Friday, 4 November 2011

इन लोगों को दिखाई देतें है भूत प्रेत और एहसास होता है रूहानी ताकत का..

ये सच है कि रूहानी ताकतें या मृत आत्माएं दिखती हैं। इनके होने का एहसास भी होता है। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जिनको तीसरी दुनिया की ताकत या किसी आत्मा के होने का इहसास होता जाता है। ज्योतिष के अनुसार कुछ लोगों के जन्म के समय सितारों की ऐसी विशेष स्थिति होती जिनके कारण उनको भूत-प्रेत, रूहानी ताकतें या मृत आत्माएं दिखाइ देती हैं और उनके होने का एहसास भी होता है।



पढि़ए किन लोगों को दिखती है ऐसी ताकतें
अ इ उ ए- जिन लोगों के नाम की शुरुआत इन अक्षरों से होती है ऐसे लोगों को मृत आत्माएं दिखती है या इनके होने का एहसास होता है।  

डी डू डे डो- इन अक्षरों से शुरू होने वाले नाम के लोग यानि कर्र्क राशि वालों को आत्मा दिखाई दे सकती है । इन लोगों को ऐसी ताकत के होने का एहसास भी होता है।

मा मी मू मे- इन अक्षरों से शुरू होने वाले नाम के लोगों को भी रूहानी ताकत के होने का एहसास हो जाता है। 

पे पो रा री- इन अक्षरों के नाम वाले लोगों को आत्मा और रूहानी ताकतों का साथ मिलता है।  

ती तू ते तो- अगर आपका नाम इन अक्षरों से शुरू होता है तो आपको भी मृत आत्मा या रूहानी ताकतें दिखती है। 

नो या यी यू- वृश्चिक और धनु राशि के लोग जिनका नाम इन अक्षरों से शुरू होता है ऐसे लोगों को इन ताकतों का इहसास होने लग जाता है।

ये यो भ भी- अगर आपका नाम भी इन अक्षरों से शुरू होता है तो आपको मृत आत्मा या भूत प्रेत जैसी ताकतों का एहसास होने लगेगा।

गा गी गू गे- अगर ये आपके नाम के शुुरुआती अक्षर हैं तो आपको रूहानी ताकतों का एहसास होगा और ये ताकतें आपको दिखेगी भी सही

गो सा सी सू- कुंभ राशि के इन अक्षरों से शुरू होने वाले नाम के लोगों को भी मृत आत्माएं दिखती है और इन लोगों को ऐसा एहसास भी होने लगता है।

Wednesday, 28 September 2011

पांच रंगों की विश्व की इस सबसे खूबसूरत नदी के बारे में जानकर हैरान रह जाएंगे आप

प्रकृति अपने अलौकिक और अद्भुत रूप से जब परिचय कराती है तो उसकी खूबसूरती को व्यक्त करने के लिए हर शब्द के अर्थ बौने नजर आने लगते हैं। अद्भुत और नैसर्गिक खूबसूरती को समेटे प्रकृति का अभिन्न अंग करिस्टेल्स नदी ऐसी ही है। दक्षिण अमेरिका के कोलंबिया शहर में स्थित इस नदी को अद्भुत रूप से रंगीन होने के कारण 'पांच रंगों की नदी' कहा जाता है।

दुनिया के सबसे खूबसूरत नदियों में शुमार करिस्टेल्स में वर्षा ऋतु में पानी का बहाव तेज और गहरा होता है। जबकि गर्मी की ऋतु में इतना पानी नहीं होता कि ये चमकदार खूबसूरत नजारे दिख सकें। लेकिन इन ऋतुओं के बीच जब पानी का लेवल सही होता है तो पानी में मौजूद विभिन्न शैवाल और काईयां खिलकर नदी की खूबसूरती में चार चांद लगा देती हैं। और नदी खूबसूरत रंगीन दिखने लगती है।

नदी का वह हिस्सा जहां ये रंगीन खूबसूरत नजारे खिलते हैं, सड़क के जरिए नहीं पहुंचा जा सकता है। साहसी टूरिस्ट ला मैकरिना तक फ्लाइट के जरिए आते हैं उसके आगे का सफर पैदल तय करते हैं। नदी का दर्शनीय स्थल टूरिस्टों के लिए गुरिल्ला गतिविधियों के चलते बंद कर दिया गया था। हलांकि 2009 में इसको फिर खोल दिया गया।

इंसान के रूप में भगवान ने लिया जन्म? आज भी पूजते हैं लोग

बात तीन साल पुरानी है। नोयडा के सैनी गांव में एक बच्ची ने जन्म लिया। पर इस बच्ची के पैदा होते ही पूरे गांव में हड़कम्प मचगई। दूर दूर से लोग इकठ्ठे होने लगे। दरअसल यह बच्ची कोई सामान्य शिशु नहीं है। इसके एक नहीं तीन मुंह है। इस तरह का विचित्र शिशु हजारों, लाखों में नहीं करोड़ों में एक होता है।


हिन्दु धर्म की मान्यता के अनुसार, अधिकांश देवता कई मुख वाले होते हैं। जैसे पंचमुखी गणेश, पंचमुखी शिव और त्रिमुखी विष्णु। गांव वालों की मान्यता है कि यह लड़की इंसान नहीं भगवान है। इस लड़की को गांव में ही नहीं पूरे देश में पूजा जाने लगा। आज भी लड़की मां बाप ने इसक ऐसे ही रखा है। लड़की बड़ी हो रही है, लेकिन इसको पूरे गांव में लक्ष्मी मानकर पूजा की जाती है।


स्थानीय डॉक्टर के मुताबिक, यह वैज्ञानिक कारण है। स्त्री पुरूष के गुण सूत्रों में कुछ भेद होने की वजह से ऐसा होता है। वैसे ऐसे केस करोड़ों में एक होते हैं। ड़ॉक्टरों ने लड़की के ऑपरेशन की सलाह दी थी, लेकिन मां-बाप ने मना कर दिया।

Tuesday, 27 September 2011

वैशाली का विशाल कारनामा सुन कोई भी दंग रह जाएगा!


जयपुर.आर्किटेक्ट के प्रोफेशन में कई बार पुरुषों ने यह महसूस करवाया कि अकेली महिला कुछ नहीं कर सकती। यह अहसास सेक्टर 6 की वैशाली मास्टर के लिए प्रेरणा बन गया।

उन्होंने अकेले बाइक पर सफर करते हुए महिलाओं को स्वावलंबी बनाने का संदेश देने का निश्चय किया। किंग्स रोड स्थित पद्मावती कॉलोनी-प्रथम में रहने वाली 41 वर्षीय वैशाली प्रोफेशन से आर्किटेक्ट हैं। 16 सितंबर को पहली बार वे मोटरसाइकिल से जयपुर से गुजरात के लिए सुबह 6.15 बजे रवाना हुईं।

जयपुर से भीलवाड़ा, चित्तौड़गढ़, उदयपुर, अहमदाबाद, वडोदरा फिर सूरत पहुंची। सूरत से वापस वड़ोदरा, अहमदाबाद, राजकोट, वीरपुर, मेहसाणा, सामलाजी, उदयपुर, चित्तौड़गढ़, भीलवाड़ा होते हुए वे 21 सितंबर को जयपुर पहुंचीं।

उन्होंने बताया कि 6 दिन में लगभग 2,600 किलोमीटर की यात्रा तय की। 2011 महिला सशक्तीकरण वर्ष होने के कारण उन्होंने यह संकल्प लिया था।

इस संकल्प को पूरा करते हुए इन्होंने गांव-गांव, छोटे कस्बों से होते हुए महिलाओं में जाग्रति, स्वावलंबी, आत्मनिर्भर और स्त्रियों को शिक्षित करने का संदेश देते हुए यह यात्रा तय की।

यह सीन देख तड़प जाएंगे आप, लेकिन इन्हें नहीं आई शर्म - What kind of Police: 12-year-old boy hijacked a se - www.bhaskar.com

यह सीन देख तड़प जाएंगे आप, लेकिन इन्हें नहीं आई शर्म -

इंदौर।दृश्य एक:दोपहर 12.25 बजे मालवा एक्सप्रेस ट्रेन प्लेटफार्म नंबर 5 से रवाना होने वाली थी।
दृश्य दो:दोपहर 12.30 बजे ट्रेन प्लेटफार्म से छूटने लगी। तभी ट्रेन की दूसरी ओर पानी के पाइप पर बैठे लगभग 40 साल के एक व्यक्ति ने मौत की छलांग लगा दी। उसका सिर धड़ से अलग हो गया। धड़ पटरी पर था तो सिर पटरी किनारे नाली में पड़ा था।
दृश्य तीन:लाश को देख वहां खड़े लोगों की रुह कांप उठी। एक घंटे बाद तक लाश वहीं पड़ी रही।
दृश्य चार :सूचना के करीब डेढ़ बजे जीआरपी थाने के हेडकांस्टेबल अशोक यादव प्लेटफार्म पर पहुंचे। उन्होंने स्वीपर को तलाश किया लेकिन कोई नहीं मिला। प्लेटफार्म पर 12 साल के एक बच्चे फिरोज पिता शेख रईस पर उनकी नजर पड़ी। उसे बुलाकर उन्होंने कहा कि 100 रुपए दूंगा उसकी जेब टटोल दे।
दृश्य पांच:फिरोज गुमसुम सा कुछ सोचता रहा. फिर रुपए की बात पर मान गया। बेमन से लहूलुहान लाश के कपड़ों की जेब टटोलने लगा। उसकी जेब से रुमाल और पर्स मिला जिसे बच्चे ने हेड साब यादव को दे दिया। लेकिन उसकी शिनाख्त नहीं हो सकी। बात आई लाश उठाने की।
दृश्य छह:हेडसाब यादव तीन लड़कों को लेकर आए। लेकिन उनमें से किसी की हिम्मत कटा सिर उठाने की नहीं हुई। हेड साहब ने फिर रईस की तरफ देखा और कहा - जा, तू सिर उठाकर बॉडी के पास रख दे। वह घबरा गया.. कुछ कहना चाह रहा था लेकिन हेड साहब की घुड़की और शायद 100 रुपए की जरूरत ने उसे पटरी पर कूदने को मजबूर कर दिया।
दृश्य सात:फिरोज ने कांपते हाथों से कागज उठाया और सिर के पास हाथ ले जाते ही अचानक वह रुक गया। फिर आंखें भींचते हुए उसने कटा सिर हाथ में उठा लिया। ये देख प्लेटफार्म और आसपास खड़े लोग सन्न रह गए।
दृश्य आठ :वह धीरे-धीरे लाश की ओर कदम बढ़ाता गया। कटे सिर का खून उसके पैरों पर टपक रहा था। आखिर उसने सिर धड़ से मिला दिया और भागकर प्लेटफार्म पर चढ़ गया।
दृश्य नौ :हेड साहब यादव लाश को पीएम के लिए ले जाने लगे तो अचानक पीछे से छोटे-छोटे हाथ यादव की कमर पर लगे। वह यादव को रोकने के लिए इशारा कर रहे थे। फिरोज ने उनसे रुपए मांगे। लेकिन उन्होंने अनसुना कर दिया। फिर फिरोज ने कहा साहब 100 रुपए दे दो..तुमने ही ने तो कहा था कि सिर उठाकर रख दे। मैंने रख दिया। अब मुझे पैसे तो दे दो।
दृश्य दस:हेड साब के पीछे-पीछे फिरोज थाने पहुंच गया। थाने में कहा कि मुझे 100 रुपए देने का कहा था ,नहीं मिले। मुझे रुपए कौन देगा। वहां तैनात सिपाहियों ने उसे भगा दिया।
सुनकर दु:ख हुआ
घटना सुनकर मुझे दु:ख हुआ है। मुझे इस बारे में जानकारी नहीं थी। यादव दोषी है तो उसको सजा देने का अधिकार मेरे पास नहीं है। बड़े अधिकारी इस मामले में विचार करेंगे। वैसे बाडी उठाना और उसे पीएम के लिए अस्पताल पहुंचाना आरपीएफ का काम है लेकिन रेलवे पुलिस मानवता के नाते यह काम भी करती है।
- टीआई बलविंदरसिंह संधू,जीआरपी थाना
सस्पेंड करने के निर्देश
हेड कांस्टेबल यादव के इस घिनौने कृत्य के लिए उसे सस्पेंड करने के निर्देश निकाल दिए गए हैं।
- आर.के. गुप्ता, आईजी रेलवे पुलिस

Saturday, 24 September 2011

फिर भीग गई आंखें मेरी….

ये पंक्तियां देश के हर उस दुश्मन
के नाम हैं जो सोच रहा है हम कमज़ोर
हैं..हम
बेबस हैं ..जो नापाक कोशिशें करता
जा रहा है..!..अब समय है किसी पर
विश्वास न
करने का..अब समय है खुद इन्साफ
करने का…!
लाहौर से आए
कुछ बादलों की बूंदों ने
आज भिगोया है.
मेरे वतन के साए में आ कर
उन्होंने अंगडाई ली है.
कुछ दूर की कहानियों ने
फिर विश्वास किया है.
रफ्तार तेज़ है तो क्या?
सुकूं का हक उन्हें भी है.
बुलंदियां दूर हैं तो क्या?
ज़मीं का हक उन्हें भी है.
ईमान अब बिक गया तो क्या?
सर उठाने का हक़ उन्हें भी है.
मर मर के जी लिए तो क्या?
दर्द में छलकना उन्हें भी है.
अफ़सोस है मुझे-औ-ताज्जुब भी
आज बादल बरसे फ़िर भी-
पतझड़ की खामोशी है.
रिम झिम बूंदों में नमीं नहीं,
बस बेरुखी की सरगोशी है.
रोक सकता तो रोक लेता उनको,
बांहों से अपनी पोंछ देता उनको,
कोहरे की धुंध जब उड़ने लगती-
सूरज की लौ दिखा देता उनको.
पर मासूम है मेरा हर एक ख्याल,
जो अमन के अवशेष है,
नज़रों में नई सेहर लिए,
नई रौशनी का संदेश ढूढता है.

ल्ड कोस्ट- धूप नहाए पुरसुकून बीच


यह सचमुच आस्ट्रेलिया का सुनहरा तट है, एक और बहुत सुन्दर शहर। कोई 70 किमी. का विशाल समुद्री तट और साल में लगभग 300 दिन धूप से नहाए पुरसुकून बीच। दूर-दूर तक प्रशान्त महासागर का विस्तार। आसमान छूती अट्टालिकाएँ, जिनमें 77वीं मंजिल तक रिहायश वाले क्यू-1 टावर की 78वीं मंजिल से जो विराट और दिव्य दर्शन होते हैं तो पता चलता है कि इस शहर का नाम ‘गोल्ड कोस्ट’ क्यों पड़ा। 78वीं मंजिल की जिस खिड़की पर हम खड़े हैं उस पर लिखा है- ‘नजर की सीध में 16,083 किमी. दूर न्यूयार्क है’। वाह, क्या बात है!
एक तरफ गगनचुम्बी इमारतें और दूसरी तरफ अथाह जलराशि। धूप में नहाया समुद्र तट, सुनहरी रेत और ‘बीच-गार्डस’की सतर्क निगाहों की सुरक्षा में लहरों से खेलते सैलानी। हर साल एक करोड़ से ज्यादा पर्यटक गोल्ड कोस्ट आते हैं और उनमें भारतीयों की भी अच्छी खासी संख्या है। गोल्ड कोस्ट की सड़कों पर घूमते हुए हमें ‘शेर-ए-पंजब’, ‘इण्डियन फैमिली रेस्त्रां’, ‘ऊँ-इण्डिया हाउस’, ‘तन्दूरी हट’, ‘तन्दूरी प्लेस’ जैसे नाम-पट दिखाई देते हैं। ‘राज पैलेस’ में व्यास (पंजाब) से आई सिमी हमें खाना परोसती हैं तो उसकी लहराती लम्बी चोटी गोल्ड-कोस्ट में भारतीय ध्वज जैसी लहराती है। होटल के बाहर दीवार पर पोस्टर लगे हैं- ‘फॉर सेल’, निजी क्रूज की बिक्री की सूचना। सबसे सस्ता क्रूज चार मिलियन आस्ट्रेलियन डालर (करीब 20 करोड़ रु.) का है। हमारे स्थानीय साथी ग्रेग हमारे चौंकने पर हँसते हैं- ‘यहाँ आस्ट्रेलिया के सबसे अमीर लोग बसते हैं। शायद यह इसलिए भी गोल्ड-कोस्ट है!’
गोल्ड कोस्ट आने से पहले हम एक दिन ब्रिसबेन रुके थे, क्वींस लैण्ड प्रान्त की राजधानी, एक और खूबसूरत शहर, जहाँ इसी नाम की नदी शहर के बीच में बहती है जिस पर सिडनी हार्बर ब्रिज जैसी ऐतिहासिकता वाला स्टोन ब्रिज तो है ही, नदी के भीतर से गुजरने वाली टनल-रोड भी है। ब्रिसबन के इर्द-गिर्द बहुत से पर्यटक स्थल हैं लेकिन हमें करीब एक सौ किमी. दूर गोल्ड कोस्ट जाते हुए सिर्फ दो जगह रुकना था।
पहले आस्ट्रेलिया जू जिसके स्वस्थ्य पशु-पक्षियों, चुस्त कर्मचारियों और सनसनीखेज प्रदर्शनों को देखकर बरबस ही अपने अव्यवस्थित चिड़ियाघरों के मरियल जनवरों और बेहाल कर्मचारियों की याद हो आती है। लेकिन आस्ट्रेलिया जू का जिक्र होते ही सबसे पहले स्टीव इरविन याद आते हैं। सन् 2008 में ग्रेट बैरियर रीफ में शूटिंग के दौरान स्टिंग-रे के जहरीले दंश से स्टीव इरविंग की दर्दनाक मृत्यु नहीं हुई होती तो मार्च 2011 में आस्ट्रेलिया जू में हम उनसे मिलकर निश्चय ही गदगद होते। डिस्कवरी चैनल के जरिए अपने दुस्साहसिक कारनामों से विश्वविख्यात हुए स्टीव की मौत भारत में भी सुर्खियां बनी थी। आस्ट्रेलिया जू में हमें मगरमच्छों के साथ खेलते-हँसते स्टीव के पोस्टर ही पोस्टर दिखाई देते हैं। स्टीव की देखरेख में ही आस्ट्रेलिया जू को विश्वख्याति मिली, जहाँ आज भी उनके सहयोगी मगरमच्छों के साथ सनसनीखेज प्रदर्शन करते-कराते हैं।
गोल्ड कोस्ट के रास्ते का दूसरा पड़ाव था -ड्रीम लैण्ड, स्वप्न लोक जैसा ही। रहस्य-रोमांच और सनसनी से भरे मनोरंजन के एक से एक साधन। हम तो सिर्फ एक ‘टॉवर ऑफ टेरर’ का आनन्द लेकर ही आतंकित हो बैठे। जानते हैं क्या? खुली कारनुमा एक डिब्बा हमें ‘एल’ आकार की पटरी पर 160 किमी. प्रति घंटे की रफ्तार से 115 मीटर (38 मंजिल जितना ऊँचे) ऊपर ले गया, सिर्फ सात सेकण्ड में और उतनी ही तेजी से नीचे ले आया! हमारे मुँह से तो चीख भी न निकली थी। अब तक सोचकर सिहरन हो रही है, लेकिन वहाँ ऐसी कई सनसनियां थीं और उनका लुत्फ उठाते युवाओं की लम्बी कतारें लगीं हुई थीं।
बहरहाल, गोल्ड कोस्ट से हमारी वतन वापसी होती है।