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Saturday, 3 September 2011

यह मां-बेटी की काव्यात्मक मनकही है।
लगती नवेली है, पर सदियों पुरानी है।

बुने हुए स्वेटर में, अनपढ़ मां ने भेजा है पैगाम,
देहरी आंगन द्वार बुलाते, कब आएगी अपने गांव।
अरसा बीता ब्याह हुए, क्या अब भी आती मेरी याद,
कैसी है तू? धड़क रहा मन, लौटी न बरसों के बाद।
मोर, कबूतर अब भी छत पर, दाना चुगने आते हैं,
बरसाती काले बादल तेरा, पता पूछकर जाते हैं।
रात की रानी की खुशबू में, तेरी महक समाई है,
हवा चले तो यूं लगता है, जैसे बिटिया आई है।
आज भी ताज़ा लगते हैं, हल्दी के थापे हाथों के,
एक-एक पल याद मुझे, तेरे बचपन की बातों के।

सीवन टूटी जब कपड़ों की, या उधड़ी जब तुरपाई,
कभी तवे पर हाथ जला जब, अम्मा तेरी याद आई।
छोटी-छोटी लोई से मैं, सूरज चांद बनाती थी,
जली-कटी उस रोटी को तू, बड़े चाव से खाती थी।
जोधपुरी बंधेज-सी रोटी, हाथ पिसा मोटा आटा,
झूमर था भाई-बहनों का, कौर-कौर सबने बांटा।
गोल झील-सी गहरी रोटी, उसमें घी का दर्पण था,
अन्नपूर्णा आधी भूखी, सब कुटुम्ब को अर्पण था।
अब समझी मैं भरवां सब्ज़ी, आखिर में क्यों तरल हुई,
जान लिया है मां बनकर ही, औरत इतनी सरल हुई।
ज्ञान हुआ खूंटे की बछिया, क्यों हर शाम रम्भाती थी,
गैया के थन दूध छलकता, जब जंगल से आती थी।
मेरे रोशनदान में भी अब, चिड़िया अंडे देती है,
खाना-पीना छोड़ उन्हें फिर, बड़े प्यार से सेती है।
गाय नहीं पर भूरी कुतिया, बच्चे देने वाली है,
शहर की इन सूनी गलियों में, रौनक छाने वाली है।
मेरे ही अतीत की छाया, इक सुंदर-सी बेटी है,
कंधे तक तो आ पहुंची, मुझसे थोड़ी छोटी है।
यूं भोली है लेकिन थोड़ी, ज़िद्दी है मेरे जैसी,
चाहा मैंने न बन पाई, मैं खुद भी तेरे जैसी।
अम्मा तेरी मुनिया के भी, पकने लगे रेशमी बाल,
बड़े प्यार से तेल रमाकर, तूने की थी सार-सम्भाल।
जब से गुड़िया मुझे छोड़, परदेस गई है पढ़ने को,
उस कुम्हार-सी हुई निठल्ली, नहीं बचा कुछ गढ़ने को।
तूने तो मां बीस बरस के, बाद मुझे भेजा ससुराल,
नन्ही बच्ची देस पराया, किसे सुनाऊं दिल का हाल।
तेरी ममता की गर्मी, अब भी हर रात रुलाती है,
बेटी की जब हूक उठे तो, याद तुम्हारी आती है।
जन्म दोबारा तेरी कोख से, तुझसा ही जीवन पाऊं,
बेटी हो हर बार मेरी फिर उसमें खुद को दोहराऊं।