया वक्त?
मुलाकात के बाद पूर्व सैनिकों के प्रवक्ता ने कहा, ''रक्षा मंत्री ने ओआरओपी के कॉन्सेप्ट को मंजूरी दी है। हालांकि, इस मुद्दे पर उनका बयान आने के बाद ही हम अनशन खत्म करने को लेकर कोई फैसला लेंगे।'' रक्षामंत्री से मुलाकात के लिए जाने के पहले पूर्व सैनिकों ने कहा कि अगर इस मुद्दे पर फैसले से पहले सरकार ने उन्हें भरोसे में नहीं लिया तो वह OROP को नहीं मानेंगे। उधर, पूर्व सैनिकों ने दावा किया है कि उन्होंने पीएम नरेंद्र मोदी से पांच बार मिलने का समय मांगा, लेकिन उनकी तरफ से कोई रिस्पॉन्स नहीं आया। पूर्व सैनिकों के मुताबिक, उन्होंने पीएम के प्रिंसिपल सेक्रेट्री नृपेंद्र मिश्रा के साथ दो मीटिंग की, लेकिन इनका कोई नतीजा नहीं निकल सका। बता दें कि योजना लागू करने की मांग को लेकर कई पूर्व सैनिक जंतर-मंतर पर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठे हैं।
मसौदा तैयार, पूर्व सैनिकों का आंदोलन जारी
कुछ मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, सरकार ने इसके लिए मसौदा तैयार कर लिया है। सूत्रों के मुताबिक, सरकार के ड्राफ्ट में हर पांच साल में पेंशन की समीक्षा की बात है, लेकिन पूर्व सैनिकों का कहना है कि ये ड्राफ्ट एकतरफ़ा है और इसमें पूर्व सैनिकों की सहमति नहीं है। बता दें कि इस योजना को लागू करने के बाद सरकार पर दस हजार करोड़ रुपए का अतिरिक्त खर्च आएगा।

समीक्षा को लेकर फंसा पेंच
पूर्व सैनिकों का कहना है कि सरकार एक साल में पेंशन की समीक्षा को तैयार नहीं है, लेकिन अगर ऐसा नहीं होगा तो ये वन रैंक-वन पेंशन नहीं होगा। हालांकि, उन्होंने कहा कि वो दो साल में समीक्षा किए जाने के लिए तैयार हैं, लेकिन तीन साल या पांच साल पर मानने का कोई सवाल ही नहीं है। पूर्व सैनिकों ने कहा कि सरकार का कहना है कि थोड़े पैसे बचाने हैं। इसलिए अगर वो वन रैंक-वन पेंशन को एक जून 2014 से लागू करती है तो भी उन्हें एतराज़ नहीं होगा।

तुर्की के समुद्र के किनारे दुनिया को जगा सीरिया में दफन हुआ 3 साल का एलन

कोबानी (सीरिया): पूरी दुनिया का ध्यान रिफ्यूजियों की समस्या की ओर खींचने वाले तीन साल के सीरियाई बच्चे एलन कुर्दी को उसकी जमीन पर शुक्रवार को दफना दिया गया। आईएसआईएस के आतंक से डरा एलन का परिवार नाव से तुर्की पहुंचने की कोशिश कर रहा था। नाव पलट गई और एलन, उसके पांच साल के भाई गालिप कुर्दी और मां रेहाना की पानी में डूबकर मौत हो गई। तुर्की के समुद्र तट पर एलन की डेड बॉडी की फोटो सामने आने के बाद इस वक्त पूरी दुनिया का ध्यान शरणार्थियों की समस्या की ओर खिंचा है।
एलन के पिता अब्दुल अपने बेटे की लाश के साथ शुक्रवार को सीरियाई शहर कोबान पहुंचे। आईएसआईएस और कुर्दिश विद्रोहियों के बीच जंग की वजह से पूरा शहर तबाह हो चुका है। तीन महीने पहले ही अब्दुल के परिवार के 11 लोगों को आईएसआईएस के आतंकियों ने मार डाला था। इसी शहर के कब्रिस्तान में एलन, उसकी मां और भाई को दफनाया गया। दफनाए जाते वक्त एलन के परिवार के अलावा शहर के काफी लोग भी वहां पहुंचे थे। अब्दुल्ला का कहना है कि वह अब सीरिया छोड़कर कहीं नहीं जाएंगे। अब्दुल्ला के चाचा ने कहा कि वह सिर्फ अपने परिवार की वजह से यह शहर छोड़ना चाहते थे।
क्या कर रही हैं यूरोपीय सरकारें
>यूएन रिफ्यूजी चीफ एंटोनियो ग्यूटेरेस ने शुक्रवार को यूरोपीय देशों से अपील की कि वे करीब दो लाख रिफ्यूजियों को मैसिव रिलोकेशन प्रोग्राम के तहत अपने यहां शरण दें।
>यूरोपियन यूनियन ने 16 सितंबर को होने वाली मीटिंग में इस संकट से निकलने के रास्ते पर विचार करने का फैसला किया है।
>ब्रिटेन के पीएम ने कहा कि वे 'हजारों' रिफ्यूजियों को अपनाने को तैयार हैं। उन्होंने शरण दिए जाने को लेकर देश के कानून की समीक्षा के आदेश दे दिए हैं। बच्चे की मौत के बाद ब्रिटेन के पीएम आलोचकों के निशाने पर हैं। उनका कहना है कि कैमरन देश को शर्मिंदा कर रहे हैं।
क्या है समस्या?
फिलहाल, इस मुद्दे पर सभी देशों की एक राय नहीं बन पाई है। कोटा सिस्टम रिजेक्ट किया जा चुका है। यूरोपीय देशों में आपस में ही मतभेद सामने आ रहे हैं। इसकी वजह यह है कि कुछ देश इस संकट से ज्यादा प्रभावित हैं। इनके यहां बहुत ज्यादा रिफ्यूजी पहुंच रहे हैं, इसलिए इन पर रिफ्यूजियों के साथ सख्ती करने का दबाव बन रहा है। हंगरी ने सर्बिया के बॉर्डर पर 175 किमी लंबी बाड़ लगाई है। वहीं, ब्रिटेन ने जनवरी 2014 के बाद से महज 216 सीरियाई रिफ्यूजियों को अपनाया है। तुर्की ने 20 लाख रिफ्यूजियों को अपनाया है। वहीं, पूरे यूरोप ने बीते चार साल में महज दो लाख लोगों को शरण दी। तुर्की के प्रेसिडेंट ने तो यहां तक कह दिया कि 28 देश मिलकर यह डिस्कस कर रहे हैं कि 28 हजार रिफ्यूजियों को आपस में कैसे बांटे।
जानें पूरी समस्या के बारे में...
>क्या है यूरोपियन माइग्रेशन संकट
इस साल जुलाई तक 4 लाख 38 हजार लोग यूरोपीय देशों में शरण मांग चुके हैं। बीते साल ही 5 लाख 71 हजार लोग यूरोप में शरण ले चुके हैं। रिफ्यूजियों की यह बढ़ती तादाद यूरोपीय देशों के लिए संकट का सबब बन गई है। खास तौर पर शेंगेन देशों में। शेंगेन एरिया के अंतर्गत कुल 26 यूरापीय देश आते हैं, जिन्होंने कॉमन बॉर्डर पर पासपोर्ट और दूसरे किस्म के बॉर्डर कंट्रोल हटा लिए हैं। कॉमन वीजा पॉलिसी के तहत यह पूरा इलाका एक देश की तरह काम करता है। यहां लोगों की आवाजाही पर पाबंदी नहीं है। यूरोपीय देशों में शरण लेने की कोशिश करने वाले लोग अधिकतर भूमध्य सागर के जरिए वहां पहुंचने की कोशिश करते हैं। जिन देशों में ये जाते हैं, वहां इनके लिए खाना, छत और हेल्थ सर्विसेस मुहैया कराने में सरकार को दिक्कतें आती हैं।
>कहां से आ रहे रिफ्यूजी और क्यों
पश्चिमी एशिया और नॉर्थ अफ्रीका के जंग से प्रभावित इलाके। इसके अलावा, गरीब यूरोपीय देशों से।
अधिकतर लोग सीरिया और लीबिया से पहुंच रहे हैं, जहां बीते चार साल से गृहयुद्ध छिड़ा हुआ है। यहां आईएसआईएस ने लोगों का जीना मुहाल कर रखा है। इसके अलावा अफगानिस्तान, इराक और नाइजीरिया से भी लोग गरीबी और जंग से परेशान होकर यूरोप जाना चाहते हैं। यूरोप से आने वाले रिफ्यूजियों की बात करें तो वे कोसोवो और सर्बिया जैसे देशों से हैं।
>कैसे पहुंचते हैं यूरोप?
इस साल ग्रीस के बॉर्डर पर सबसे ज्यादा रिफ्यूजी शरण लेने पहुंचे। इनमें से अधिकतर सीरिया के लोग थे, जो तुर्की तक बोट्स में सवार होकर पहुंचे। छोटी-छोटी नावों में बैठकर ये ट्यूनीशिया या लीबिया से इटली पहुंचने की कोशिश करते हैं। क्षमता से ज्यादा लोगों के इन नावों पर सवार होने की वजह से कई बार बड़े हादसे भी हुए। कुछ नाव लीबिया तट तक पहुंचने से पहले ही डूब गए। चंद लालची लोग इन लोगों की जान की परवाह न करते हुए इन्हें रबर के बने बोट्स में यूरोप भेजने की कोशिश करते हैं और बदले में लाखों कमाते हैं। ये बोट्स पानी पर तैरते ताबूत बनकर रह गए हैं। अब तक 3200 से ज्यादा लोगों की इस कोशिश में मौत हो चुकी है।

कैंसर से अकेले लड़े आदेश: 12-12 लाख के लगे इंजेक्शन, बेचनी पड़ी थी हमर

मुंबई: पांच साल से कैंसर से लड़ रहे म्यूजिक कंपोजर आदेश श्रीवास्तव की शुक्रवार रात मौत हो गई। आदेश को मल्टीपल मायेलोमा (प्लाज्मा सेल्स का कैंसर) था। करीब डेढ़ महीने पहले तीसरी बार कैंसर के लक्षण उभरने के बाद उन्हें कोकिलाबेन अस्पताल में भर्ती कराया गया था। इस बीमारी की वजह से उनकी माली हालत बेहद खराब हो गई थी। इतनी कि उन्हें अपनी कई करोड़ रुपए कीमत वाली हमर बेचनी पड़ी। उनकी पत्नी ने भी एक इंटरव्यू में बताया था कि मौत से पहले एक लाइफ सेविंग इंजेक्शन लगवाने में 12 लाख रुपए का खर्च आ रहा था। हालांकि, विजयेता के भाई ललित पंडित ने कुछ दिन पहले कहा था, ''हमने कभी किसी से पैसा नहीं मांगा है और न ही हमें पैसा चाहिए। हमें लोगों की दुआओं की जरूरत है।''
लोगों ने किया नजरअंदाज, लेकिन अकेले ही लड़े
आदेश को कैंसर होने के बारे में पहली बार 2010 में पता चला था। इसके बाद, फिल्म इंडस्ट्री ने उनको नजरअंदाज करना शुरू कर दिया। आदेश ने इंटरव्यू में कहा था, ''बीमार होना बेहद दर्दनाक है, लेकिन जिन लोगों के साथ मैंने सालों काम किया, उन्होंने जब मुझे नजरअंदाज करना शुरू किया तो इससे ज्यादा चोट पहुंची। कोई मुझसे मिलने नहीं आया।'' हालांकि, आदेश ने अकेले ही इस बीमारी से लड़ने का फैसला किया। 2010 में उन्होंने फिल्म 'राजनीति' में म्यूजिक दिया। इस फिल्म के मशहूर गाने 'मोरा पिया मोहसे बोलत नाही' को उन्होंने आवाज भी दी।
ऐसे बिगड़ी थी हालत
आदेश श्रीवास्तव अमेरिका से इलाज कराकर लौटे थे। करीब डेढ़ महीने पहले अचानक उनके नाक से खून बहने लगा। खून नहीं रुकने पर पत्नी ने उन्हें कोकिलाबेन हॉस्पिटल में एडमिट कराया था। डॉक्‍टरों की कोशिश कारगर नहीं रही। कीमोथेरेपी ने असर दिखाना बंद कर दिया। इसके बाद कीमोथेरेपी रोक दी गई थी।
रामदेव ने की थी मदद
आदेश ने एक इंटरव्यू में कहा था, 'मैं पूरी रात सो नहीं पाता था। ऐसा लगता था कि मानों पैरों में कोई सुइयां चुभो रहा है। दवाइयां तक काम नहीं कर रही थीं। स्टेम सेल ट्रांसप्लांट के दो दिन बाद जब मैं वॉशरूम में गया तो शीशे में खुद को पहचान नहीं पाया। मेरे बाल गिर चुके थे और रंग गहरा हो गया था। मैं डिप्रेशन में चला गया। इसके बाद मेरी तबीयत और बिगड़ गई।'' एक अन्य इंटरव्यू में आदेश ने बताया था कि रामदेव ने उनको योग के जरिए कीमोथेरेपी के दर्दनाक असर से निजात पाने में मदद की थी।
लाइफस्टाइल बदला, लेकिन नहीं हुआ फायदा
एक मैगजीन से बातचीत में आदेश ने बताया था कि कैंसर का पता चलने के बाद उन्होंने अपनी लाइफस्टाइल में काफी बदलाव किए थे। उन्होंने शराब और सिगरेट छोड़ दिया था। वह जल्दी सो जाते थे और वक्त पर उठते थे। अपनी मसल्स को मजबूत रखने के लिए वे योग करते थे।
ड्रम सीखने गए थे मुंबई, 1982 में मिला था पहला मौका
4 सितंबर, 1966 को जबलपुर (मध्‍य प्रदेश) में जन्मे आदेश श्रीवास्तव को म्यूजिक में बेहद दिलचस्पी थी। वह शुरुआती दिनों में जबलपुर की ऑर्केस्‍ट्रा टीम में ड्रम बजाते थे और बाद में ड्रम सीखने के लिए ही मुंबई गए थे। (पढ़ें- आदेश श्रीवास्‍तव के परिवार और जबलपुर कनेक्‍शन के बारे में)
1982 में लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल की जोड़ी के पास ड्रमर नहीं था। आदेश को एक गाने की रिकॉर्डिंग के लिए बुलाया गया और इस तरह उन्हें पहला मौका मिला।
...ऐसे मिली थी पहली फिल्‍म
एक इंटरव्यू में आदेश ने कहा था, ''जैकी श्राफ मेरा अच्छा दोस्त था। 'हीरो' फिल्म की शूटिंग के दौरान उसने ही सुधाकर बोकाड़िया से मिलवाया। इस तरह मुझे पहली फिल्म मिली। पहला गाना लता जी ने गाया। लेकिन फिल्म रिलीज ही नहीं हुई।'' (देखें आदेश श्रीवास्‍तव के कुछ RARE PHOTOS)
आदेश से जुड़ी कुछ और अहम बातें
> आदेश और विजयेता के दो बेटे अनिवेश और अवितेश हैं। विजयेता म्यूजिक कंपोजर जतिन-ललित की बहन हैं।
>आदेश ने 100 से ज्यादा फिल्मों में म्‍यूजिक दिया। 1994 में 'आओ प्यार करें' फिल्म में म्यूजिक डायरेक्टर के तौर पर बॉलीवुड में कदम रखा।
>मशहूर टीवी शो 'सा रे गा मा पा' में वे जज के तौर पर भी नजर आए थे।
>बतौर म्यूजिक डायरेक्टर उनकी आखिरी फिल्म 'वेलकम बैक' थी, जो शुक्रवार (4 सितंबर) को ही रिलीज हुई थी। शुक्रवार को ही उनका जन्मदिन था।
आदेश के कंपोज किए गए कुछ मशहूर गाने
>हाथों में आ गया जो कल रूमाल आपका (1994 आओ प्यार करें)

>क्या अदा क्या जलवे तेरे पारो (1996 शस्त्र)

>सोणा-सोणा (1998 मेजर साब)

>धन्नो की आंख (1999 लाल बादशाह)

>किसका चेहरा (2000 तरकीब)

>ये हवाएं (2001 ये हवाएं जुल्फों में तेरी)

>से शावा-शावा (2001 कभी खुशी कभी गम)

>चली-चली (2003 बागवान)
>उन्होंने कुछ गाने भी गाए। मसलन-गोरी नाल इश्क मिठा, गुस्ताखियां, शावा-शावा, सोना-सोना।
कैंसर की जंग जीतने वाले कुछ सेलिब्रिटीज
>युवराज सिंह
>लीजा रे
>मनीषा कोइराला
>अनुराग बासु
>मुमताज

11 दिन में 10 आतंकियों को खत्म कर शहीद हुआ कमांडो, अाखिरी सफर में सैकड़ों जुटे

श्रीनगर: आतंकियों से मोर्चा लेते हुए सेना के स्पेशल फोर्सेज के कमांडो लांस नायक मोहन नाथ गोस्वामी गुरुवार को शहीद हो गए थे।गोस्वामी ने 11 दिन के भीतर 10 आतंकियों को मार गिराया, बल्कि सज्जाद नाम के आतंकी को जिंदा पकड़ने में मदद की। रक्षा मंत्रालय की ओर से भी बयान जारी करके उनकी तारीफ की गई है। इसमें कहा गया, लांस नायक मोहन गोस्वामी ने जान देने से पहले 11 दिन में 10 आतंकियों का खात्मा करके इतिहास रच दिया। उधर, नैनीताल के लालकुआं में शनिवार को मोहन गोस्वामी की शवयात्रा निकाली गई। इसमें सैकड़ों लोग शामिल हुए। लोगों ने पाकिस्तान विरोधी नारे भी लगाए।
उधमपुर में डिफेंस स्पोक्सपर्सन कर्नल एसडी गोस्वामी ने कहा, ''मोहन नाथ गोस्वामी कश्मीर घाटी में बीते 11 दिनों में हुए तीन आतंक विरोधी ऑपरेशंस में सक्रिय तौर पर शामिल थे। इसमें 10 आतंकियों को खत्म किया गया, जबकि एक को जिंदा पकड़ने में कामयाबी मिली।'' बता दें कि गोस्वामी उत्तराखंड के हल्द्वानी के इंदिरा नगर गांव के रहने वाले थे। उनके परिवार में पत्नी और सात साल की बेटी है।
ऐसे दिया मिशन को अंजाम
>पहला ऑपरेशन 23 अगस्त को हंदवाड़ा में। यहां लश्कर के तीन आतंकी मारे गए।
>दूसरा ऑपरेशन 26 और 27 अगस्त को रफियाबाद में। यहां भी तीन आतंकी मारे गए, जबकि सज्जाद को पकड़ने में कामयाबी मिली।
>तीसरा ऑपरेशन बुधवार देर रात कुपवाड़ा के हफरुदा के जंगलों में। चार आतंकी मारे गए, लेकिन यह उनका आखिरी मिशन साबित हुआ।
2002 में पैराकमांडोज यूनिट में हुए थे शामिल
स्पोक्सपर्सन के मुताबिक, गोस्वामी ने 2002 में सेना के पैराकमांडोज यूनिट में जाने की पहल की थी। कुछ ही दिनों में उन्होंने अपनी यूनिट के सबसे टफ कमांडो होने का रुतबा हासिल किया। गोस्वामी ने अपनी यूनिट की सभी ऑपरेशंस में शामिल होने में दिलचस्पी दिखाई। वह कई कामयाब एंटी टेररिस्ट ऑपरेशन का हिस्सा रहे।

बोधि वृक्ष के नीचे बैठकर नमो ने लगाया ध्यान, यहीं बुद्ध को मिला था ज्ञान

गया/पटना. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शनिवार को बोधगया पहुंचे। नमो ने बोधि वृक्ष ने नीचे बैठकर ध्यान लगाया, इसी जगह पर बैठकर भगवान बुद्ध ने ध्यान लगाया था और उन्हें ज्ञान की प्राप्ती हुई थी। मोदी ने यहां बोधिवृक्ष के नीचे दीप जलाया और मेडिटेशन सेशन में हिस्सा लिया। इसके बाद उन्होंने यहां हो रहे अंतरराष्ट्रीय हिंदू-बौद्ध सम्मेलन को संबोधित किया। मोदी ने कहा, ''कुछ कट्टर लोग जबरन अपनी विचारधारा थोपते हैं। इससे अशांति फैलती है। हिंदू-बौद्ध समाज टकराव का पक्षधर नहीं है। दोनों शांति के रास्ते पर चलने की नसीहत देते हैं। ये दोनों दुनिया में शांति और सद्भाव का दर्शन फैलाते हैं।''
मोदी के साथ गृहराज्य मंत्री किरण रिजिजू भी मौजूद रहे। इस बार पीएम को रिसीव करने सीएम नीतीश कुमार नहीं आए।
क्या कहा मोदी ने
बोधगया मानवता की सेवा की भूमि है। यहां आकर बहुत खुशी हो रही है। नेहरू और वाजपेयी के बाद यहां आया हूं। शिक्षक दिवस और जन्माष्टमी के दिन हुआ यह आयोजन और ज्यादा अहम हो गया है।
आज हम भारत के सबसे बड़े टीचर डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्मदिन मना रहे हैं। आज कृष्ण जन्माष्टमी भी है। भगवान कृष्ण और गौतम बुद्ध महान टीचर थे।
कृष्ण और बुद्ध, दोनों ने सिद्धांतों को अहमियत दी। श्रीकृष्ण ने कर्मयोग और समानता सिखाई। बुद्ध ने इसे दुनिया में फैलाया। भगवान कृष्ण और गौतम बुद्ध, दोनों ने दुनिया को बहुत कुछ दिया है।
कुछ कट्टर लोग जबरन अपनी विचारधारा थोपते हैं। इससे अशांति फैलती है। हिंदू-बौद्ध समाज टकराव का पक्षधर नहीं है। दोनों शांति के रास्ते पर चलने की नसीहत देते हैं। ये दोनों दुनिया में शांति और सद्भाव का दर्शन फैलाते हैं।
दुनिया आज बुद्ध की ओर देख रही है। पर्यावरण की समस्या को गौतम बुद्ध की शिक्षा से दूर नहीं किया जा सकता है। झगड़े मिटाने के लिए बुद्ध का ही सहारा है। हिंदू धर्म पर बुद्ध का असर है। बुद्ध धर्म से ऊपर मानवता को मानते थे। भारत में सेक्युलर ढांचा डेवलप करने में बुद्ध की भूमिका रही है। हम बोधगया को दुनिया में बौद्ध लोगों की आध्यात्मिक राजधानी बनाना चाहते हैं।
इससे पहले राज्यपाल रामनाथ कोविंद के साथ सरकार के मंत्री श्याम रजक ने एयर पोर्ट पर पीएम की आगवानी की। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पीएम के स्वागत के लिए नहीं गए, अपनी जगह उन्होंने बिहार सरकार के मंत्री को भेजा। भाजपा नेता सुशील मोदी और नंदकिशोर यादव भी प्रधानमंत्री का स्वागत किया।

वन रैंक-वन पेंशन: रक्षा मंत्री की प्रेस कॉन्‍फ्रेंस थोड़ी देर में, सेना प्रमुख भी रहेंगे मौजूद

नई दिल्‍ली: पूर्व सैनिकों की लंबित मांग वन रैंक-वन पेंशन का ऐलान रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर दोपहर तीन बजे प्रेस कॉन्‍फ्रेंस में करेंगे। बीजेपी महासचिव राम माधव ने यह जानकारी दी। इस प्रेस कॉन्‍फ्रेंस में सेना प्रमुख भी शामिल रहेंगे।

वन रैंक-वन पेंशन योजना का ऐलान किए जाने से पहले पूर्व सैनिकों ने रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर से मुलाकात भी की। रक्षा मंत्री से मिलने के बाद मेजर जनरल (सेवानिवृत्त) सतबीर सिंह ने बताया कि उनकी रक्षा मंत्री के साथ अच्छे वातावरण में बैठक हुई। बताया कि वन रैंक, वन पेंशन कॉन्सेप्ट को सरकार ने मंज़ूर किया है। सरकार मोटे तौर पर पूर्व सैनिकों की बातों से सहमत हो गई है। वीआरएस वालों को भी फ़ायदा मिलेगा। बाकी आज सरकार की तरफ से वन रैंक-वन पेंशन पर बयान आने के बाद वे अपना रूख साफ करेंगे।

उधर, पूर्व सैनिकों के प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात करने के बाद रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर बीजेपी अध्‍यक्ष अमित शाह से मिलने उनके आवास पहुंचे।

रक्षा मंत्री से मुलाकात से पूर्व जंतर-मंतर पर एक प्रेस कॉन्‍फ्रेंस कर पूर्व सैनिकों ने साफ कह दिया कि वह वीआरएस लेने वालों, फैमिली पेंशनरों और विकलांग पेंशनरों के मामले में कोई समझौता नहीं करेंगे। उन्‍होंने स्‍पष्‍ट कहा, अगर सरकार की पेंशन योजना का खाका उनके मुद्दों से नहीं मिला तो वे इसे नहीं मानेंगे।

पूर्व सैनिकों ने आगे कहा कहा कि हमें सरकार से कुछ संकेत मिले हैं। हम खुले मन से रक्षा मंत्री से मिलने के लिए जाएंगे और उनकी बात सुनने के बाद निर्णय लेंगे। उन्‍होंने कहा, हमारी मांग है कि सारे पेंशनरों को फायदा मिलना चाहिए। वीआरएस लेने वाले सैनिकों को भी पेंशन का लाभ मिलना चाहिए।

दरअसल, पूर्व सैनिकों की यह लंबित मांग आज पूरी होने की संभावना है। सूत्रों के हवाले से ख़बर आ रही है कि आज सरकार वन रैंक वन पेंशन का एलान कर सकती है। रक्षा मंत्री दोपहर तीन बजे इसका साउथ ब्लॉक में एलान कर सकते हैं। खबर है कि रक्षा मंत्री ने आज अपना दिल्ली से बाहर जाने का दौरा भी रद्द कर दिया है। बताया जा रहा है कि सरकार ने पूर्व सैनिकों की 98 फ़ीसदी मांगे मान ली हैं।

सूत्रों के मुताबिक, सरकार पेंशन का रिविजन हर पांच साल में करेगी, लेकिन पूर्व सैनिक अभी भी इस बात को लेकर अड़े है कि ये रिविजन हर साल होनी चाहिए। इसके लागू होने से जवानों, विधावाओं और अपाहिज जवानों को ज्यादा फायदा पहुंचेगा। सरकार के मुताबिक, वह कोश्यारी कमेटी के सुझावों से आगे की बात भी मान चुकी है।

वन रैंक-वन पेंशन पर यह हो सकता है ऐलान : सूत्र

  • पेंशन निर्धारण का आधार वर्ष 2013 होगा
  • जुलाई 2014 से लागू होगा वन रैंक-वन पेंशन
  • चार छमाही क़िस्तों में दिया जाएगा एरियर
  • पांच साल में होगा पेंशन का संशोधन
  • विसंगतियां दूर करने के लिए एक सदस्यीय कमेटी
  • शहीदों की विधवाएं भी दायरे में
  • वीआरएस लेने पर फ़ायदा नहीं

दरअसल, ये करीब 40 साल से चला आ रहा पुराना मुद्दा है, जिसका सरकार सम्मानजनक हल निकालने में जुटी है। सरकार उम्मीद कर रही है कि इस ऐलान के बाद करीब तीन महीने से चला आ रहा पूर्व सैनिकों का आंदोलन खत्म हो जाएगा। सरकार इसलिए भी ये ऐलान जल्द कर रही है, क्योंकि अगले हफ्ते किसी भी दिन बिहार चुनाव का ऐलान हो सकता है और उसके बाद वह वन रैंक-वन पेंशन का ऐलान नही कर सकती।  

पूर्व सैनिक कह रहे हैं कि सरकार पहले ऐलान करे, फिर हम देखते हैं। अन्यथा 12 सितंबर को तो वह जंतर मंतर पर अपनी ताकत दिखा रहे हैं।

इससे पहले खबर थी कि सरकार ने इसके लिए मसौदा समझौता भी तैयार कर लिया है। सूत्रों के मुताबिक, सरकार के ड्राफ़्ट में हर पांच साल में पेंशन की समीक्षा की बात है, लेकिन पूर्व सैनिकों का कहना है कि ये ड्राफ़्ट इकतरफ़ा है और इसमें पूर्व सैनिकों की सहमति नहीं है।

उधर, वन रैंक-वन पेंशन के मुद्दे पर जंतर मंतर पर पूर्व सैनिकों का प्रदर्शन जारी है। कल ही पूर्व सैनिकों ने कहा था सरकार एक साल में पेंशन की समीक्षा को तैयार नहीं हैं, लेकिन अगर ऐसा नहीं होगा तो ये वन रैंक-वन पेंशन नहीं होगा।

हालांकि उन्होंने कहा कि वो दो साल में समीक्षा के लिए तैयार हैं,  लेकिन तीन साल या पांच साल मानने का कोई सवाल ही नहीं है। पूर्व सैनिकों ने कहा कि सरकार का कहना है कि थोड़े पैसे बचाने हैं, इसलिए अगर वो वन रैंक-वन पेंशन को एक जून 2014 से लागू करती है तो भी उन्हें एेतराज़ नहीं होगा। पूर्व सैनिकों ने कहा कि सरकार से बातचीत हुई है और वो चाहते हैं कि मीडिया भी उनकी बात सरकार तक पहुंचा दे।